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रहीस सिंह का ब्लॉग: मंदी की ओर तो नहीं जा रही भारतीय अर्थव्यवस्था!

By रहीस सिंह | Updated: May 12, 2019 07:12 IST

रथिन रॉय ने अपने एक इंटरव्यू में कहा है कि भारत स्ट्ररल क्राइसिस यानी ढांचागत संकट की ओर बढ़ सकता है. उनका यह भी कहना है कि इस आने वाले संकट को देखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि भारत जल्द ही मिडिल-इनकम ट्रैप में फंस सकता है।

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ठळक मुद्देरथिन रॉय के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था ढांचागत संकट की ओर बढ़ सकती है।भारतीय अर्थव्यवस्था अगर 'लोअर मिडिल इनकम रेंज' में फँस गई तो इससे निकलना मुश्किल होगा।

मार्केट में जब सब कुछ ठीक चल रहा हो तब अर्थशास्त्री तो यह अनुमान लगा सकते हैं कि इसमें किसी भी तरह का डिस्टरबैंस उत्पन्न करने पर भविष्य में किस तरह का और कहां-कहां असर दिख सकता है लेकिन गैर-अर्थशास्त्री राजनीतिक नेतृत्व उन प्रभावों को आकलन नहीं कर पाता। इसलिए यह अपेक्षा की जा सकती है कि कम से कम वित्त मंत्री तो अवश्य ही अर्थशास्त्र का जानने वाला हो। अन्यथा लोकप्रियता की राजनीति और लाइट-कैमरा-एक्शन की अर्थनीति बड़ी चुनौतियां उत्पन्न कर देती है। भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में भी इस समय के लिए कुछ ऐसा ही कहा जा सकता है। यह बात प्रधानमंत्री की इकोनाॅमिक एडवाइजरी काउंसिल के सदस्य और नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ पब्लिक फाइनेंस एण्ड पाॅलिसी के रथिन राॅय के इंटरव्यू तथा ब्लूमबर्ग और नील्सन के सर्वे को देखने के बाद बहुत हद तक स्वीकार की जा सकती है। 

रथिन राॅय ने अपने एक इंटरव्यू में कहा है कि भारत स्ट्रक्चरल क्राइसिस यानि ढांचागत संकट की ओर बढ़ सकता है। उनका यह भी  कहना है कि इस आने वाले संकट को देखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि भारत जल्द ही मिडिल-इनकम ट्रैप में फंस सकता है, जैसा कि ब्राजील या दक्षिण अफ्रीका के लिए दुनिया के अर्थशास्त्री चेतावनी दे रहे हैं। वे मानते हैं कि जो कोई भी देश मिडिल-इकनम ट्रैप में फंसा वह  इसकी गिरफ्त से बाहर निकल पाने में सक्षम नहीं हुआ। सवाल यह उठता है कि वे आखिर इस निष्कर्ष पर क्यों पहुंचे?

विशेष बात यह है कि इकोनाॅमिक टाइम्स इंटेलिजेंस ग्रुप सर्वे ने भी अभी कुछ दिन पहले ही बताया था कि भारत की खपत की कहानी गम्भीर रूप ले रही है विशेषकर आॅटो, एफएमसीजी और हवाई यात्रा जैसे कई क्षेत्रों की पिछले कई तिमाहियों से ग्रोथ गिरती जा रही है। अध्ययन बताता है कि मनी सप्लाई घट रही है, अनिश्चितता बढ़ रही है और शहरी व ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में आय वृद्धि में कमी आ रही है जिसके कारण लोग खर्च में कटौती के लिए विवश हैं। ये तथ्य भारतीय अर्थव्यवस्था को चेतावनी दे रहे हैं।

कारण यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का अब ड्राइवर केवल कंजप्शन (खपत) था और इसी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गति प्रदान कर रखी थी। अब मैक्रो  (जैसे घरेलू बचतें) और माइक्रो (जैसे सेक्टर एवं कम्पनी का आयतन) डाटा गिरावट दिखा रहे हैं। ध्यान रहे कि खपत में कमी आय में कमी के कारण उपजी है लेकिन खपत में कमी मांग में कमी लाएगी और मांग में कमी उत्पादन को संकुचित करेगी। उत्पादन में कमी श्रम की मांग को कमजोर करेगी और श्रम की मांग कमजोर हुयी तो एक तरफ बेरोजगारी बढ़ेगी और दूसरी खपत में और कमी आएगी। यदि ये कुचक्र निर्मित हो गया तो फिर स्थितियां बेहद जटिल हो जाएंगी और अर्थव्यवस्था को पुनः ट्रैक पर लाना मुश्किल हो जाएगा।

विश्व बैंक की लोअर मिडिल इनकम रेंज 

विश्व बैंक द्वारा देशों की ‘लोअर मिडिल इनकम रेंज’ को परिभाषित किया गया है जिसके अनुसार इसकी सीमा 996 डाॅलर और 3895 डाॅलर प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (जीएनआई) के बीच होनी चाहिए। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2017 के आंकड़ों के आधार पर एक भारत की प्रतिव्यक्ति सकल राष्ट्रीय औसत आय 1795 डाॅलर के आसपास है यानि आधे से कम। जबकि इसी समान अवधि में चीन की प्रतिव्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय 8690 डाॅलर रही जो अपर मिडिल इनकम रेंज के आधे से अधिक है। उल्लेखनीय है वल्र्ड बैंक के अनुसार अपर मिडिल इनकम रेंज 3896 डाॅलर और 12055 डाॅलर प्रतिव्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय के बीच है।

भारत में 10 करोड़ उपभोक्ता विकास की गाथा लिख रहे थे लेकिन वे कंजप्शन इंजिन बने रहने से पीछे हटते दिख रहे हैं। यह सच है कि हमारी अर्थव्यवस्था का ग्रोथ इंजन निर्यात नहीं था बल्कि कंजप्शन था। और कंजप्शन इसलिए था क्योंकि लोगों में खरीदने की क्षमता और इच्छा दोनों ही थीं। नोटबंदी ने इस खपत-मांग-उत्पाद चक्र को करारा झटका दिया। परिणाम यह हुआ कि मध्यम वर्ग की खपत की गति धीमी पड़ने लगी। अब तो वित्त मंत्रालय भी यह स्वीकार कर रहा है कि भारत की अर्थव्यवस्था वर्ष 2018-19 के लिए थोड़ी धीमी हो गयी है। काश और भी सच्चाईयों से सरकार और वित्त मंत्रालय पहले से ही रूबरू हुआ होता और उन्हें आगे बढ़कर स्वीकार करता ताकि सुधार संभव हो सकता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

रथिन राॅय ने दो बातों पर और फोकस किया है। पहला यह कि अब अर्थव्यवस्था की चाल धीमी होगी, हो सकता है कि भारत मिडिल इनकम रेंज पर ही अटका रहे। इसका मतलब हुआ कि भारत कभी भी दक्षिण कोरिया या चीन नहीं बन पाएगा, वह दक्षिण अफ्रीका या ब्राजील  बास्केट की प्रतिकृति बन सकता है। दूसरा यह है कि भारत विश्व की सबसे तेज गति से चलने वाली अर्थव्यवस्था है, यह सिर्फ रोचक बहस का एक पहलू है। भारतीय अर्थव्यवस्था की ग्रोथ सबसे तेज इसलिए है क्योंकि चीन की ग्रोथ धीमी हो गयी है। हालांकि वे यह मानते हैं कि 6.1 से 6.6 प्रतिशत की ग्रोथ रेट खराब नहीं है, लेकिन खपत में आ रही कमी खतरे पैदा कर रही है।

सिकुड़ता हुआ एफएमसीजी बाज़ार 

इसी प्रकार से मार्केट फर्म नील्सन ने अपने अध्ययन में कहा है कि एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स) का मार्केट सिकुड़ रहा है और एफएमसीजी इक्विटी मार्केट नकारात्मक रूप से रेस्पांड कर रहा है। चार एफएमसीजी कम्पनियां-ब्रिटानिया इण्डस्ट्रीज, डाबर, गोदरेज कंज्यूमर प्राॅडक्ट्स प्राइवेट लि. और हिन्दुस्तान यूनीलीवर की तिमाही ग्रोथ में स्लोडाउन देखा गया है। खास बात यह है कि हिन्दुस्तान यूनीलीवर प्रबंधन ने संकेत दिया है कि ग्रामीण कंजप्शन में आ रही कमी के कारण मार्केट ग्रोथ में स्लोडाउन आ रहा है। इसके कारणों को भी पीछे जाकर देखने होंगे यानि 8 नवम्बर 2016 की शाम तक।

लगभग दो वर्ष पहले लगे झटके ने कृषि आय में कमी की और लागत कीमत को बढ़ा दिया। चूंकि फसलों के दाम नीचे रहे या किसानों को लागत कीमत के हिसाब से मूल्य नहीं मिला। फलतः कृषि क्षेत्र के लिए नॉमिनल ग्रॉस डोमेस्टिक प्रॉडक्ट में ग्रोथ अक्टूबर-दिसंबर 2018 में 2 रही, जो अप्रैल-जून 2012 के बाद किसी भी तिमाही में सबसे कम थी। दूसरा कारण जीएसटी की जटिलता रही और तीसरा कारण इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज के पिछले साल सितंबर में डिफॉल्ट से पैदा हुआ लिक्विडिटी क्रंच रहा। 

जो भी हो, अब सवाल यह उठता है कि क्या यह मान लिया जाए कि एफएमसीजी मार्केट में आ रही मंदी अर्थव्यवस्था में रिसेशन (सुस्ती अथवा मंदी) का संकेत है। कुछ अर्थशास्त्रियों की राय यह है कि इसे रिसेशन के प्रमाण के तौर पर माना जा सकता है क्योंकि भारतीय यही वह घटक है जो रिसेशन से लड़ सकता है। इसलिए इसके कमजोर पड़ने का अर्थ है अर्थव्यवस्था की खपत-मांग-पूर्ति चक्र को कमजोर कर देना। हालांकि कुछ अर्थशास्त्री ऐसा नहीं भी मानते हैं। लेकिन सच यही है कि शहरों से लेकर गांवों तक लोगों की इनकम ग्रोथ सुस्त पड़ी है और इकोनॉमी में मनी सप्लाई कम हुयी है। इस कारण से मांग और खपत पर नकारात्मक असर हुआ। जो सुस्ती का संकेत हैं। खास बात यह है कि पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने भी आगाह किया है कि अर्थव्यवस्था सुस्ती की राह पर जा रही है। 

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