भारत की राजनीति हर चीज को राजनीतिक नजरिये से देखने-दिखाने को अभिशप्त है. ताजा उदाहरण गहराते ऊर्जा संकट और बढ़ते विदेशी मुद्रा संकट से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील का है. प्रधानमंत्री ने देशवासियों से अपील की कि पेट्रोल-डीजल की खपत कम करें और उसके लिए वर्क फ्रॉम होम, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग तथा कार पूलिंग जैसे उपाय करें. एक साल तक सोना न खरीदने और विदेश यात्रा से परहेज करने की अपील भी की गई है. अपील खाद्य तेलों का उपयोग 10 प्रतिशत घटाने की भी है.
अमेरिका और ईरान में संघर्ष विराम के बावजूद पश्चिम एशिया में जारी टकराव और अस्थिरता से कमोबेश पूरा विश्व ऊर्जा संकट झेल रहा है. तमाम देशों ने उससे निपटने के लिए अपनी परिस्थितियों के अनुरूप कदम भी उठाए हैं. महंगाई की मार और नागरिकों की दुश्वारियों की चर्चा के बावजूद दिखा नहीं कि किसी भी देश में विपक्ष ने सरकार के ऐसे कदमों की आलोचना की हो,
लेकिन भारत में विपक्ष की प्रतिक्रियाओं से लगता है कि मानो मोदी सरकार ही इस संकट के लिए जिम्मेदार हो. चुनाव लोकतंत्र की प्राणवायु हैं, पर चुनाव जीत कर सत्ता में आने और उसे बनाए रखने की सोच कई बार राजनीतिक नेतृत्व को देश हित में सही समय पर सही फैसले लेने से रोकती भी है. पड़ोसी देशों से लेकर दूरदराज तक के देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम मार्च में ही बेतहाशा बढ़ गए.
विकसित देश भी महंगाई की मार से अछूते नहीं, लेकिन सात मार्च को कमर्शियल और घरेलू गैस सिलेंडर के दामों में कुछ वृद्धि के अलावा इस मोर्चे पर हमारी सरकार मौन ही रही. विपक्ष द्वारा व्यक्त आशंकाओं को दरकिनार करते हुए देश में पर्याप्त भंडार का दावा कर सरकार देशवासियों को महंगाई से बचाए रखने का भरोसा भी देती रही.
अतीत के अनुभव के मद्देनजर समझ पाना मुश्किल नहीं था कि सरकार की यह सदाशयता पांच राज्यों में मतदान तक ही है. हमने अतीत में भी देखा है कि सरकारी तेल कंपनियां चुनाव के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ जाने पर भी देश में कीमत नहीं बढ़ाती थीं, लेकिन मतदान समाप्ति की शाम ही सारी कसर पूरी कर लेती थीं. उस लिहाज से मोदी सरकार ने ज्यादा धैर्य दिखाया.
जब अंतरराष्ट्रीय कारणों से वैश्विक संकट है तो झेलना पड़ेगा ही. हां, पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में मतदाताओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका के चलते ऐसे जरूरी कदम भी दो माह बाद उठाने के लिए सरकार की आलोचना की जा सकती है. अगर कारोना काल में बिना तामझाम सादगी से चुनाव हो सकते थे, तो इस बार क्यों नहीं?
ऊर्जा संकटकाल में धुंआधार चुनाव प्रचार में फूंके गए पेट्रोल-डीजल की जवाबदेही किसकी है? शक्ति प्रदर्शन के रूप में हुए नई सरकारों के शपथ ग्रहण में तमाम बड़े नेता क्या कार पूल करके आए थे? शाश्वत समस्या है कि हमारी सरकारें आग लगने पर ही कुआं खोदने की सोचती हैं.
अगर हम अपनी जरूरत के 80 प्रतिशत तक कच्चे तेल के लिए आयात पर निर्भर हैं, तब आज तक देश में विश्वसनीय और सुविधाजनक सार्वजनिक परिवहन तंत्र क्यों नहीं विकसित किया गया? कोरोना काल में किए गए वर्क फ्रॉम होम के प्रयोग को यथासंभव जीवन शैली का हिस्सा बनाया जाना चाहिए. छोटे काफिले के साथ या मेट्रो में सफर कर प्रचार बटोरनेवाले नेता-अफसर ऐसा हमेशा क्यों नहीं कर सकते?
जो देश हरित क्रांति करने में सक्षम रहा, उसकी खाद्य तेल आयात पर निर्भरता सरकारी प्राथमिकताओं पर ही सवालिया निशान लगाती है. कच्चे तेल के बाद सबसे ज्यादा हमारा आयात बिल सोने का है, पर बेलगाम कीमतों के चलते वह आम भारतीय की क्रयशक्ति से बाहर है, जबकि सक्षम लोगों पर किसी अपील का असर शायद ही हो.