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वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग: कश्मीर में नई पहल जरूरी

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: January 9, 2020 08:39 IST

सरकार को यह डर हो सकता है कि नागरिकता संशोधन कानून के विरु द्ध नौजवान पहले ही हर विश्वविद्यालय में प्रदर्शन कर रहे हैं तो कहीं कश्मीर की लपटें इस आग को और नहीं भड़का दें.

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ज्यों ही ईरानी सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी की हत्या हुई, मैंने लिखा था कि भारत को अमेरिका और ईरान के नेताओं से तुरंत बात करनी चाहिए. मुझे खुशी है कि दूसरे ही दिन विदेश मंत्री जयशंकर ने दोनों देशों के विदेश मंत्रियों और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से बात की. इस समय भारत सरकार कश्मीर के हालात दिखाने के लिए यूरोपीय और पश्चिम एशिया के राजदूतों को कश्मीर ले जा रही है, यह अच्छी बात है लेकिन वे इस बात पर जोर दे रहे हैं कि उन्हें लोगों से मिलने-जुलने की काफी छूट मिलनी चाहिए. कुछ हफ्ते पहले जैसे यूरोपीय संघ के सांसद कश्मीर का फेरा लगा आए थे, उस तरह की यात्रा के लिए कुछ राजदूत तैयार नहीं हैं. बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, मालदीव और ईरान के राजदूतों को भी वहां ले जाया जाना चाहिए.

कश्मीर में बर्फबारी इतनी जबर्दस्त हो रही है कि किसी प्रदर्शन, तोड़फोड़ या घेराव की संभावना नहीं है. यदि फारु ख अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसे नेताओं की नजरबंदी को भी खत्म कर दिया जाए तो कोई संकट पैदा नहीं होने वाला है. बेहतर तो यह होगा कि कुछ गैर-सरकारी और गैर-भाजपाई नेताओं और बुद्धिजीवियों को इन नजरबंद कश्मीरी नेताओं से पहले संवाद करने दिया जाए. ये कश्मीरी नेता और ये विपक्षी नेता भाजपा-विरोधी तो हो सकते हैं लेकिन ये राष्ट्रद्रोही नहीं हैं. 

अब पांच महीने बीत गए हैं, कश्मीर में प्रतिबंध अब भी जारी है. अब उसे खत्म करना चाहिए. सरकार ने थोड़ी-बहुत ढील जरूर दी है लेकिन वह काफी नहीं है. सरकार को यह डर हो सकता है कि नागरिकता संशोधन कानून के विरु द्ध नौजवान पहले ही हर विश्वविद्यालय में प्रदर्शन कर रहे हैं तो कहीं कश्मीर की लपटें इस आग को और नहीं भड़का दें. सरकार इसमें संशोधन करे और कश्मीर को खोले तो उसे शांतिपूर्वक रचनात्मक काम करने का अवसर मिल सकता है. गिरती हुई अर्थव्यवस्था को संभालने पर वह अपना ध्यान केंद्रित कर सकती है.

टॅग्स :जम्मू कश्मीरधारा ३७०
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