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ब्लॉगः असम की अर्थव्यवस्था को चाट जाती है बाढ़, हर साल 200 करोड़ हो जाता है स्वाहा

By पंकज चतुर्वेदी | Updated: June 25, 2022 13:26 IST

असम में प्राकृतिक संसाधन, मानव संसाधन और बेहतरीन भौगोलिक परिस्थितियां होने के बावजूद यहां का समुचित विकास न होने का कारण हर साल पांच महीने ब्रह्मपुत्र का रौद्र रूप होता है जो पलक झपकते ही सरकार व समाज की सालभर की मेहनत को चाट जाता है।

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बीस दिन में दूसरी बार असमबाढ़ से बेहाल हो गया। इस समय  राज्य के 32 जिलों के 5424 गांव पूरी तरह पानी में डूबे हैं और कोई 47.72 लाख लोग इससे सीधे प्रभावित हुए हैं। मौत का आंकड़ा सौ को पार कर गया है। अभी तक एक लाख हेक्टेयर खेती की जमीन के नष्ट होने की बात सरकार मानती है। इस बार सबसे ज्यादा नुकसान पहाड़ी जिले डिमा हासो को हुआ जहां एक हजार करोड़ के सरकारी व निजी नुकसान का आकलन है। यहां रेल पटरियां बह गईं व पहाड़ गिरने से सड़कों का नामोनिशान मिट गया। अभी तो यह शुरुआत है और अगस्त तक राज्य में यहां-वहां पानी ऐसे ही विकास के नाम पर रची गई संरचनाओं को उजाड़ता रहेगा। हर साल राज्य के विकास में जो धन व्यय होता है, उससे ज्यादा नुकसान दो महीने में ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों का कोप कर जाता है।

असम पूरी तरह से नदी घाटी पर ही बसा हुआ है। इसके कुल क्षेत्रफल 78 हजार 438 वर्ग किमी में से 56 हजार 194 वर्ग किमी ब्रह्मपुत्र नदी की घाटी में है। और बकाया 22 हजार 244 वर्ग किमी का हिस्सा बराक नदी की घाटी में है। इतना ही नहीं, राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के मुताबिक असम का कुल 31 हजार 500 वर्ग किमी का हिस्सा बाढ़ प्रभावित है। यानी, असम के क्षेत्रफल का करीब 40 फीसदी हिस्सा बाढ़ प्रभावित है। जबकि देशभर का 10.2 प्रतिशत हिस्सा बाढ़ प्रभावित है। अनुमान है कि इसमें सालाना कोई 200 करोड़ का नुकसान होता है जिसमें मकान, सड़क, मवेशी, खेत, पुल, स्कूल, बिजली, संचार आदि शामिल हैं। राज्य में इतनी मूलभूत सुविधाएं खड़ा करने में दस साल लगते हैं, जबकि हर साल औसतन इतना नुकसान हो ही जाता है। यानी असम हर साल विकास की राह पर पिछड़ता जाता है।

असम में प्राकृतिक संसाधन, मानव संसाधन और बेहतरीन भौगोलिक परिस्थितियां होने के बावजूद यहां का समुचित विकास न होने का कारण हर साल पांच महीने ब्रह्मपुत्र का रौद्र रूप होता है जो पलक झपकते ही सरकार व समाज की सालभर की मेहनत को चाट जाता है। वैसे तो यह सदियों से बह रहा है। बारिश में हर साल यह पूर्वोत्तर राज्यों में गांव-खेत बर्बाद करता रहा है। वहां के लोगों का सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक जीवन इसी नदी के चहुंओर थिरकता है, सो तबाही को भी वे प्रकृति की देन ही समझते रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों से जिस तरह से ब्रह्मपुत्र व उसकी सहायक नदियों में बाढ़ आ रही है, वह हिमालय के ग्लेशियर क्षेत्र में मानवजन्य छेड़छाड़ का ही परिणाम हैं। केंद्र हो या राज्य, सरकारों का ध्यान बाढ़ के बाद राहत कार्यों व मुआवजे पर रहता है। यह दुखद ही है कि आजादी के 72 साल बाद भी हम वहां बाढ़ नियंत्रण की कोई मुकम्मल योजना नहीं दे पाए हैं। यदि इस अवधि में राज्य में बाढ़ से हुए नुकसान व बांटी गई राहत राशि को जोड़ें तो पाएंगे कि इतने धन में एक नया सुरक्षित असम खड़ा किया जा सकता था।

पिछले कुछ सालों से इसका प्रवाह दिनोंदिन रौद्र होने का मुख्य कारण इसके पहाड़ी मार्ग पर अंधाधुंध जंगल कटाई माना जा रहा है। ब्रह्मपुत्र का प्रवाह क्षेत्र उत्तुंग पहाड़ियों वाला है, वहां कभी घने जंगल हुआ करते थे। उस क्षेत्र में बारिश भी जम कर होती है। बारिश की मोटी-मोटी बूंदें पहले पेड़ों पर गिर कर जमीन से मिलती थीं, लेकिन जब पेड़ कम हुए तो ये बूंदें सीधी ही जमीन से टकराने लगीं। इससे जमीन की टाप सॉइल उधड़ कर पानी के साथ बह रही है। फलस्वरूप नदी के बहाव में अधिक मिट्टी जा रही है। इससे नदी उथली हो गई है और थोड़ा पानी आने पर ही इसकी जलधारा बिखर कर बस्तियों की राह पकड़ लेती है।

असम में हर साल तबाही मचाने वाली ब्रह्मपुत्र और बराक नदियां, उनकी कोई 48 सहायक नदियां और उनसे जुड़ी असंख्य सरिताओं पर सिंचाई व बिजली उत्पादन परियोजनाओं के अलावा इनके जल प्रवाह को आबादी में घुसने से रोकने की योजनाएं बनाने की मांग लंबे समय से उठती रही है। असम की अर्थव्यवस्था का मूल आधार खेती-किसानी ही है, और बाढ़ का पानी हर साल लाखों हेक्टेयर में खड़ी फसल को नष्ट कर देता है। ऐसे में वहां का किसान कभी भी कर्ज से उबर ही नहीं पाता है। 

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