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सरकार की नीतियां तो मजबूत, क्रियान्वयन कठिन परीक्षा

By आलोक मेहता | Updated: January 31, 2026 08:03 IST

मंत्रालयों में वरिष्ठ पद खाली हैं. राज्यों में निदेशालय कमजोर है और विशेषज्ञ नियुक्तियों में देरी होती है. जब मशीनरी अधूरी हो तो नीति कितनी भी अच्छी हो, परिणाम अधूरे ही रहेंगे.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने भारत को वैश्विक मंच पर नई पहचान दी है. संसद में प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 नए भारत की विकास यात्रा का एक सशक्त प्रमाण है, जो यह दर्शाता है कि 140 करोड़ भारतीयों के अथक परिश्रम और दृढ़ संकल्प से देश आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा में निरंतर अग्रसर है. भारत- यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता, डिजिटल क्रांति, आर्थिक सुधार - ये सब इसकी गवाही देते हैं. लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्कृति में कमजोर क्रियान्वयन यह बताता है कि अब चुनौती नई योजनाओं की नहीं, बल्कि संस्थाओं को मजबूत करने की है.  

नई शिक्षा नीति 2020 को स्वतंत्र भारत की सबसे महत्वाकांक्षी शिक्षा सुधार नीति कहा गया. लेकिन क्रियान्वयन के स्तर पर गंभीर समस्याएं बनी हुई हैं - शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च अभी भी वैश्विक मानकों से कम है. विश्वविद्यालयों और शिक्षा मंत्रालयों में हजारों पद रिक्त हैं,  शिक्षक प्रशिक्षण और शोध ढांचे में कमजोरी  है तथा राज्यों द्वारा केंद्रीय योजनाओं को अपनाने में ढिलाई बरती जा रही है. पीएम श्री स्कूल जैसी योजनाएं कागज पर प्रभावी हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर  कमजोर हैं. हाल के समय में यूजीसी के आरक्षण और भर्ती नियमों को लेकर नई बहस उभरी है. आरक्षण सामाजिक न्याय का संवैधानिक आधार है, इसमें कोई विवाद नहीं. लेकिन साथ ही यह प्रश्न भी उठता है - क्या विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक गुणवत्ता प्रभावित हो रही है? क्या नियुक्तियों में देरी से पढ़ाई और शोध बाधित हो रहे हैं?

विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय बनाने का सपना तभी साकार होगा, जब सामाजिक समावेशन और अकादमिक उत्कृष्टता साथ-साथ चलें.

मोदी सरकार ने देशभर में नए एम्स  संस्थान स्थापित किए - यह ऐतिहासिक निर्णय है. लेकिन वास्तविकता यह है कि कई एम्स  में पूर्ण फैकल्टी नहीं, विशेषज्ञ डॉक्टरों और प्रोफेसरों की भारी कमी है. उपकरण हैं, इमारतें हैं, लेकिन मानव संसाधन नहीं.

स्वास्थ्य नीति केवल भवनों से नहीं चलती. डॉक्टर, नर्स और शोधकर्ता ही उसकी असली रीढ़ हैं. वैसे शिक्षा और स्वास्थ्य के कार्यक्रम राज्य सरकारों द्वारा क्रियान्वित होते हैं. लेकिन कई काम केंद्र सरकार से नियंत्रित हैं. पिछले वर्षों में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के पास भाजपा अध्यक्ष की जिम्मेदारी रहने से प्राथमिकता संगठन और चुनाव रहे. अब आगे नई उम्मीद ही की जा सकती है. शिक्षा और स्वास्थ्य के कार्यक्रमों, सुविधाओं में कांग्रेस काल से रही भ्रष्टाचार की बीमारी, समस्या के आरोपों में कमी नहीं हो पा रही है.

भारतीय संस्कृति, योग, आयुर्वेद की विश्व में सराहना हो रही है, लेकिन घरेलू स्तर पर स्थिति चिंताजनक है. संस्कृति मंत्रालय का हाल यह है कि पुस्तकालय, अभिलेखागार, संग्रहालय उपेक्षित हैं. सरकारी पुस्तकालय ज्ञान केंद्र की जगह उपेक्षित भवन बनते जा रहे हैं. कलाकारों, लेखकों व शोधकर्ताओं के लिए योजनाएं कमजोर हैं और क्रियान्वयन ढीला है. मंत्रालय में निर्णय लेने की गति धीमी है, क्योंकि मंत्री को फुर्सत नहीं है.

उन्हें पर्यटन मंत्रालय के साथ देश भर में प्रचार करना है. संस्कृति को केवल उत्सवों और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक सीमित कर देना दीर्घकाल में खतरनाक होगा. पिछले तीन वर्षों से सरकारी लाइब्रेरियों के लिए नई पुस्तकों की खरीद लगभग शून्य है. परिणाम स्पष्ट है- पुस्तकालय ज्ञान केंद्र की जगह उपेक्षित भवन, नई पीढ़ी की पुस्तकों से दूरी, भारतीय भाषाओं, इतिहास और विचार परंपरा को नुकसान. ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की बात करते हुए यदि पुस्तकालय सूखे रहें तो यह गंभीर विरोधाभास है.  

भारत का संघीय ढांचा विकास की कुंजी है, लेकिन कई राज्य राजनीतिक कारणों से योजनाएं लागू नहीं करते. वित्तीय संकट राज्यों की क्षमता घटाता है. जिला और ब्लॉक स्तर पर प्रशासन कमजोर है, इसका सीधा असर शिक्षा और स्वास्थ्य पर पड़ता है. मंत्रालयों में वरिष्ठ पद खाली हैं. राज्यों में निदेशालय कमजोर है और विशेषज्ञ नियुक्तियों में देरी होती है. जब मशीनरी अधूरी हो तो नीति कितनी भी अच्छी हो, परिणाम अधूरे ही रहेंगे. विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब नीति की ऊंचाई और प्रशासन की  कार्यक्षमता अच्छे स्तर की हो तथा सही क्रियान्वयन हो.

टॅग्स :आर्थिक समीक्षाCentral and State Governmentमोदी
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