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भरत झुनझुनवाला का ब्लॉग: आयात पर टैक्स बढ़ा कर ही अर्थव्यवस्था में ला सकते हैं सुधार

By भरत झुनझुनवाला | Updated: May 22, 2020 10:04 IST

प्रश्न है कि राजस्व किस रास्ते जुटाया जाए? यहां दो प्रमुख रास्ते हैं. पहला रास्ता है कि सरकार मुद्रा बाजार में ऋण ले जैसा कि सरकार ने अभी मन बनाया है और ऋण लेकर उस रकम को खर्च करे जैसा छोटे उद्योगों और उड्डयन कंपनियों आदि को वर्तमान में पैकेज दिया गया है. दूसरा उपाय यह है कि हम चिन्हित माल पर विशेषकर पेट्रोल पर आयात कर में भारी वृद्धि कर दें.

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वित्त मंत्नी ने अर्थव्यवस्था को पुन: पटरी पर लाने के लिए विशाल आर्थिक पैकेज की घोषणा की है. इस पैकेज के आकार पर अलग अलग विचार हैं. प्रधानमंत्नी ने इसे 20 लाख करोड़ का बताया. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि वास्तव में यह 6 लाख करोड़ का है और अन्य का कहना है कि इसमें सरकार द्वारा किए जाने वाले वास्तविक खर्च में केवल 16 हजार करोड़ रुपये की वृद्धि हुई है. बहरहाल पैकेज का आकार जो भी हो, इतना स्पष्ट है कि सरकार इस रकम को ऋण लेकर जुटाना चाहती है चूंकि सरकार ने किसी अन्य उपाय से राजस्व जुटाने की बात नहीं कही है.

ऋण लेने के पीछे मान्यता है कि वर्तमान संकट अल्पकालीन होगा और पैकेज को लागू करने से अर्थव्यवस्था शीघ्र पुन: पटरी पर ही नहीं आ जाएगी बल्कि इसमें आगे वृद्धि भी होगी. पैकेज के लिए ली गई ऋण की रकम पर जो ब्याज देना होगा वह अर्थव्यवस्था की बढ़ी हुई आय पर टैक्स लगा कर अदा कर दिया जाएगा. जैसे यदि सरकार ने 6 लाख करोड़ रुपये का ऋण लिया और उसके ऊपर हर वर्ष 60 हजार करोड़ रुपये का ब्याज अदा करना हो तो आने वाले समय में जो अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ेगा उस पर अतिरक्त टैक्स लगाकर इस 60 हजार करोड़ की रकम को वसूल कर लिया जाएगा. इस प्रकार ऋण के माध्यम से अर्थव्यवस्था पुन: पटरी पर आ जाएगी.

समस्या है कि अर्थव्यवस्था का पुन: पुराने स्तर पर आना संदिग्ध है. पहला कारण यह कि वर्तमान संकट के बाद विश्व का हर देश प्रयास करेगा कि अपनी जरूरत के माल का वह स्वयं उत्पादन कर ले और विश्व बाजार पर इतनी गहराई से परावलंबित न हो. इसके कारण भारत को निर्यात करने में कठिनाई होगी क्योंकि दूसरे देश स्वावलंबन को अपनाएंगे. और, भारत स्वयं यदि स्वावलंबन को अपनाता है, जैसा कि प्रधानमंत्नी ने आह्वान किया है, तो अपने देश में माल की उत्पादन लागत अधिक आएगी. अपने देश में उत्पादन लागत अधिक आने के कारण ही आयात आते हैं. इसलिए यदि हम घरेलू उत्पादन बढ़ाएंगे तो उसमें लागत अधिक आएगी जिससे उपभोक्ता पर बोझ बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था मंद पड़ेगी.

अर्थव्यवस्था के पुन: पुराने स्तर पर न आ पाने का दूसरा कारण सोशल डिस्टेंसिंग का आर्थिक भार है. जैसे पूर्व में फैक्ट्री में लोगों को पास-पास बैठा दिया जाता था. अब उन्हें दूर-दूर बैठाना होगा. प्रात:काल उन्हें दूर-दूर रखकर अटेंडेंस लेनी होगी जिसमें समय अधिक लगेगा. एक ही ट्राली में 20 खेत मजदूरों को एक साथ लेकर जाना संभव नहीं होगा. विद्यालयों की कक्षा का आकार बड़ा करना होगा ताकि छात्न दूर-दूर बैठें. इन सब कारणों से अर्थव्यवस्था में उत्पादन की लागत बढ़ेगी.

तीसरा कारण यह कि वर्तमान संकट में स्वास्थ्य के उपचार का अधिक खर्च आएगा. जो नागरिक कोरोना से ग्रसित हुए हैं उन्हें उपचार करने का भार आएगा जिसके कारण अर्थव्यवस्था में मांग घटेगी. कम संख्या में लोग उत्पादन कर सकेंगे. इन तीनों कारणों से इस विशाल पैकेज के बावजूद आने वाले समय में अर्थव्यवस्था पुन: पटरी पर आती नहीं दिख रही है.

फिर भी सरकार को तत्काल खर्च तो बढ़ाने ही होंगे. स्वास्थ्य खर्च के साथ-साथ जो राजस्व में कटौती हुई है उसकी भरपाई करनी होगी. अनुमान है कि बीते अप्रैल में सामान्य राजस्व की तुलना में जीएसटी की केवल 40 प्रतिशत वसूली हो सकी है. अत: सरकार को अपने खर्चो को वर्तमान स्तर पर बनाए रखने के लिए ही भारी मात्ना में अतिरिक्त राजस्व जुटाना ही होगा.

प्रश्न है कि राजस्व किस रास्ते जुटाया जाए? यहां दो प्रमुख रास्ते हैं. पहला रास्ता है कि सरकार मुद्रा बाजार में ऋण ले जैसा कि सरकार ने अभी मन बनाया है और ऋण लेकर उस रकम को खर्च करे जैसा छोटे उद्योगों और उड्डयन कंपनियों आदि को वर्तमान में पैकेज दिया गया है. दूसरा उपाय यह है कि हम चिन्हित माल पर विशेषकर पेट्रोल पर आयात कर में भारी वृद्धि कर दें.

जैसे वर्तमान में पेट्रोल पर केंद्र सरकार द्वारा लगभग 27 रुपया प्रति लीटर का टैक्स वसूल किया जा रहा है. इसे तत्काल चार गुना बढ़ा कर 100 रु. प्रति लीटर किया जा सकता है. ऐसा करने से बाजार में पेट्रोल का दाम 75 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 150 रुपये प्रति लीटर हो जाएगा. सरकार को वर्तमान में पेट्रोल पर वसूल किए गए टैक्स से लगभग 4 लाख करोड़ रुपये की रकम अर्जित हो रही है. इस टैक्स को बढ़ाने के बाद कुछ मांग में कमी आएगी. फिर भी मेरा अनुमान है कि इस टैक्स से 10 लाख करोड़ रुपये प्रति वर्ष की अतिरिक्त रकम को अर्जित किया जा सकता है. अत: सरकार को चाहिए कि वर्तमान पैकेज के लिए ऋण न ले बल्कि पेट्रोल पर आयत कर बढ़ाए.

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