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Lok Sabha Elections: भाजपा को आसानी से बहुमत मिलेगा या नहीं, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बंगाल से पता चलेगा, चार राज्यों में कठिन चुनौती

By अभय कुमार दुबे | Updated: March 5, 2024 11:03 IST

Lok Sabha Elections 2024: ध्यान रहे 2019 में उत्तर प्रदेश के मैदान में भाजपा को सपा-बसपा गठबंधन का सामना करना पड़ा था.

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ठळक मुद्देखरा न उतर पाने के बावजूद उस गठजोड़ ने एनडीए से दस सीटें छीन ली थीं. भाजपा भी जानती है कि बिना केमिस्ट्री की मैथमेटिक्स भी उसे परेशानी में डाल सकती है.भाजपा दो बड़े प्रदेशों में विपक्ष के मजबूत अंकगणित का सामना कर रही है.

Lok Sabha Elections 2024: भाजपा को आसानी से बहुमत मिलेगा या नहीं, यह बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बंगाल बताने वाला है. भाजपा रणनीतिक प्रबंधन में उस्ताद है. लेकिन इन चारों राज्यों में इस बार उसकी कड़ी परीक्षा होने वाली है. यहां विपक्ष के पास गणित भी है, और कुछ-कुछ रसायनशास्त्र भी है. इसीलिए यहां भाजपा की संगठन-संसाधन शक्ति दांव पर लगी है. ध्यान रहे 2019 में उत्तर प्रदेश के मैदान में भाजपा को सपा-बसपा गठबंधन का सामना करना पड़ा था. उस समय भी कोई केमिस्ट्री उसके साथ नहीं थी, इसलिए सामाजिक रूप से शक्तिशाली होते हुए भी वह मतदाताओं के सामने मोदी का विकल्प बन कर नहीं उभर पाया था. मोदी की हवा तेज थी, इसलिए उप्र में भाजपा के वोटों में ‘खासा इजाफा’ हो गया था.

यह उस ‘विफल’ अंकगणित का ही परिणाम था कि अपनी संभावनाओं पर खरा न उतर पाने के बावजूद उस गठजोड़ ने एनडीए से दस सीटें छीन ली थीं. जाहिर है कि भाजपा भी जानती है कि बिना केमिस्ट्री की मैथमेटिक्स भी उसे परेशानी में डाल सकती है. भाजपा दो बड़े प्रदेशों में विपक्ष के मजबूत अंकगणित का सामना कर रही है.

ये हैं बिहार और महाराष्ट्र. बिहार का महागठबंधन और महाराष्ट्र की महा विकास आघाड़ी दरअसल इंडिया गठबंधन के पहले से चल रहे हैं. उनके कदम अपने-अपने प्रदेश की जमीनों में जमे हुए हैं. इन राज्यों में मिला कर 88 सीटें हैं, और यहां भाजपा ने पिछली बार तकरीबन सौ फीसदी नतीजा निकाला था.

इस बार स्वयं भाजपा के खाते में ये दोनों प्रदेश उसकी कमजोर कड़ियां हैं. इनकी मरम्मत करने के लिए भाजपा के रणनीतिकारों ने पहले जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा को महागठबंधन से छीना. हाल ही में नीतीश कुमार के पालाबदल से एक बारगी ऐसा लगा था कि शायद अब भाजपा विपक्षी तालमेल से आगे निकल जाएगी.

लेकिन एक सर्वेक्षण के अनुसार ऐसा नहीं लगता. इसी तरह एक सर्वेक्षण से यह भी लगता है कि अभी भी महागठबंधन भाजपा को करारी टक्कर देने की स्थिति में लग रहा है. तेजस्वी यादव की जन-विश्वास यात्रा को वहां जबरदस्त सफलता प्राप्त हुई है. करीब 3500 किमी चलने के बाद जब उन्होंने पटना के गांधी मैदान में रैली की, तो वहां जिस तरह का विशाल नजारा बना.

वह कह रहा था कि बिहार में भाजपा और एनडीए को नुकसान हो सकता है. इसके अलावा एक और  पहलू है. भाजपा के लिए बिहार में टिकटों की हिस्सेदारी का फार्मूला निकालना भी मुुश्किल हो रहा है. नीतीश को पिछली बार से कम सीटों पर राजी न कर पाने की सूरत में भाजपा के लिए छोटे दलों की मांग पूरी कर पाना कठिन हो रहा है.

महाराष्ट्र की स्थिति भी लगभग ऐसी ही है. वहां शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस को तोड़ देने क बावजूद भाजपा अभी तक जिताऊ स्थिति में नहीं आ पाई है. ये टूटी हुई पार्टियां लोकसभा चुनाव में कैसा प्रदर्शन करेंगी, इसे नापने का कोई बैरोमीटर नहीं है. समझा जाता है कि उद्धव ठाकरे को अभी भी शिवसेना के जनाधार की हमदर्दी प्राप्त है.

इसी तरह से शरद पवार की एनसीपी के कदम अजित पवार के चले जाने के बावजूद अपने पारंपरिक इलाकों में जमे हुए हैं. वहां भी भाजपा अपने-आपको पीछे पाती है. बिहार की ही तरह वहां भी टिकटों का बंटवारा पेचीदा है. एक तीसरा राज्य और है जहां भाजपा ने सौ फीसदी सफलता प्राप्त की थी. यह है कर्नाटक. उस कामयाबी को दोहराने के लिए भाजपा ने जनता दल (सेकुलर) के साथ गठजोड़ करके लिंगायत और वोक्कालिगा वोटों को अपने पक्ष में जोड़ने की कोशिश की है. लेकिन एक बड़ा सवालिया निशान वहां भी है.

कांग्रेस वहां सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार के नेतृत्व में ‘अहिंदा’ की रणनीति पर चल रही है. इसी के जरिए उसने विधानसभा चुनाव जीता था. अल्पसंख्यकों और पिछड़े वोटों को एकजुट करने और उसमें कुछ-कुछ दूसरे समुदायों के वोटों को मिला कर लिंगायतों और वोक्कालिगाओं के प्रभुत्व को निष्प्रभावी करने की यह रणनीति दिवंगत देवराज अर्स ने तैयार की थी.

विधानसभा चुनाव में कांग्रस ने ओल्ड मैसूर में वोक्कालिगाओं के और बाकी क्षेत्रों में लिंगायतों के वोट अच्छी खासी संख्या में प्राप्त किए थे. अगर लोकसभा में उस गोलबंदी को वह फिर से दोहरा सकती है, तो इस बार भाजपा का स्ट्राइक रेट कम हो सकता है. चौथा राज्य पश्चिम बंगाल है जहां भाजपा अपनी सीटें घटने के अंदेशे का सामना कर रही है.

पिछली बार उसने 18 सीटें जीत कर सभी को चौंका दिया था. तृणमूल कांग्रेस अपने खिलाफ चल रही एंटीइनकम्बेंसी की गंभीरता को समझ नहीं पाई थी. लेकिन, इस बार ममता बनर्जी वहां चौकन्नी हैं. संदेशखाली पर भाजपा के आक्रामक रवैये और टीएमसी की गलतियों के बावजूद वे लोकसभा में भाजपा को पिछला प्रदर्शन नहीं दोहराने देंगी. भाजपा ने चुनाव से पहले सीएए लागू करने की घोषणा करके मतुआ वोटरों को एक बार फिर अपनी ओर खींचने की कोशिश की है. बंगाल का यह संघर्ष बहुत जबरदस्त होने वाला है.

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