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पवन के. वर्मा का ब्लॉग: कानून के स्वैच्छिक पालन की प्रवृत्ति का अभाव

By पवन के वर्मा | Updated: September 22, 2019 06:37 IST

अगर हम यह मानते हैं कि एक समाज के रूप में केवल गंभीर दंडात्मक उपाय ही हमें बेहतर नागरिक बना सकते हैं तो यह हमारे लिए बहुत बड़ा सबक है.

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ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन के लिए चालान दरों में अत्यधिक वृद्धि की वांछनीयता पर जनता की राय बंटी हुई है. कुछ लोग मानते हैं कि इससे यातायात नियमों के पालन के लिए जरूरी अनुशासन लोगों में पैदा होगा.जबकि कुछ अन्य का मानना है कि वृद्धि दर बहुत ज्यादा है और इससे आम नागरिकों पर भारी बोझ पड़ेगा. सच्चाई इन दोनों के बीच में ही कहीं है.

यह सच है कि जुर्माने की नई दरें पुरानी दरों की तुलना में कई गुना ज्यादा हैं. अब यदि आप रेड लाइट जम्प कर रहे हैं तो पहले के सौ रु. के मुकाबले दस गुना अर्थात एक  हजार रु. का फाइन लगेगा. यदि आप गति सीमा का उल्लंघन करते हैं तो दो सौ रु. के बजाय दो हजार रु. जुर्माना भरना पड़ेगा. सीट बेल्ट लगाए बिना गाड़ी चलाते हैं तो एक हजार रु. भरना पड़ेगा. शराब पीकर गाड़ी चलाने पर दो हजार नहीं बल्कि दस हजार रु. का दंड लगेगा. बिना लाइसेंस के गाड़ी चलाते पाए जाएंगे तो पांच सौ नहीं बल्कि उसका दस गुना अर्थात पांच हजार रु. जुर्माना भरना पड़ेगा.  इसी तरह कुछ नए जुर्माने भी जोड़े गए हैं जिनकी सख्त जरूरत महसूस की जा रही थी. एम्बुलेंस को रास्ता नहीं देने पर पहले कोई जुर्माना नहीं था, लेकिन अब इस अपराध के लिए दस हजार रु. का जुर्माना देना होगा. इसी प्रकार नाबालिग के कार चलाने पर अब इसके लिए 25 हजार रु. के जुर्माने का प्रावधान किया गया है. इसके अलावा कार का पंजीकरण रद्द करने के साथ कार के मालिक को भी दोषी ठहराया जा सकता है.

इस बेतहाशा वृद्धि के पीछे उद्देश्य वाहन मालिकों को यातायात नियमों का पालन करने के लिए मजबूर करना है. स्पष्ट तर्क यह है कि जब तक कोई भय नहीं दिखाया जाएगा, लोग यातायात नियमों के पालन पर ध्यान नहीं देंगे. वास्तव में  हमारी सड़कों पर अस्त-व्यस्त यातायात के पीछे यही प्रचलित रवैया दिखाई देता है. जहां तक यातायात नियमों के अनुपालन का सवाल है, अनुशासनहीनता के मामले में भारत को सबसे पहले स्थान पर रखा जा सकता है. ड्राइवर यातायात नियमों की धज्जियां उड़ाते हैं, ट्रैफिक लाइट्स का माखौल उड़ाते हैं और प्रतिबंधित क्षेत्रों में खूब हॉर्न बजाते हैं. वे किसी भी लेन में घुस जाते हैं, किसी भी तरफ से ओवरटेक कर लेते हैं, गति सीमा की परवाह नहीं करते, सीट बेल्ट या हेलमेट को वैकल्पिक उपकरण समझते हैं, प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्रों की आवश्यकता की अनदेखी करते हैं, वाहन से संबंधित आवश्यक दस्तावेजों को साथ रखने की जरूरत नहीं समझते और सड़कों को अपनी निजी जागीर समझते हैं.

इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं कि इस दिशा में कुछ करने की आवश्यकता थी. लेकिन दिलचस्प यह है - और जनता के रूप में हमारी मनोवृत्ति को समझने का जरिया भी - कि सरकार का निष्कर्ष है कि केवल कठोर दंडात्मक उपायों के जरिये ही वह लोगों से इन नियमों का पालन करवा सकती है. दूसरे शब्दों में, हम एक नागरिक के रूप में स्वेच्छा से नियमों का पालन नहीं करते हैं. अपनी आदतों को स्वेच्छा से बदलने को हम तैयार नहीं होते. कानून के शासन के महत्व को महसूस करने के लिए हम डरते हैं तो सिर्फ डंडे से (अथवा इस मामले में अत्यधिक जुर्माने से).

इस अर्थ में, क्या हम मूल रूप से अन्य देशों के नागरिकों से अलग हैं? यातायात नियमों का अधिकांश देशों में बड़े पैमाने पर पालन किया जाता है, उन देशों में भी जहां इस तरह का भारी जुर्माना नहीं लगाया गया है. सार्वजनिक नियमों का स्वेच्छा से पालन करने की भावना हमारे भीतर क्यों नहीं है? अगर हम यह मानते हैं कि एक समाज के रूप में केवल गंभीर दंडात्मक उपाय ही हमें बेहतर नागरिक बना सकते हैं तो यह हमारे लिए बहुत बड़ा सबक है. क्या तब हमें  सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फैलाने, कतार तोड़ने, महापुरुषों की प्रतिमाओं की अवमानना करने या सार्वजनिक संपत्ति की तोड़-फोड़ करने पर भी इसी तरह का भारी जुर्माना नहीं लगाना चाहिए? क्या इसका मतलब यह है कि एक बेहतर नागरिक समाज बनाने के संबंध में हमारी पूरी मानसिकता को बदलने की जरूरत है?

इसका एक और महत्वपूर्ण पहलू है. क्या हम प्रशासनिक व्यवस्था को बदले बिना केवल दंडात्मक व्यवस्था के बल पर बदलाव ला सकते हैं? यह कोई रहस्य नहीं कि पुलिस व्यक्तिगत कमाई के एक आकर्षक स्नेत के रूप में ट्रैफिक चालान को देखती है. हम इस भ्रष्टाचार को कैसे रोक सकते हैं? क्या इस अत्यधिक बढ़े हुए जुर्माने से ट्रैफिक पुलिस कर्मियों के लिए बेहिसाब कमाई करने का सुनहरा द्वार नहीं खुल जाएगा?

कुल मिलाकर, कड़वा सच यही प्रतीत होता है कि दंडात्मक उपाय किसी भी समाज के लिए आवश्यक हैं. हमारे लिए यह विशेष रूप से प्रासंगिक है, क्योंकि हम तब तक बदलाव के लिए अनिच्छुक दिखाई देते हैं जब तक कि हमें कानून तोड़ने पर भारी दंड भुगतने का भय न दिखाया जाए. शायद इस सच्चाई का अहसास सहस्त्रब्दियों पहले हो गया था. चाणक्य का इस बारे में स्पष्ट विचार था कि समाज की भलाई की खातिर लोगों को नियमों के अनुसार चलाने के लिए एक दंडात्मक प्रणाली होना जरूरी है. यह प्रणाली निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रभावी होनी चाहिए, लेकिन हद से ज्यादा बोझ डालने वाली नहीं होनी चाहिए. क्या सरकार चाणक्य के इस अर्थशास्त्र को समझेगी?

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