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राजेश बादल का ब्लॉग: अपने ही भ्रम जाल में उलझ गया है अमेरिका

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: June 30, 2020 13:51 IST

गलवान घाटी में जिस रात भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसा हुई, उसके बाद तीन दिनों तक अमेरिका की चुप्पी रही। पहले भी कई मौकों पर अमेरिका का रवैया ऐसा रहा है कि कोई देश उसके बारे में अतिम राय नहीं बना सकता।

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बयानों के जरिए किसी देश को भरमा कर रखने की कला में अमेरिका से बड़ा हुनरमंद कोई नहीं. बीते दिनों भारत के बारे में उसके रवैये की ड्रिब्लिंग एक बार फिर सामने आई. इस रवैये की खास बात यह है कि वह सामने वाले मुल्क को अपने बारे में कोई अंतिम राय बनाने का अवसर नहीं देता. अनेक देश अमेरिका की इस फिरकी में अनंत काल तक फंसे रहते हैं. प्रतीक्षा में प्रेमिका बूढ़ी हो जाती है. नायक न शादी करता है और न ही रिश्ता तोड़ता है. अरसे तक विकासशील देश उसकी इस अदा पर फिदा रहे हैं और अपने अनमोल दशक बर्बाद करते रहे हैं.

सिर्फ कनाडा और चंद गोरे देश उसके साथ स्थाई रिश्तों की डोर में बंधे हुए हैं. लेकिन अब उनका भी मोहभंग होने लगा है. अमेरिका अपने फैलाए इस भ्रमजाल का शिकार होता दिखाई देने लगा है. उसका दोहरा चरित्र अब काम नहीं आ रहा है.

याद कीजिए भारत और चीन के बीच जिस रात गलवान घाटी में हिंसा हुई, उसके तीन दिन तक अमेरिका की चुप्पी हैरान करने वाली थी. जब उसने यह खामोशी तोड़ी तो सिर्फ यह कहा कि भारतीय शहीदों और उनके परिवारों के साथ अमेरिका सहानुभूति प्रकट करता है. उसी रात विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने चीनी राजनयिक येंग झी ची के साथ होनोलुलु में रात्रिभोज किया. जिस चीन को वह महीनों से पानी पी-पीकर कोस रहा था, उसी के साथ सुरक्षा, कारोबार, कोरोना तथा अन्य वैदेशिक मामलों में रिश्ते बेहतर बनाने पर चर्चा की.

हांगकांग और ताइवान पर मतभेदों का जिक्र हुआ लेकिन भारत पर दोनों चुप रहे. इसके बाद जब रक्षामंत्री राजनाथ सिंह रूस गए तो अमेरिका ने कहा कि कारोबारी समझौते का पालन होने पर चीन से व्यापार बेहतर होगा. दो-तीन दिन ही बीते थे कि पोम्पियो ने फिर कहा कि अमेरिका चीन से सुरक्षा के मद्देनजर यूरोप से हटाकर एशिया में अपनी सेना तैनात करेगा. इसके साथ ही उसने पेशेवरों के लिए एच-1बी एक साल के लिए निलंबित करने का ऐलान कर दिया. इससे सत्तर से अस्सी फीसदी भारतीयों पर उल्टा असर पड़ेगा.

आप कह सकते हैं कि वह एक कदम भारत की ओर बढ़ाता है और दो कदम पीछे खींच लेता है. भारत ने उसके इस रवैए का बीते सत्तर साल में बड़ा नुकसान उठाया है. कभी पाकिस्तान से संबंध एकदम सुधरते दिखाई दिए तो अमेरिका ने टांग अड़ा दी. कभी चीन और रूस से दोस्ताना ताल्लुक गहरे करने का प्रयास हुआ तो उसने क्षति पहुंचाई. ताजा मामला ईरान से तेल आयात बंद करने का है. इससे भारत को कारोबारी और रणनीतिक झटका लगा है. जब कोई परदेसी आपकी निजी जिंदगी में इतना दखल देने लगे कि आपके हाथ-पांव बंध जाएं तो फिर एकनिष्ठा की शपथ तोड़ने में क्यों देरी करनी चाहिए.

इतिहास के जानकारों को याद होगा कि भारत और पाकिस्तान के बीच अमेरिका और ब्रिटेन ने पचास और साठ के दशक में कई बार मध्यस्थता का प्रयास किया, लेकिन हर बार उनका जोर भारत पर कश्मीर को छोड़ने और पाकिस्तान की स्थायी दोस्ती खरीदने पर रहा. करीब साठ बरस पहले बारह साल तक अमेरिका ने पाकिस्तान को आठ सौ करोड़ रुपए के हथियारों की निरंतर आपूर्ति की. यह अमेरिका ही था जिसने भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर मसले का अंतरराष्ट्रीयकरण किया.

अमेरिका ने ही सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान का समर्थन किया और कच्छ और कश्मीर पर उसके हमले की निंदा नहीं होने दी. याद कीजिए 1971 के युद्ध में उसने अपना समुद्री बेड़ा तो भारत के खिलाफ भेज ही दिया था. तत्कालीन सोवियत संघ ने अपनी जवाबी कार्रवाई नहीं की होती तो हिंदुस्तान की शत्रु सूची में अमेरिका का नाम स्थायी तौर पर दर्ज हो जाता. क्या भारत भूल सकता है कि कारगिल युद्ध के समय रिरियाते पाकिस्तान ने अमेरिका की शरण में ही जाकर भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से बात करने की गुहार लगाई थी.

कुछ साल पहले अमेरिका ने ही आतंकवाद के नाम पर पाकिस्तान की आर्थिक सहायता रोकने का फैसला किया था और इसके कुछ दिन बाद उसी ने पाकिस्तानी सेना को प्रशिक्षण देने का एक समझौता किया. साल भर तक वह तालिबान से समझौते के लिए चोरी-छुपे पाकिस्तान की सहायता लेता रहा. उनके साथ बैठकें करता रहा और उनसे भारत को बाहर रखता रहा.

एक तरफ पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ओसामा बिन लादेन को ‘शहीद’ कहते हैं, अमेरिकी रक्षा सूत्र पकिस्तान को आतंकवाद का अड्डा कहते हैं तो दूसरी तरफ वे अमेरिकी फौजियों के लिए पाकिस्तान की सैकड़ों एकड़ जमीन का लड़ाकू इस्तेमाल करते हैं.  यह अमेरिका की कौन सी नीति  मानी जाए ?

 आज हम पाते हैं कि अमेरिका अपनी दो कदम आगे, चार कदम पीछे हटने की नीति के चलते ही विश्व मंच पर अपनी चौधराहट को बट्टा लगा चुका है. चीन का मसला हो या फिर ईरान का, उत्तर कोरिया का मुद्दा हो अथवा अफगानिस्तान का. कमोबेश सभी इन सभी राष्ट्रों के साथ उसने अपना रवैया बदला और फिर कुछ समय बाद अपने पुराने र्ढे पर आ गया.

दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क के इतिहास का यह एक ऐसा कमजोरी भरा अध्याय है, जिसे उस देश के राजनेता और नागरिक शायद ही भविष्य में कभी याद रखना चाहें. हिंदुस्तान तो पहले ही दूध का जला है इसलिए छाछ भी फूंक-फूंक कर पी रहा है.

टॅग्स :चीनअमेरिकाइंडिया
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