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ब्लॉग: सरकार की राह अब पहले की तरह नहीं रहेगी आसान

By शशिधर खान | Updated: June 29, 2024 13:20 IST

नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं। एक ही राजनीतिक दल के एक ही नेता का देश का ऐसा नेतृत्वकर्ता बनना अपने आप में ऐतिहासिक है।

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ठळक मुद्देलोकसभा में विपक्ष तो था, मगर इतना मजबूत नहीं था कि विपक्ष का दर्जा मिलेकिसी भी पार्टी के पास लोकसभा में इतनी सीटें नहीं थीं कि उसे यह संवैधानिक दर्जा प्राप्त हो कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी, मगर उसके पास भी न्यूनतम 10% सीटें नहीं थीं

नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं। एक ही राजनीतिक दल के एक ही नेता का देश का ऐसा नेतृत्वकर्ता बनना अपने आप में ऐतिहासिक है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और अब केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा समेत कई वरिष्ठ भाजपा नेता इस बात का बार-बार उल्लेख कर चुके हैं। उनका कहना सही है, कोई इससे इंकार नहीं कर सकता।

लेकिन ऐतिहासिक चुनाव परिणाम का दूसरा पहलू भी सामने है कि मतदाताओं ने विपक्षी दलों को रिकॉर्ड जीत प्रदान की है। अपने 10 साल के कार्यकाल के दौरान नरेंद्र मोदी किसी-न-किसी सम्मेलन में प्रायः कहते थे कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के सुचारु संचालन के लिए मजबूत विपक्ष जरूरी है। इस दौरान लोकसभा में विपक्ष तो था, मगर इतना मजबूत नहीं था कि विपक्ष का दर्जा मिले।

किसी भी पार्टी के पास लोकसभा में इतनी सीटें नहीं थीं कि उसे यह संवैधानिक दर्जा प्राप्त हो। कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी, मगर उसके पास भी न्यूनतम 10% सीटें नहीं थीं ताकि उसके नेता को विपक्षी नेता का दर्जा मिले। पूरे दस साल तक जनता से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक यह मुद्दा चर्चा में रहा। मुख्य सूचना आयुक्त (सीआईसी), केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी), महालेखा नियंत्रक व परीक्षक (सीएजी) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) निदेशक, लोकपाल जैसे संवैधानिक पदों पर नियुक्ति सरकार इसी बहाने टालती रहती थी।

इन पदों की नियुक्ति के लिए बने एक्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति में भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) के अलावा लोकसभा में विपक्षी नेता का भी प्रावधान है।नियुक्तियां टलने और खाली पदों के प्रति सरकार के उदासीन रवैया के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं पर मिली नोटिस के जवाब में सरकार ने यह दलील देकर पल्ला झाड़ा कि लोकसभा में विपक्ष का नेता नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने फटकार के साथ ऐसा प्रावधान करने को कहा ताकि लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के नेता को चयन समिति के सदस्य के रूप में बैठक में बुलाया जाए। ऐसा प्रावधान तो हुआ और चयन समिति की बैठकों में लोकसभा में कांग्रेस नेता को बुलाया भी गया। लेकिन केंद्र सरकार ने न तो किसी कारण से लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के नेता के बैठक में नहीं आ पाने की परवाह की, न ही चयन के लिए सूचीबद्ध किसी नाम पर उनकी आपत्ति को तरजीह दी।

अब दस साल के अंतराल के बाद लोकसभा में विपक्ष का नेता है, जिसकी उपेक्षा करके भाजपा गठजोड़ सरकार के लिए किसी संवैधानिक नियुक्ति पर एकतरफा निर्णय लेना कठिन होगा। 

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