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ब्लॉगः क्यों पथराती जा रही हैं हमारी मानवीय संवेदनाएं ?

By विश्वनाथ सचदेव | Updated: October 5, 2023 10:17 IST

कुछ ही अर्सा पहले हमने मीडिया में मणिपुर की उन दो महिलाओं की शर्मनाक खबर देखी-सुनी थी जिन्हें निर्वस्त्र करके सड़कों पर घुमाया गया था। निर्वस्त्र कहने से शायद बात की गंभीरता उतनी उजागर नहीं होती जितनी ‘नंगा’ कहने से होती है।

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महाकाल की नगरी उज्जैन में वह लगभग निर्वस्त्र नाबालिग बेटी घंटों पनाह मांगती रही। पचासों मकानों के दरवाजे खटखटाये थे उसने, पर हर जगह से दुत्कारी गई वह। सुना है उसके साथ बलात्कार करने वाला आरोपी पकड़ा गया है। हो सकता है उसका अपराध प्रमाणित हो जाए, हो सकता है उसे कड़ी से कड़ी सजा भी मिल जाए। पर महाकाल की नगरी के नागरिकों के मुंह से वह कालिख कैसे मिटेगी जो एक असहाय बेटी को शरण न देने से लगी है।

सुना है एक ऑटो वाले ने उसे अपनी कमीज उतार कर अवश्य दे दी थी, पर यह बात उसे नहीं सूझी कि इतनी सहानुभूति पर्याप्त नहीं थी, जरूरत उस बच्ची को अस्पताल ले जाने की थी। अब वह ऑटो वाला इस बात पर खेद व्यक्त कर रहा है कि यह बात उसे क्यों नहीं सूझी। हां, एक व्यक्ति को सूझी थी यह बात। वह उसे अस्पताल भी ले गया। काश, पहले कोई यह काम कर देता तो उस अभागी बच्ची की स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती।

आरोपी के पिता का यह कहना है कि यदि मेरे बेटे ने यह जघन्य अपराध किया है तो उसे कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। वह लड़की मेरी भी बेटी है। पर बलात्कार की शिकार हुई कन्याओं के बारे में कितने लोग इस तरह की सोच रखते हैं? आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2022 में देश भर में 31 हजार से अधिक बलात्कार के मामले पुलिस ने दर्ज किए थे। हर बीस मिनट में एक बलात्कार हो रहा है हमारे देश में। और यह संख्या तो उन मामलों की है जो पुलिस में दर्ज कराए गए हैं, उन मामलों की संख्या कौन बता सकता है जो पुलिस तक पहुंचे ही नहीं।

बहरहाल, महिलाओं के खिलाफ इस जघन्य अपराध के बारे में अक्सर चर्चा होती रहती है। पर सवाल तो यह है कि इस बारे में बात क्यों नहीं होती कि उज्जैन में हुए इस शर्मनाक कांड में उस बच्ची की पुकार पर सैकड़ों दरवाजे खुले क्यों नहीं? क्यों किसी का मन नहीं पसीजा? क्यों लोगों को यह नहीं लगा कि खून में लथपथ वह लगभग निर्वस्त्र बच्ची उसकी भी हो सकती है?

कुछ ही अर्सा पहले हमने मीडिया में मणिपुर की उन दो महिलाओं की शर्मनाक खबर देखी-सुनी थी जिन्हें निर्वस्त्र करके सड़कों पर घुमाया गया था। निर्वस्त्र कहने से शायद बात की गंभीरता उतनी उजागर नहीं होती जितनी ‘नंगा’ कहने से होती है। सैकड़ों लोग थे मणिपुर की सड़कों पर निकाले गए मनुष्यता को शर्मसार करने वाले उसे जुलूस में। कहां चली गई थी उनकी आंखों की शर्म? मणिपुर की सड़क हो या उज्जैन के बंद दरवाजे, सबकी कहानी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि हम एक संवेदनहीन समाज में बदलते जा रहे हैं। यह संवेदनहीनता मनुष्यता का नकार है, इसको समझना होगा।

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