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अटल वाजपेयी जी की राजनीति के आत्मसंघर्ष

By अभय कुमार दुबे | Updated: August 22, 2018 02:40 IST

अगर इन भीतरी संघर्षो में वाजपेयी हार गए होते तो दक्षिणपंथी राजनीति अपने सर्वाधिक उदार नेता और उसकी उदारतावादी राजनीति से वंचित रह जाती। 

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अटल बिहारी वाजपेयी को मिली श्रद्धांजलियां सुन और पढ़ कर ऐसा लगता है कि एक राजनेता के तौर पर उनका व्यक्तित्व उनकी कविताओं और सांस्कृतिक शख्सियत के पीछे कहीं छिप गया है। यह एक विडंबना ही है कि जो व्यक्ति मुख्य तौर से एक राजनीतिज्ञ था, उसे उसके राजनीतिक कौशल और उसके जरिए लोकतांत्रिक सार्वजनिक जीवन में उसके योगदान को याद करने में संकोच किया जाए। हम जानते हैं कि इस देश में कवि होना और यहां तक कि अच्छा कवि होना एक तरह से आसान है। लेकिन आज के जमाने में अच्छा नेता होना आसान नहीं है। अस्सी के दशक के बाद से ही भारतीय लोकतंत्र के लिए कठिन समय चल रहा है, और अटलजी की यह अनूठी उपलब्धि थी कि उन्होंने इस मुश्किल वक्त को दूसरों के मुकाबले बेहतर तरीके से गुजार कर दिखाया। जाहिर है कि वे संत नहीं थे। उन्होंने अपनी पार्टी के बाहर और भीतर जम कर राजनीतिक प्रतियोगिता की, हर तरह के दांव-पेंच किए और शीर्ष पर पहुंचे। इस प्रक्रिया में पचास साल से भी ज्यादा समय तक उन्होंने कई अंतर्विरोधों और विरोधाभासों का सामना किया। लेकिन बड़ी कुशलता से वे उन उलझनों से निकल आए। 16 अगस्त को जब उनके देहांत की घोषणा हुई, तो उनका दामन पूरी तरह बेदाग था। वे यही चाहते थे कि उनका गमन इसी तरह से हो।

मैं यहां राजनीतिक होड़ के उन चार क्षणों को विश्लेषित करना चाहूंगा जिनका अटलजी के राजनीतिक जीवन के लिए बहुत महत्व है। पहला क्षण वह है जब साठ और सत्तर के दशक में उन्होंने भारतीय जनसंघ के भीतर बलराज मधोक जैसी हस्ती से लोहा लिया। मधोक भी वाजपेयी की तरह प्रभावशाली वक्ता (शायद उतने मोहक नहीं), विचारधारात्मक रूप से दृढ़, लेखक, सिद्धांतकर्ता और एक प्रेरक संगठनकर्ता थे। उनके नेतृत्व में जनसंघ चुनाव के मैदान में प्रगति करता हुआ प्रतीत भी हो रहा था। वे वाजपेयी से नाखुश रहते थे और उन्होंने संघ परिवार के भीतर वाजपेयी को लेकर गुरु गोलवलकर के सामने आपत्तियां भी दर्ज कराई थीं। लेकिन संघ को जल्दी ही समझ में आ गया कि विचारधारात्मक निष्ठा और विभिन्न योग्यताओं के बावजूद मधोक के भीतर संघ से हट कर एक स्वतंत्र आधार बनाने की प्रवृत्ति है। मधोक के बारे में संघ की इस राय का वाजपेयी को लाभ मिला। मधोक के नेतृत्व का पतन होने के बाद बागडोर वाजपेयी के हाथ में आई। उसके बाद अटल बिहारी ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। अगले पच्चीस साल तक पार्टी  का नेतृत्व अटल और उनके परम सहयोगी आडवाणी के बीच इधर से उधर होता रहा। 

अटल और आडवाणी के आपसी संबंधों में वैसे तो सहयोग की प्रधानता थी, लेकिन उनके बीच टकराव के बिंदुओंे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मुख्य तौर पर दो बार यह टकराव गंभीर होता हुआ लगा। पहली बार तब जब अटलजी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ को आगरा शिखर वार्ता के लिए बुलाया। आडवाणी इसके विरोध में थे। उन्होंने इस पूरे प्रयास को भीतर से विफल करने की भरपूर कोशिश की, और कामयाब भी हुए। 

दूसरी बार यह टकराव तब सामने आया जब संघ परिवार की तरफ से वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद छोड़ देने का एक नरम संदेश मिला। बात कुछ इस तरह से की गई कि ‘टायर्ड’ हो गए हैं इसलिए उन्हें ‘रिटायर’ हो जाना चाहिए। लेकिन वाजपेयी ने इसका उत्तर ‘न मैं टायर्ड हूं, न रिटायर्ड’ कह कर दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री पद नहीं छोड़ा, लेकिन संघ के दबाव में उन्हें आडवाणी को उपप्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार करना पड़ा। यह एक तरह से उनके प्राधिकार में कटौती थी। संघ परिवार की तरफ से उनके व्यक्तिगत जीवन पर हमले भी हुए— यहां तक कि तत्कालीन सरसंघचालक सुदर्शन ने तक एक टिप्पणी की। वाजपेयी ने इस टिप्पणी का उत्तर देने से बचते हुए संघ, आडवाणी और अपने बीच कुशलतापूर्वक एक समायोजन निकाला।  शीर्ष-सत्ता में आडवाणी के साथ हिस्सा बंटाया और किसी तरह से संकट को टाल दिया। 

टकराव का चौथा क्षण 2002 में गोधरा कांड के बाद गुजरात में हुई सांप्रदायिक हिंसा के कारण आया। इस प्रकरण में एक तरफ आडवाणी थे जो संघ परिवार की नुमाइंदगी कर रहे थे। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे जिनका राजनीतिक भविष्य पूरी तरह दांव पर लगा हुआ था। तीसरी तरफ अटल बिहारी थे जिनकी मान्यता थी कि मोदी राजधर्म का पालन करने से चूक गए हैं इसलिए उन्हें सत्ता छोड़ देनी चाहिए। गोवा में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मोर्चा खुला। आक्रमण-प्रतिआक्रमण का दौर चला। जैसे ही मोदी ने इस्तीफे की पेशकश की, प्रतिनिधियों की तरफ से जबर्दस्त विरोध करवाया गया। अटल बिहारी समझ गए कि इस मामले में उन्हें कदम पीछे खींचने पड़ेंगे। इसके बाद उन्होंने जो भाषण दिया वह समझौते और समन्वय का एक उदाहरण था। वे जानते थे कि न तो वे आडवाणी के सहयोग के बिना चल सकते हैं, और न ही संघ परिवार की सदाशयता के बिना उनकी राजनीति परवान चढ़ सकती है। मोदी के प्रति अपनी आलोचना उन्होंने इतिहास में दर्ज भी करा दी, और बात भी वापस ले ली।  

अगर ऐसा न होता तो विपरीत परिस्थितियां उनके राजनीति करियर की बलि भी ले सकती थीं। यह इस दक्षिणपंथी राजनीति का दुर्भाग्य ही है कि न तो वाजपेयी से पहले उसके पास कोई उदार शख्सियत थी, और न वाजपेयी के बाद है। आज हमारे पास घटनाओं की पश्चात-दृष्टि है। अगर इन भीतरी संघर्षो में वाजपेयी हार गए होते तो दक्षिणपंथी राजनीति अपने सर्वाधिक उदार नेता और उसकी उदारतावादी राजनीति से वंचित रह जाती। 

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