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अभय कुमार दुबे का ब्लॉग: आर्थिक उत्पादन ठप होने की मार झेलता निम्न वर्ग

By अभय कुमार दुबे | Updated: April 17, 2020 09:03 IST

कोरोना से निपटने की नीतियों के साथ अगर हमने आर्थिक गिरावट से निपटने की नीतियों को न जोड़ा तो कोरोना तो चार-छह महीनों में खत्म हो जाएगा (हर महामारी एक निश्चित अवधि के बाद अपने-आप खत्म हो जाती है), पर अर्थव्यवस्था को जो कोरोना होगा, वह कई साल तक (हो सकता है कि आने वाले दस साल तक) जारी रहेगा.

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हाल ही में हमने बाबासाहब डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती मनाई है. हम जानते हैं कि डॉ. आंबेडकर कमजोर जातियों के सर्वश्रेष्ठ नेता और प्रमुख राष्ट्र-निर्माता होने के साथ-साथ मुख्य रूप से अर्थशास्त्र के विद्वान थे. चाहे बंबई विश्वविद्यालय हो या कोलंबिया विश्वविद्यालय या लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, उनकी अकादमिक उपलब्धियां आर्थिक-विज्ञान में ही थीं.

मेरा विचार है कि इस समय वे यह देख कर बेहद चिंतित होते कि कोरोना फैलने से पहले जो अर्थव्यवस्था तकरीबन मंदी की स्थितियों से जूझ रही थी, वह महामारी के कारण आर्थिक उत्पादन का चक्र पूरी तरह से ठप हो जाने के कारण नए रसातल में गिरती जा रही है.

डॉ. आंबेडकर को यह आसानी से दिख जाता (क्योंकि वे कमजोर जातियों के हितों के लिए जीवन भर लड़ते रहे और हम जानते हैं कि जाति जितनी कमजोर होती है, भारतीय संदर्भो में वह उतनी ही गरीब भी होती है) कि सारे देश के लिए घरबंदी की समान नीति अपनाने का नतीजा देश की दरिद्र आबादी के लिए कितना घातक होता जा रहा है.

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हमारी कुल ग्रामीण आबादी के 52 फीसदी परिवार ऐसे हैं जो स्वरोजगार के सहारे जीवनयापन करते हैं. 25 फीसदी आबादी ऐसी है जो अस्थायी श्रमशक्ति की श्रेणी में आती है. कोई 12.7 फीसदी लोग ऐसे हैं जो रोज कमाते ओर रोज खाते हैं.

अर्थशास्त्री होने के नाते डॉ. आंबेडकर को इन आंकड़ों का हमसे भी पहले पता होता, और वे सरकारी नीति-निर्माताओं को मशविरा देते कि सारे देश में एक साथ लॉकडाउन करने के बजाय घरबंदी की नीति को आबादी की विभिन्न आर्थिक श्रेणियों के मुताबिक अपनाया जाना चाहिए.

सेंटर फॉर द मॉनिटरिंग ऑफ इंडियन इकोनॉमी द्वारा मार्च में किया गया एक सर्वेक्षण भी डॉ. आंबेडकर की नजर से गुजरता. योगेंद्र यादव ने इस सर्वेक्षण से निकले नतीजों को गैर-तकनीकी और सरल भाषा में हमारे सामने पेश कर दिया है.

उनके अनुसार 137 करोड़ की इस आबादी वाले देश (जिसमें केवल तीन फीसदी ही आयकर देने लायक आमदनी की श्रेणी में आते हैं) में कोरोना का प्रकोप होने से पहले 40.4 करोड़ लोग रोजगारशुदा थे. कोरोना के बाद दो हफ्ते के भीतर-भीतर करीब 12 करोड़ लोगों ने अपना रोजगार खो दिया.

हम जानते हैं कि रोजगार खोने वालों की यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. डॉ. आंबेडकर इस प्रश्न पर जरूर विचार करते कि इस निरंतर भीषण होती जा रही परिस्थिति से निपटने के क्या तरीके हो सकते हैं.

दरअसल, कोरोना से निपटने की नीतियों के साथ अगर हमने आर्थिक गिरावट से निपटने की नीतियों को न जोड़ा तो कोरोना तो चार-छह महीनों में खत्म हो जाएगा (हर महामारी एक निश्चित अवधि के बाद अपने-आप खत्म हो जाती है), पर अर्थव्यवस्था को जो कोरोना होगा, वह कई साल तक (हो सकता है कि आने वाले दस साल तक) जारी रहेगा.

गरीबों के बारे में बिल्कुल न सोचना या कम सोचना या फिर केवल जुबानी जमा-खर्च तक सीमित रहना कोई छोटी-मोटी समस्या नहीं है. यह एक ऐसी सामाजिक समस्या है जिसने चिंताजनक रूप ग्रहण कर लिया है. हाल ही में अपने एक बुद्धिमान और सहृदय पड़ोसी से चर्चा करते हुए मैंने उनका ध्यान इस समस्या की ओर दिलाया.

अनौपचारिक चर्चा में मैंने उनसे कहा कि हम सब सरकार के नेतृत्व में कोरोना से लड़ रहे हैं, लेकिन अब हमारे पास घटनाओं की पश्चात-दृष्टि भी है. और, इसकी रोशनी में हम आकलन कर सकते हैं कि हमने जो किया, उसके अलावा क्या कुछ और हो सकता था, या क्या हमारी कोई वैकल्पिक नीति भी हो सकती थी?

मेरा कहना था कि अगर घरबंदी करते समय अनौपचारिक क्षेत्र में श्रम करके किसी तरह रोजी-रोटी चला रहे गरीबों की दुर्गति के अंदेशों पर ध्यान दिया जाता तो दिल्ली - उत्तर प्रदेश की सीमा पर गरीबों की भीड़ न जमा होती. दिहाड़ी पर काम करने वालों, पीस-रेट पर काम करने वालों, रिक्शा चलाने वालों, अपार्टमेंटों के भीतर और बाहर कपड़ों पर इस्तरी करने वालों, घरों में काम करने वालों/वालियों, और ऐसे ही न जाने कितनी श्रेणियों के बारे में घरबंदी की एकसार नीति अपनाने से पहले सोचा जाना चाहिए था.

जिन सज्जन से मैं चर्चा कर रहा था, उनका उत्तर सुन कर मैं अवाक रह गया. उन्होंने पूरे इत्मीनान से कहा कि देखिए, कोई भी नीति बनाई जाती है तो उसमें किसी का फायदा होता है और किसी का नुकसान. यानी, उनका मतलब था कि गेहूं के साथ अगर घुन पिस रहा तो इसमें कोई क्या कर सकता है. काश, उन्हें इस बात का एहसास होता कि गेहूं के साथ जो पिस रहा है, उसकी मात्रा गेहूं से भी ज्यादा है.

कहने का तात्पर्य यह है कि हमने और हमारे नीति-निर्माताओं ने गरीबों के बारे में सोचना बहुत कम कर दिया है. जिस आर्थिक पैकेज की घोषणा की गई है, उसे समस्या पैदा होने से पहले सोच लेना चाहिए था. न तो मेरे जैसे बुद्धिजीवियों और न ही नीति-निर्माताओं का ध्यान इस ओर गया. डॉ. आंबेडकर की जयंती के उपलक्ष्य में यही है चिंतन का वह परिप्रेक्ष्य, जिसकी तरफ मैं सभी पाठकों का ध्यान खींचना चाहता हूं.

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