अगर जी-20 सभी को साथ लेकर चलने में सफल हुआ होता तो आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जीती जा चुकी होती। कोविड महामारी से जिंदगियों को बचाने की लड़ाई अमीर-गरीब देश अकेले-अकेले न लड़ते, ग्लोबल सप्लाई चेन बाधित न हुई होती और दुनिया मंदी के मुहाने तक न पहुंची होती।
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आपको बता दें कि किसी भी देश के आधारभूत विकास के लिए ऊर्जा का सतत और निर्बाध प्रवाह बहुत जरूरी है। देश में प्रति व्यक्ति औसत ऊर्जा खपत वहां के जीवन स्तर की सूचक होती है। इस दृष्टि से दुनिया के देशों में भारत का स्थान काफी नीचे है।
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लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने के उद्देश्य से महिला आरक्षण विधेयक का करीब ढाई दशक बाद भी पारित नहीं हो पाना इसका उदाहरण है। महिला आरक्षण विधेयक को पहली बार 1996 में संसद में पेश किया गया था।
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‘बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी’ ने दावा किया है कि उसके प्रदर्शनों में दस लाख लोग जमा हुए हैं और उन्होंने हसीना से इस्तीफा मांगा है। उनका कहना है कि 2024 में चुनाव होने तक ढाका में कोई कार्यवाहक सरकार नियुक्त की जाए।
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जिस दल को पिछले चुनाव में एक प्रतिशत मत भी नहीं मिले हों, उसे इस चुनाव में तेरह प्रतिशत वोट प्राप्त होना इसका सबूत है कि गुजरात में विपक्ष के दृष्टिकोण से सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है।
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आपातकाल के काले समय में, राष्ट्र ने देखा कि कैसे न्यायपालिका के एक हिस्से ने नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर अंकुश लगाने में उस समय की सरकार की सहायता की; उस अवधि के दौरान न्यायाधीशों को विशेष रूप से सरकार द्वारा नियुक्त किया गया था।
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नई परिस्थितियों के मुताबिक आधुनिक कानून मानने के कारण बहुत-सी परेशानियों से भारत के लोगों को मुक्त होने का मौका सहज ही मिल जाएगा। इसी तरह से अपने देश में लोगों को समुचित इलाज और इंसाफ पाने में बहुत दिक्कत होती है।
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शी ने इस वर्ष अक्तूबर में अपने तीसरे कार्यकाल की शुरुआत बाली में हुए 'जी 20' और 'एपेक' शिखर सम्मेलन से करने के बाद जिस तरह से अब सऊदी अरब को चुना है, उससे निश्चय ही पश्चिम एशिया के प्रति एक सोची-समझी नीति के तहत चीन की इस क्षेत्र के प्रति बढ़ती रणन
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भाजपा की खासियत है कि वह जीत और हार दोनों का विश्लेषण करती है और फिर योजनाएं बनाती हैं। 2023 में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना, कर्नाटक, मेघालय, नगालैंड, मिजोरम और त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। 2024 में लोकसभा चुनाव होंगे। यद
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देश की खुफिया एवं सुरक्षा एजेंसियों द्वारा नकली नोटों के प्रसार को रोकने की भरसक कोशिश की जाती है, सरकार द्वारा नागरिकों को इस संबंध में जागरूक भी किया जाता है लेकिन नकली नोटों के प्रसार के आंकड़े बताते हैं कि इन प्रयत्नों का वांछित असर नहीं हो रहा ह
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