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अभय कुमार दुबे का ब्लॉग: अब तो अर्थव्यवस्था पर होगी राजनीति!

By अभय कुमार दुबे | Updated: September 4, 2019 08:30 IST

जनता भीतर ही भीतर एक बात जरूर जानती-समझती है कि अर्थव्यवस्था का संकट रातोंरात नहीं उभरा है. यह लंबे अरसे से चली आ रही समस्याओं और गलतियों के कारण धीरे-धीरे संचित हुआ है. जिस तरह से यह सरकार एनपीए की समस्या से निपटी है, उसने भी संकट में कुछ योगदान किया है.

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आम लोगों ने आर्थिक संकट के बारे में बेचैनी प्रदíशत करनी शुरू कर दी है. राजनीतिक मोर्चे पर मजबूती से जमी हुई मोदी सरकार की साख अभी ऊंची है, लेकिन यह भी सही है कि आर्थिक प्रश्न को हल न कर पाने वाली सरकारों का ग्राफ अपने लोकप्रिय नेतृत्व के बावजूद एक हद के बाद तेजी से गिरने लगता है. चूंकि संकट हमारी आंखों में घूर रहा है इसलिए इस समय सार्वजनिक जीवन में होने वाली राजनीति मुख्य तौर पर आर्थिक प्रश्न के इर्दगिर्द केंद्रित हो जाए तो इसमें कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए. जनता भीतर ही भीतर एक बात जरूर जानती-समझती है कि अर्थव्यवस्था का संकट रातोंरात नहीं उभरा है. यह लंबे अरसे से चली आ रही समस्याओं और गलतियों के कारण धीरे-धीरे संचित हुआ है. जिस तरह से यह सरकार एनपीए की समस्या से निपटी है, उसने भी संकट में कुछ योगदान किया है. एनपीए के प्रतिशत को घटाने के लिए सरकार ने जानबूझ कर बैंकिंग गतिविधियों में कटौती की जिससे एनपीए तो कुछ घट गया, पर बाजार में पहले से मौजूद मंदी मुखर हो गई.

सरकार सत्तर हजार करोड़ की पूंजी बैंकों में डालने वाली है ताकि बाजार में ऋण की उपलब्धता एक झटके से बढ़ जाए. इसके पीछे धारणा यह है कि मार्केट में लिक्विडिटी (व्यापार के लिए निवेश आदि) घट गई तो उसे बढ़ाना चाहिए. लेकिन, यह देख कर ताज्जुब होता है कि सरकार को रिजर्व बैंक से पौने दो लाख करोड़ देने वाले उसके गवर्नर शक्तिकांत दास ने पिछले महीने ही मोनेटरी पॉलिसी कमेटी की बैठक में जानकारी दी थी कि जून के महीने से ही आर्थिक प्रणाली में लिक्विडिटी सरप्लस में चल रही है. अर्थात् मंदी लिक्विडिटी में कमी के कारण नहीं उसके आधिक्य के बावजूद बढ़ी है. इसका मतलब हुआ कि बैंकों को इस बड़े पैमाने पर पूंजी देने से मंदी की समस्या का समाधान नहीं होने वाला है.

यहीं सवाल उठता है कि क्या कमजोर बैंकों का ताकतवर बैंकों में विलय होने से कुछ हालात सुधरेंगे? पाठकों को ध्यान होगा कि इस साल की शुरुआत में विजया बैंक और देना बैंक को बैंक ऑफ बड़ौदा में विलीन कर दिया गया था. तथ्य बताते हैं कि विलय से बड़ोदा बैंक को लाभ नहीं हुआ, और उसका शेयर साल भर में डेढ़ सौ से घट कर 92 रुपए पर आ गया. जानकारों का मानना है कि मजबूत के कंधों पर कमजोर का बोझ डालने से मजबूत भी अपनी रफ्तार छोड़ कर घिसटने की मुद्रा में आ जाता है. इसलिए नहीं कहा जा सकता है कि बैंकों के विलय के अर्थव्यवस्था को अच्छे नतीजे ही मिलेंगे.

 इस समय हमारा कुल घरेलू उत्पाद पांच फीसदी बताया गया है. क्या यह वास्तव में पांच फीसदी है? जिस समय यह दर सात और साढ़े सात फीसदी निकल कर आती थी, उस समय कई अर्थशास्त्री आलोचना यह कहकर करते थे कि जीडीपी दर का आकलन करने के लिए आधार वर्ष में तरमीम करने से यह बढ़ी हुई दर का आंकड़ा आया है. दरअसल, सरकार द्वारा घोषित दर से डेढ़ से दो फीसदी कम कर देने से वास्तविक दर मिल सकती है. यानी जीडीपी पांच फीसदी की नहीं बल्कि तीन या साढ़े तीन फीसदी की दर से ही बढ़ रहा है. यही कारण है कि न कारें बिक रही हैं, और न ही पांच रु. में आने वाला बिस्कुटों का पैकेट. ग्लोबल वृद्धि दर में आई कमी के कारण भारत का निर्यात बहुत घट गया है. जिस तरह से दुनिया इस समय वाणिज्य के स्तर पर हो रहे टकराव में फंसी हुई है, उससे नहीं लगता कि यह ग्लोबल मंदी जल्दी दुरुस्त होने वाली है. एक ओर दुनिया में हमारे उत्पादों और अन्य माल की मांग नहीं है, दूसरी ओर घरेलू बाजार में मांग का ग्राफ तेजी से नीचे गया है. निजी स्तर पर लोगों द्वारा किया जाने वाला खर्च जून की तिमाही में घट कर तीन फीसदी पर आ गया है. इसके कुछ कारण नीतियों से संबंधित भी हैं.

मसलन, खाद्य मुद्रास्फीति के घटने के कारण खेती के क्षेत्र में होने वाली आमदनी पर विपरीत असर पड़ा है. दूसरे, जीसएटी और नोटबंदी के कारण अर्थव्यवस्था में कालेधन की ताकत में जो कमी आई है, उसका स्वागत करते समय हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह कालाधन कई क्षेत्रों में उपभोग के लिए किए जा रहे खर्चो को भी बढ़ाता है. इसलिए कालेधन की मात्र में बहुत कमी का मतलब भी मांग घटने में अक्सर निकलता है. घरेलू दायरे में की जाने वाली बचत दर भी घटी है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि या तो लोगों की आमदनी घट रही है या लोग अपने उपभोग की जरूरतें पूरी करने के लिए बचत का एक हिस्सा खर्च कर रहे हैं. 

कुल मिलाकर प्रश्न यह है कि क्या सरकार के पास घरेलू बाजार में मांग बढ़ाने के लिए कोई आर्थिक युक्ति है? सारा देश (नागरिक, बेरोजगार, उद्योगपति, किसान, मजदूर और नौकरीपेशा) मोदीजी की ओर देख रहा है. वे मन की बात तो करते ही रहते हैं, लेकिन अब समय अर्थव्यवस्था की बात करने का है.

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