भारतीय जनता पार्टी की सरकार और पार्टी, दोनों को आपत्ति यह है कि राहुल गांधी ने विदेश में जाकर जिस तरह से आलोचना की, वह देश के साथ गद्दारी है. कांग्रेस ने हालांकि पलटवार करते हुए कहा है कि सरकार की आलोचना देश के साथ गद्दारी नहीं है.
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जाहिर है कि इसके पीछे कोई सैद्धांतिक कारण नहीं, बल्कि निजी स्वार्थ होते हैं। इनके चलते लोकतंत्र को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। जिन मतदाताओं के कंधों पर जनतंत्र का बोझ होता है, वे ठगे से रह जाते हैं। मान सकते हैं कि भारतीय मतदाता यूरोप अथवा पश्चिमी दे
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राष्ट्रीय राजनीति हो या विदेश नीति, न्याय व्यवस्था हो या सुरक्षा व्यवस्था, मिलावटखोरों के खिलाफ कार्रवाई का मुद्दा हो या भ्रष्टाचारियों के खिलाफ- हर मुद्दे पर वे बेबाकी के साथ अपने विचार रखते थे। कई बार तो उनके शब्द इतने तीखे हो जाते थे कि उन्हें सौम
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द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात पहले द्वि-ध्रुवीय विश्व और बाद में अमेरिका की अगुवाई वाले एक-ध्रुवीय विश्व में भी वैश्विक संस्थानों की एक महती भूमिका मानी जाती रही है। संयुक्त राष्ट्र और उसके अंतर्गत आने वाली संस्थाएं दुनिया के संचालन की धुरी बनी रहीं।
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चीन के राजनयिक वांग यी ने इन दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारियों को बुलाकर बीजिंग में बिठाया और उनके बीच समझौता करा दिया। अब दो माह में ईरान और सऊदी अरब कूटनीतिक संबंध स्थापित कर लेंगे और दोनों ने एक-दूसरे की संप्रभुता के सम्मान की घोषणा भी क
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पिछले माह 23 फरवरी को विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एशिया इकोनॉमिक डायलॉग में कहा कि चीन से व्यापारिक असंतुलन की गंभीर चुनौती के लिए सिर्फ सरकार ही जिम्मेदार नहीं है, चीन के साथ व्यापार असंतुलन के लिए सीधे तौर पर देश का उद्योग-कारोबार और देश की कंपनियां
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अफ्रीका में, वहां की चीफ हीट ऑफिसर यूजेनिया कारगबो के एजेंडे में हीटवेव अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करना, हीट-रेजिलिएंट बिल्डिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर डिजाइन करना, अत्यधिक गर्मी के खतरों के बारे में जन-जागरूकता और शिक्षा को बढ़ावा देना, गर्मी से संबंधि
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शी जिनपिंग तीसरी बार चीन के राष्ट्रपति चुने गए हैं. यह केवल एक देश चीन का अंदरुनी मामला नहीं है क्योंकि जिनपिंग महज राष्ट्रपति नहीं बल्कि एक तानाशाह की भूमिका में हैं. उन्होंने अपने देश में तो विरोध की हर आवाज को कुचला ही है, दुनिया में भी ऐसा ही करन
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हिंदू देशभक्त पत्रिका के संपादक क्रिस्टोदास पाल, न्यायमूर्ति बदरुद्दीन तैयब जी एवं अंजुमन-ए-पंजाब की तरफ से जवाब दाखिल करते हुए कहा गया कि भारत में अभी बालिकाओं की शिक्षा को सह-शिक्षा के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
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