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राजेश बादल का ब्लॉग: सियासत में वाणी का संयम बेहद जरूरी

By राजेश बादल | Updated: November 27, 2018 02:47 IST

क्या कोई इस दुष्प्रचार के पीछे छिपी चेतावनी समझ रहा है? इस चुनाव अभियान के जरिए राजनेता जितनी घटिया और निकृष्ट शब्दावली इस्तेमाल कर रहे हैं, उसे दुनिया का कोई सभ्य समाज स्वीकार नहीं करेगा। 

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अब तो वाकई हद हो गई है।  किसी ने सोचा था कि चुनाव-प्रचार के दौरान निंदा का स्तर इतना गिर सकता है? चरित्न से लेकर निजी जिंदगी और रिश्तों का सहारा लेकर हमारे राजनेता अपने प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ जबान का इतना जहर उगल रहे हैं कि अब आम आदमी उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है।

इस गंदी भाषा को सुनने में भी तकलीफ होने लगी है। एक दूसरे की जांघ उघाड़ने का यह कार्य बड़ी बेशर्मी से हो रहा है।  पार्टियां भूल रही हैं कि राजनीति के हमाम में सब नंगे हैं।  एक दूसरे के चेहरे पर कालिख पोत कर वे लोगों को अपना किस तरह का चेहरा दिखा रहे हैं।  भारतीय लोकतंत्न का यह एक शर्मनाक पहलू है। 

सवाल यह है कि सिलसिला कब तक चलेगा कितना नीचे जाएगा? हमारी निर्वाचन प्रणाली में अतीत की किताबों में बंद कई चमकदार अध्याय दम तोड़ रहे हैं।  कोई यकीन करेगा कि कभी एक ही मंच से पक्ष और प्रतिपक्ष के लोग चुनाव प्रचार किया करते थे! जिसके बैंक खाते में फूटी कौड़ी भी नहीं होती थी, वह भी शान से चुनाव लड़ता था।  जिसके पास जमानत के पैसे नहीं होते थे तो दोस्त चंदा करते थे।  

बेशक उस जमाने में अनेक प्रत्याशी ऐसे भी होते थे, जो पैसा पानी की तरह बहाते थे और किसी फकीर से चुनाव हार जाते थे।  याद होगा 1977 का चुनाव, जब रीवा के महाराजा मरतड सिंह को एक समाजसेवी फकीर और करीब-करीब नेत्नहीन यमुना प्रसाद शास्त्नी ने हरा दिया था।

  मरतड सिंह चुनाव लड़ने से पहले शास्त्नीजी के पैर छूकर आशीर्वाद लेते थे और पूरे प्रचार में उनके खिलाफ एक शब्द नहीं बोलते थे।आजादी के बाद इस संत ने गोवा के मुक्ति संग्राम में हिस्सा लिया था और पुर्तगाली पुलिस ने भारी यातनाएं दी थीं।  उनकी एक आंख इस पिटाई में चली गई थी। 

 बहरहाल,  यह तो एक बानगी है।  हमारे चुनाव इतिहास में ऐसे किस्से भरे पड़े हैं।  प्रचार अभियान में विरोधी की निंदा में शब्द तक नहीं निकलते थे।  चाहे वे किसी भी पार्टी के हों।  क्या इस चुनावी गाली-गलौज की संस्कृति से किसी सियासी पार्टी को कोई फायदा होता है? उत्तर है - एकदम नहीं।  चालीस बरस की पत्नकारिता में मेरे सामने ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब व्यक्तिगत निंदा का स्तर हद पार कर गया तो उस राजनीतिक पार्टी को कभी उसका लाभ नहीं मिला।  बात 1980 के लोकसभा चुनाव की। उसमें तत्कालीन प्रधानमंत्नी इंदिरा गांधी के खिलाफइतना घृणित प्रचार और विष वमन किया गया था कि वे शब्द इस आलेख में लिखना तक संभव नहीं।  श्रीमती गांधी इन आरोपों से आहत हुईं लेकिन उन्होंने कभी लक्ष्मण रेखा पार नहीं की।  

परिणाम यह कि उस चुनाव में वे शान से जीतीं और सरकार बनाई।  यह विश्व बिरादरी के लिए हैरत की बात थी कि जिस महिला नेत्नी को आपातकाल लगाने के कारण एक तरह से खलनायिका बता दिया गया हो, सिर्फ तीन साल में वह सत्ता में धमाकेदार वापसी करती है। 

 इसके बाद 1990 में राजीव गांधी को बोफोर्स मामले में कितने निंदनीय आरोपों का सामना करना पड़ा।  विपक्ष ने चरित्न हनन से लेकर सारे वे गंदे आरोप लगाए, जो शालीनता की परिधि में नहीं आते। तब से आरोप आज तक सिद्ध नहीं हुए।  जो विश्वनाथ प्रताप सिंह सभाओं में डायरी दिखा कर घूस लेने वालों के नाम उजागर करने की धमकी देते थे, वे कुछ भी साबित नहीं कर पाए।  उनके बाद के लोग भी आरोप प्रमाणित नहीं कर पाए। 

 राजीव के खिलाफ क्या क्या नहीं कहा गया। नतीजा क्या निकला? एक बार फिर कांग्रेस।  यह भी याद करना चाहिए कि 2004 के चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बारे में सारी मर्यादा ताक में रख दी गई।  इंदिरा गांधी की तरह ही व्यक्तिगत टिप्पणियों ने उस चुनाव प्रचार अभियान में लोगों को हैरान कर दिया था।  परिणाम क्या हुआ? यूपीए सत्ता में आई।  

अटलजी की सारी पुण्याई इस निंदा अभियान की बलि चढ़ गई।  इसके बाद 2014 के चुनाव में निंदा की सारी हदें पार कर दी गईं।  चूंकि दस बरस का यूपीए शासन और मनमोहन सिंह से नापसंदगी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्नी बनाया।  मगर नहीं भूलना चाहिए कि 2002 के बाद गुजरात के विधानसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के खिलाफ क्या क्या नहीं बोला गया।  किस शर्मनाक शब्दावली का उपयोग नहीं किया गया।  

इस व्यक्तिगत निंदा मुहिम के चलते ही गुजरात में भाजपा बार-बार चुनाव जीतती रही। यह इस बात का सबूत है कि निजी निंदा इंसान को अंदर से मजबूत भी बना देती है।  असल में जब तर्क की कसौटी पर आलोचना कमजोर पड़ती है तो वह चीख-पुकार और असंयमित-अभद्र व्यवहार का रूप धारण कर लेती है।   इस बार पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के दरम्यान भी पार्टियां जहर बुङो तीर चला रही हैं। 

 माता - पिता, नाना - नानी, पत्नी और परिवार के सदस्यों के विरोध में कुछ भी बोला जा रहा है।  नेताओं पर इन तीरों का कोई असर नहीं होता लेकिन मतदाता घायल हो जाता है।  उसका मन व्यथित होता है।  जैसे जैसे हिंदुस्तान आगे जा रहा है, भारतीय अधिक साक्षर और जागरूक हो रहे हैं तो आचरण और अभियान में हमारे नियंता आदिम युग की तरफ बढ़ते नजर आते हैं।  

क्या कोई इस दुष्प्रचार के पीछे छिपी चेतावनी समझ रहा है? इस चुनाव अभियान के जरिए राजनेता जितनी घटिया और निकृष्ट शब्दावली इस्तेमाल कर रहे हैं, उसे दुनिया का कोई सभ्य समाज स्वीकार नहीं करेगा। 

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