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अटलजी : भीड़ के बीच भी विरक्त व्यक्तित्व

By लोकमत समाचार हिंदी ब्यूरो | Updated: August 19, 2018 03:09 IST

अटलजी की अगर एक ऐसी कोई बात है जिससे प्रभावित हुए बिना कोई भी नहीं रह सका है तो वह है उनकी वाक्पटुता।

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(लेखक- पवन के। वर्मा)

अटलजी की अगर एक ऐसी कोई बात है जिससे प्रभावित हुए बिना कोई भी नहीं रह सका है तो वह है उनकी वाक्पटुता। उनकी वक्तृत्व कला संबंधी निपुणता सिर्फ उनके शब्दों के चयन की वजह से ही मंत्रमुग्ध नहीं करती थी। वे उल्लेखनीय रूप से प्रभावशाली थे, क्योंकि शब्द उनके दिल से निकलते थे। प्रत्येक वाक्य जटिलता के सही अनुपात के साथ तैयार किया हुआ, जिसके बाद अक्सर एक विराम होता था, ताकि श्रोता समझ सकें कि उन्होंने क्या कहा है, और फिर सही समय पर अन्य वाक्यों की झड़ी।। 

लेकिन विरोधाभास यह है कि अटलजी मितभाषी भी थे। यह उनके जीवन के बाद के वर्षो में चिह्न्ति हुआ, जब वे बहुत कम बोलने लगे थे या कई बार कुछ भी नहीं बोलते थे!  तब यह कल्पना करना मुश्किल हो जाता था कि कैसे वे माइक पर बोलते हुए या पोडियम में नाटकीय परिवर्तन ला देते थे और अपने श्रोताओं को बांधे रखते थे, जबकि निजी तौर पर वे लंबे समय तक मौन रह सकते थे।

शायद यह उनके भीतर का मननशील कवि था जो बाद के जीवन में प्रभावी हो गया था। दरअसल, यह अटलजी के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषता थी। वे लगभग अपने पूरे जीवन राजनीतिज्ञ रहे, उच्चतम सार्वजनिक पद पर विराजमान हुए जिसमें तीन बार प्रधानमंत्री बनना शामिल था, और फिर भी, उनके भीतर का जो सवरेत्कृष्ट हिस्सा था, वह उन्हें प्रतिभागी कम और पर्यवेक्षक अधिक बनाता था। व्यक्तिगत तौर पर मुङो लगता है कि सत्ता के आकर्षण और धूम-धड़ाके ने उन्हें कभी नहीं लुभाया। उनके भीतर का कवि उनसे कहता था कि यह सब गुजर जानेवाला है, एक परछाईं है, समय के भव्य कैनवास में एक क्षणभंगुर पल है। इसके पीछे, अंतत: एक अकेलापन था जिसने पृथक्करण की सहज भावना को प्रेरित किया, एक विरक्ति, अपने स्वामित्व की भावना से जानबूझकर इंकार। 

उनके भीतर के पर्यवेक्षक ने अहंकार को अस्वीकार कर दिया। उनकी संक्रामक हंसी, जो सबसे कटु आलोचक को भी निहत्था कर सकती थी, खुद को गंभीरता से नहीं लेने के उनके कवि संकल्प का नतीजा थी, जो उनकी अपने लक्ष्य की ओर गंभीरता से बढ़ने की प्रतिबद्धता को जरा सा भी कम नहीं करती थी। जो इसे नहीं समझ पाए, वे  अक्सर उनके दुरूह मौन से, आंखें बंद करके दूसरों को सुनने की आदत से, जो मामला वे हाथ में लेते थे उसके प्रति एकाग्र निष्ठा के साथ ही सत्ता और पद के प्रति उनके अनिवार्य वैराग्य से चकरा जाते थे। फिर भी, बातचीत की उनकी घुमावदार शैली की वजह से कभी-कभी उनका सामना करना चुनौतीपूर्ण हो जाता था। मुङो याद है कि एक बार मैं उनके साथ प्रधानमंत्री निवास पर था, जब महान नेता नेल्सन मंडेला उनसे मिलने आने वाले थे।

लेकिन निर्धारित समय तक मंडेला के आने का कोई संकेत नहीं था। यह पता लगाने का काफी प्रयास किया गया कि वे कहां थे। पता चला कि वे भारत में अपने रंगभेद विरोधी कुछ पुराने दोस्तों से मिलने गए थे, और इस बात से बिल्कुल बेखबर थे कि अटलजी के साथ उनकी मुलाकात तय थी। उनका इंतजार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। उनका इंतजार करते हुए अटलजी आंखें बंद करके चुपचाप बैठे हुए थे। वहां कमरे में उनके प्रधान सचिव और पीएमओ में संयुक्त सचिव ब्रजेश मिश्र और मैं (मेरी हैसियत संयुक्त सचिव के रूप में अफ्रीका को डील करने की थी) थे। अचानक    अटलजी ने आंखें खोलीं और मेरी ओर देखते हुए कहा : ‘वो तस्वीर तो पुरानी है’।

सच कहूं तो अप्रत्याशित समय पर इस तरह के वाक्य ने कमरे में मौजूद अन्य लोगों सहित मुङो भी चकरा दिया था। एक क्षण के लिए, मुङो यकीन ही नहीं हुआ कि वे मुझसे बात कर रहे थे! कमरे में चुप्पी थी। एक लंबे विराम के बाद अटलजी ने फिर कहा, ‘मेरे सिरहाने रखी है।’ इस दूसरे वाक्य का भी कोई अर्थ नहीं निकलता था। एक विराम के बाद, जब उन्होंने तीसरी बार कहा तब मुङो बात समझ में आई। उन्होंने कहा : ‘शबाना ने दी है मुङो पढ़ने के लिए’। मैंने शबाना आजमी के आग्रह पर उनके पिता कैफी आजमी की कविताओं का अनुवाद किया था।  उस किताब के कवर पर कैफीजी का फोटो था। वह फोटो उनके शुरुआती दिनों का था। अटलजी वह किताब पढ़ रहे थे, इसीलिए उन्होंने कहा , ‘वो तस्वीर तो पुरानी है’!

अटलजी का कवि उन्हें अक्सर एकांत में ला देता था और वे ऐसे असंबद्ध वाक्यों की ओर मुड़ जाते थे जिसे समझ पाना दूसरों के लिए दुबरेध्य हो जाता था। इसी मौन ने उन्हें कविता लिखने की ओर उद्यत किया - जिसका मुङो अंग्रेजी में अनुवाद करने का सम्मान मिला। मैंने उनकी एक बहुचर्चित कविता ‘मौत से ठन गई’ का अंग्रेजी में अनुवाद किया था, जो उनकी भेदक अंतर्दृष्टि को सामने लाती है :

ठन गई!

मौत से ठन गई! 

जूझने का मेरा इरादा न था, 

मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, 

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, 

यों लगा जिंदगी से बड़ी हो गई

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, 

जिंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, 

लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं? 

तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ, 

सामने वार कर फिर मुङो आजमा

मौत से बेखबर, जिंदगी का सफर, 

शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर

बात ऐसी नहीं कि कोई गम ही नहीं, 

दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं 

प्यार इतना परायों से मुझको मिला, 

न अपनों से बाकी है कोई गिला। 

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किए, 

आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए

आज झकझोरता तेज तूफान है, 

नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है

पार पाने का कायम मगर हौसला, 

देख तेवर तूफां का, तेवरी तन गई

मौत से ठन गई

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