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ब्लॉग: महिलाओं के वोट के लिए हिपोक्रेसी की सीमा लांघी जा रही है

By विश्वनाथ सचदेव | Updated: November 16, 2023 16:09 IST

सोशल मीडिया पर पिछले लंबे अर्से से यह शब्द दोहराया जा रहा है। एक वाक्य कहलाया गया है प्रधानमंत्री के मुंह से जिसमें वह कहते हैं, ‘हिपोक्रेसी की भी एक सीमा होती है।

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ठळक मुद्देहिपोक्रेसी की एक सीमा का उदाहरण हमारी राजनीति में महिलाओं की भूमिका से जुड़ा हुआ हैदेश में पांच राज्यों में हो रहे चुनावों में नेताओं के भाषणों में महिला मतदाताओं को रिझाने की जैसे होड़-सी लगी हुई हैचुनावी भाषणों में महिलाओं के वोट के लिए हिपोक्रेसी की सीमाएं लांघी जा रही हैं

अंग्रेजी का एक शब्द है ‘हिपोक्रेसी’ जिसका अर्थ है जो नहीं है वह होने का दावा करना। सोशल मीडिया पर पिछले लंबे अर्से से यह शब्द दोहराया जा रहा है। एक वाक्य कहलाया गया है प्रधानमंत्री के मुंह से जिसमें वह कहते हैं, ‘हिपोक्रेसी की भी एक सीमा होती है।’ पता नहीं उन्होंने यह बात किस संदर्भ में कही होगी, पर सोशल मीडिया पर इसे राजनेताओं के दावों के साथ जोड़ा गया है।

यहां भले ही निशाने पर प्रधानमंत्री हों पर हकीकत में यह बात हमारे सारे राजनेताओं पर लागू होती है। उनके दावे, उनके वादे, सब अति की सीमा तक दिखावा लगते हैं। ‘हिपोक्रेसी’ की एक सीमा का उदाहरण हमारी राजनीति में महिलाओं की भूमिका से जुड़ा हुआ है। हर राजनीतिक दल स्वयं को महिलाओं का हितैषी बताने-जताने में लगा हुआ है।

देश में पांच राज्यों में हो रहे चुनावों में नेताओं के भाषणों में महिला मतदाताओं को रिझाने की जैसे होड़-सी लगी हुई है। इन नेताओं में राजनीतिक दलों के छुटभैया प्रवक्ताओं से लेकर राजनीतिक दलों के अध्यक्ष तक शामिल हैं। मुख्यमंत्री पद के दावेदारों से लेकर देश के शीर्ष नेताओं तक के चुनावी भाषणों में महिलाओं के वोट के लिए हिपोक्रेसी की सीमाएं लांघी जा रही हैं।

सस्ती रसोई गैस से लेकर महिलाओं के बैंक खातों में नगद राशि जमा करने तक में होड़ लगी हुई है। ताजा उदाहरण छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में की गई घोषणाएं हैं। छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी ने अपने घोषणा-पत्र में महिलाओं को बारह हजार रुपए प्रति वर्ष देने का वादा किया था, उसके दूसरे ही दिन कांग्रेस की ओर से पंद्रह हजार रुपए प्रति वर्ष देने की मुनादी कर दी गई।

मजे की बात यह है कि कोई भी राजनीतिक दल यह नहीं बता रहा है कि इन रेवड़ियों को बांटने के लिए राज्य सरकारें पैसे कहां से लाएंगी। इसी सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि हमारी राजनीति में देश की आधी आबादी, यानी महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है।नारी-शक्ति वंदन जैसे भारी-भरकम शब्दों के पीछे का एक सच यह भी है कि हमारे राजनीतिक दल इस नारी-शक्ति पर भरोसा नहीं कर पा रहे।

यह सच्चाई बहुत कुछ बता देती है कि जिन पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, उनमें हमारे राजनीतिक दलों ने इतने कम महिला उम्मीदवार खड़े किए हैं कि उनके इरादों पर शक होने लगता है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों मुख्य दलों ने इन चुनावों में बारह प्रतिशत से भी कम महिला उम्मीदवार खड़े किए हैं।

बताया जा रहा है कि उम्मीदवारों का चयन उनके जीतने की संभावनाओं के आधार पर किया जाता है। इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों, महिला-शक्ति पर विश्वास नहीं करते।

टॅग्स :चुनाव आयोगविजयी उम्मीदवारों की सूचीमहिला आरक्षणकांग्रेसBJPAAP's Uttar Pradesh
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