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वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग : शिक्षा में क्रांति की शुरुआत ?

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: September 9, 2021 15:06 IST

पिछले सात साल के आंकड़े देखें तो छात्नों, शिक्षकों, स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की संख्या में अपूर्व बढ़ोत्तरी हुई है. इस वृद्धि का श्रेय सरकार लेना चाहे तो उसे जरूर मिलना चाहिए लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हमारी शिक्षा नीति में जो मूल-परिवर्तन होने चाहिए थे, वे हुए हैं या नहीं?

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ठळक मुद्देक्या हमारी शिक्षा नीति में जो मूल-परिवर्तन होने चाहिए थे , वे हुए हैं मंत्रियों के बच्चे भी निजी स्कूलों और कालेजों में पढ़ते रहेसभी जनप्रतिनिधियों-पंचों से लेकर समस्त सरकारी कर्मचारियों के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ने चाहिए

‘शिक्षक पर्व’ के उत्सव में भाग लेते हुए प्रधानमंत्नी ने पिछले सात साल के अपने शासनकाल की उपलब्धियां गिनाईं और गैरसरकारी शिक्षा संगठनों से अनुरोध किया कि वे शिक्षा के क्षेत्न में विशेष योगदान करें. इसमें शक नहीं है कि पिछले सात साल के आंकड़े देखें तो छात्नों, शिक्षकों, स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की संख्या में अपूर्व बढ़ोत्तरी हुई है. इस वृद्धि का श्रेय सरकार लेना चाहे तो उसे जरूर मिलना चाहिए लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हमारी शिक्षा नीति में जो मूल-परिवर्तन होने चाहिए थे, वे हुए हैं या नहीं?

सात साल में चार शिक्षा मंत्नी हो गए मोदी सरकार में. औसतन किसी मंत्नी को दो साल भी नहीं मिले यानी अभी तक सिर्फजगह भरी गई. जो शिक्षा पद्धति 74 साल से चली आ रही है, वह आज भी ज्यों की त्यों है. नई शिक्षा नीति की घोषणा के बावजूद कोई सुधार नजर नहीं आ रहा है. यदि सचमुच हमारी सरकार के पास कोई नई दृष्टि होती और उसे अमलीजामा पहनाने की इच्छाशक्ति किसी मंत्नी के पास होती तो वह अपनी कुर्सी में पांच-सात साल टिकता और पुराने सड़े-गले औपनिवेशिक शिक्षा-ढांचे को उखाड़ फेंकता. लेकिन लगता है कि हमारी राजनीतिक पार्टियां किसी भी राष्ट्र के निर्माण में शिक्षा का महत्व क्या है, इसे ठीक से नहीं समझतीं. इसीलिए प्रधानमंत्नी मजबूर होकर गैर-सरकारी शिक्षा-संगठनों से कृपा करने के लिए कह रहे हैं.

गैर-सरकारी शिक्षा-संगठनों ने निश्चय ही सरकारी संगठनों से बेहतर काम करके दिखाया है. इसीलिए मंत्रियों के बच्चे भी निजी स्कूलों और कालेजों में पढ़ते रहे हैं. शिक्षा व्यवस्था में मौलिक परिवर्तन करने के लिए तो बहुत-से सुझाव हैं लेकिन क्या मोदी सरकार यह एक प्रारंभिक कार्य कर सकती है? वह यह है कि देश के सभी जनप्रतिनिधियों-पंचों से लेकर समस्त सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के लिए यह अनिवार्य कर दे कि वे सिर्फ सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में ही पढ़ेंगे. यह कर दे तो देखिए रातों-रात क्या चमत्कार होता है!

सरकारी स्कूलों का स्तर निजी स्कूलों से अपने आप बेहतर हो जाएगा. मेरे इस सुझाव पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 8-10 साल पहले मुहर लगा दी थी लेकिन वह आज तक उत्तर प्रदेश में लागू नहीं हुआ है. निजी शिक्षा-संस्थाएं और निजी अस्पताल आज देश में खुली लूटपाट के औजार बन गए हैं. देश का मध्यम और उच्च वर्ग लुटने को तैयार बैठा रहता है लेकिन देश के गरीब, ग्रामीण, पिछड़े, आदिवासी और मेहनतकश लोगों को शिक्षा और चिकित्सा की सुविधाएं उसी तरह कठिनाई से मिलती हैं, जैसे किसी औपनिवेशिक शासन में गुलाम लोगों को मिलती हैं. यदि भारत को महाशक्ति और महासंपन्न बनाना है तो सबसे पहले हमें अपनी शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्नों में क्रांतिकारी परिवर्तन करने होंगे.

टॅग्स :नरेंद्र मोदीएजुकेशन
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