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ब्लॉग: मणिपुर मामले में सभी दल सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएं

By अवधेश कुमार | Updated: August 1, 2023 15:10 IST

एक ओर आप मणिपुर की स्थिति का आकलन करें और दूसरी ओर संसद न चलने दें तो रास्ता निकलेगा कैसे? तो फिर बात आकर वहीं अटक गई है. प्रश्न है अब आगे क्या?

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मणिपुर के दो दिवसीय दौरे पर गए 21 सदस्यीय विपक्षी आईएनडीआईए सांसदों के प्रतिनिधिमंडल के वक्तव्यों व विवरणों में ऐसा कुछ नहीं है जो पहले समाचार माध्यमों से हमारे आपके पास नहीं पहुंचे हों. कहने का तात्पर्य यह नहीं कि विपक्षी सांसदों का दौरा महत्वपूर्ण नहीं था. बिल्कुल महत्वपूर्ण था. जनप्रतिनिधि होने के नाते वहां जाकर सच्चाई को अपनी आंखों से देखना, समझना तथा जो कुछ समाधान के रास्ते नजर आएं उसे देश, सरकार के समक्ष रखना विपक्ष का भी दायित्व है. 

इस नाते देखें तो कहा जा सकता है कि विपक्षी सांसदों का दौरा बिल्कुल उपयुक्त था. विपक्षी सांसदों ने राज्यपाल अनुसुइया उइके से मुलाकात कर अपना ज्ञापन भी दिया. राज्यपाल को ज्ञापन देने का अर्थ है कि वह केंद्र सरकार तक भी पहुंच जाएगा. इन सबके साथ विपक्ष का मूल स्वर यही है कि प्रधानमंत्री इस विषय पर बोलें. तो फिर बात आकर वहीं अटक गई है. प्रश्न है अब आगे क्या?

एक ओर आप मणिपुर की स्थिति का आकलन करें और दूसरी ओर संसद न चलने दें तो रास्ता निकलेगा कैसे? सांसदों के दल ने राज्यपाल को जो ज्ञापन दिया, उसके अनुसार 140 से अधिक मौतें हुईं, 500 से अधिक लोग घायल हुए, 5000 से अधिक घर जला दिए गए तथा मैतेई एवं कुकी दोनों समुदाय के 60000 से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं. इन तथ्यों को कोई नकार नहीं सकता. 

उन्होंने यह भी लिखा है कि राहत शिविरों में स्थिति दयनीय है. प्राथमिकता के आधार पर बच्चों का विशेष ख्याल रखने की जरूरत है. विभिन्न स्ट्रीम के छात्र अनिश्चित भविष्य का सामना कर रहे हैं जो राज्य और केंद्र सरकारों की प्राथमिकता होनी चाहिए. इस तरह के सुझावों को स्वीकार करने में केंद्र और प्रदेश सरकार को समस्या नहीं हो सकती है. 

इस तरह के जातीय नस्ली संघर्ष में शांति, राहत तथा पुनर्वास अत्यंत कठिन होता है. हरसंभव कोशिश करने के बावजूद राहत शिविरों में लोगों को सामान्य जीवन देना पूरी तरह संभव नहीं होता तो इसके लिए जितनी कोशिश संभव है, की जानी चाहिए. लेकिन अगर वाकई विपक्ष मणिपुर में शांति व्यवस्था स्थापित करने की आकांक्षा रखता है तथा चाहता है कि इस तरह की पुनरावृत्ति भविष्य में न हो तो उसे अपने दायित्व पर भी विचार करना चाहिए.

अगर राज्यपाल अनुसुइया उइके ने सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजने तथा सभी समुदायों के नेताओं से बात करने का सुझाव दिया है तो इसे स्वीकार करने में किसी को समस्या नहीं हो सकती है. मणिपुर का संकट निस्संदेह, राष्ट्रीय सुरक्षा का संकट है पर विपक्ष का यह कहना कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल जाए, यह गले नहीं उतर सकता. जाहिर है इसमें मणिपुर की चिंता कम, आगामी लोकसभा चुनाव की राजनीति ज्यादा दिखती है.

टॅग्स :मणिपुरनरेंद्र मोदी
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