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ब्लॉग: गठबंधन की राजनीति में क्या 25 वर्षों में हुआ हासिल ?

By कृष्ण प्रताप सिंह | Updated: July 13, 2023 14:37 IST

देश में गठबंधन की जिस राजनीति को भाजपा द्वारा 1998 में 13 घटक दलों के साथ मिलकर बनाए गए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) से शुरू माना जाता है और पिछले दिनों जिसके 25 साल पूरे हुए हैं

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नीति, कार्यक्रम व सिद्धांत के आधार पर सबसे दीर्घकालिक गठबंधन और सत्ता संचालन का वामपंथी दलों का पश्चिम बंगाल का रिकॉर्ड आज भी अटूट है, लेकिन चूंकि अब वे न तीन में रह गए हैं, न तेरह में इसलिए उसकी चर्चा तक नहीं होती।

दूसरी ओर देश में गठबंधन की जिस राजनीति को भाजपा द्वारा 1998 में 13 घटक दलों के साथ मिलकर बनाए गए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) से शुरू माना जाता है और पिछले दिनों जिसके 25 साल पूरे हुए हैं, उसका तकिया सत्ताकांक्षी दलों की तात्कालिक जरूरतों पर होने के कारण ज्यादातर समय वह राजनीतिक मतलबपरस्ती का ही पर्याय बनी रही है. उसका कोई न्यूनतम साझा कार्यक्रम रहा भी तो बस ऊपर ऊपर ही।

अलबत्ता, धीरे-धीरे करके उसने एक ‘गठबंधन धर्म’ विकसित कर लिया था और निष्ठापूर्वक उसका पालन करती थी. बाद के वर्षों में कांग्रेस ने अकेले दम पर उसे हराना मुमकिन न देख संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) बनाया।

निस्संदेह, क्षेत्रीय दलों से कांग्रेस का गठबंधन इस अर्थ में कठिन था कि उनमें ज्यादातर कांग्रेस का विरोध करते हुए अस्तित्व में आए थे और गैरकांग्रेसवाद में यकीन करते थे. उन सबमें कांग्रेस और उसकी संस्कृति का अक्स दिखाई देता था, सो अलग. ऐसे में यह चमत्कार ही था कि कांग्रेस भाजपा के आकलन को झुठलाकर संप्रग बनाने और उसकी बिना पर भाजपा को दो-दो चुनाव हराकर दस साल तक सत्ता में आने में सफल रही.

उसने राजग की तब तक वापसी नहीं होने दी, जब तक उसे नरेंद्र मोदी का ‘महानायकत्व’ नहीं मिल गया. यह ‘महानायकत्व’ गठबंधन की राजनीति के लिए अप्रत्याशित टर्निंग प्वाइंट सिद्ध हुआ क्योंकि उसकी बिना पर जैसे ही भाजपा को केंद्र में खुद केे दम पर बहुमत मिला, उसनेे राजग को ठंडे बस्ते में डाल दिया. 

आज राजग की धरती अपनी धुरी पर पूरे 360 अंश घूम गई है और कई घटक दल उसे उसके हाल पर छोड़ गए हैं. इनमें भाजपा की सबसे पुरानी गठबंधन सहयोगी शिवसेना के साथ अकाली दल और जनता दल (यूनाइटेड) भी शामिल हैं. अलबत्ता, अब महाराष्ट्र में विभाजित शिवसेना का एक गुट उसके साथ सत्ता में है. 

नतीजा यह है कि खुद को ‘तीसरी शक्ति’ मानने वाले कई क्षेत्रीय दल अब कांग्रेस की ही तरह भाजपा को लेकर भी असहज रहने लगे हैं.जाहिर है कि गठबंधन की राजनीति के मामले में देश एक बार फिर वहीं पहुंच गया है, 1998 में जहां से चला था. 

भाजपा और कांग्रेस कहें कुछ भी और एक-दूजे के जवाब में गठबंधन की कैसी भी तैयारी क्यों न करें, वे मतदाताओं का ध्रुवीकरण भाजपा व कांग्रेस के बीच ही चाहती हैं.

टॅग्स :कांग्रेसBJPजेडीयूआरजेडीभारतIndia
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