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मृत पति की संपत्ति से भरण-पोषण का दावा कर सकती विधवा पत्नी?, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा-अपने ससुर से भी दावा कर सकती

By सतीश कुमार सिंह | Updated: April 1, 2026 21:28 IST

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा और अपीलकर्ता को अपनी पत्नी को भरण-पोषण देने का निर्देश दिया।

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ठळक मुद्देन्यायालय ने आगे कहा कि विधवा अपने मृत पति की संपत्ति से भरण-पोषण का दावा कर सकती है।पत्नी पर झूठी गवाही देने या कथित तौर पर अदालत से झूठ बोलने के आरोप में मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी थी।अदालत में बहस अपीलकर्ता अकुल रस्तोगी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में प्रथम अपील याचिका दायर की थी।

प्रयागराज: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि कोई महिला अपने पति की मृत्यु के बाद ससुर से गुजारा भत्ता पाने की हकदार है। न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की पीठ ने हाल ही में दिए गए निर्णय में कहा, “यह सुस्थापित नियम है कि पति पर पत्नी के भरण पोषण का दायित्व होता है।” इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मंगलवार को फैसला सुनाया कि पति की मृत्यु के बाद भी पत्नी के भरण-पोषण का कानूनी दायित्व समाप्त नहीं होता। न्यायालय ने आगे कहा कि विधवा अपने मृत पति की संपत्ति से भरण-पोषण का दावा कर सकती है।

यदि वह अपर्याप्त साबित हो तो अपने ससुर से भी दावा कर सकती है। न्यायालय ने ये टिप्पणियां एक सुनवाई के दौरान कीं, जिसमें एक व्यक्ति ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए अपनी पत्नी पर झूठी गवाही देने या कथित तौर पर अदालत से झूठ बोलने के आरोप में मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी थी।

अदालत में बहस अपीलकर्ता अकुल रस्तोगी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में प्रथम अपील याचिका दायर की थी। रस्तोगी की ओर से पेश हुए वकील ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि उनके मुवक्किल रामपुर पारिवारिक न्यायालय द्वारा 6 फरवरी को पारित आदेश से व्यथित हैं, जिसमें झूठी गवाही देने के आरोप में उनकी पत्नी के खिलाफ कार्यवाही शुरू करने की अनुमति मांगने वाली याचिका खारिज कर दी गई थी।

रस्तोगी के वकील ने तर्क दिया कि उनकी पत्नी ने भरण-पोषण का दावा करने के लिए कई आधारों पर झूठे बयान दिए थे। उदाहरण के लिए, उन्होंने कामकाजी महिला होने का खुलासा करने के बजाय खुद को गृहिणी बताया था। दूसरे, उसने दावा किया कि उसके पास बैंक ऑफ बड़ौदा और एचडीएफसी बैंक में 20 लाख रुपये से अधिक की सावधि जमा रसीदें (एफडीआर) हैं।

पूछताछ करने पर पत्नी ने बताया कि ये जमा उसके पिता ने उसके नाम पर किए थे। हालांकि, इनमें से केवल 4 लाख रुपये ही जमा रह गए थे, बाकी रकम निकाल ली गई थी। न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की पीठ ने अपील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वकील अपने पक्ष में कोई सबूत पेश करने में विफल रहे हैं।

न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि सूचना छिपाना झूठा बयान देने के बराबर नहीं है, और न ही इसे झूठा बयान देने के रूप में समझा जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि प्रथम दृष्ट्या निधि (FDR) महिला के पिता द्वारा बनाई गई थी, जो विवाह के बाद उसके भरण-पोषण के लिए उत्तरदायी नहीं हैं।

अब चूंकि FDR में केवल 4 लाख रुपये बचे हैं, न्यायालय ने कहा कि महिला को अपना जीवन यापन करने के लिए वित्तीय सहायता की आवश्यकता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा और अपीलकर्ता को अपनी पत्नी को भरण-पोषण देने का निर्देश दिया। न्यायालय ने कहा कि पति का अपनी पत्नी को भरण-पोषण प्रदान करने का कर्तव्य है।

यह दायित्व उन परिस्थितियों से उत्पन्न होता है, जहां पति-पत्नी अलग हो गए हैं और पत्नी ने आपराधिक कानूनों के आधार पर या हिंदू कानून में निहित भरण-पोषण प्रावधानों के अनुसार भरण-पोषण की मांग की है। पति का कर्तव्य उसकी मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होता है। अदालत ने कहा कि महिला को कुछ शर्तों के तहत अपने ससुर से भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार है।

टॅग्स :Allahabad High CourtरामपुरRampur
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