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ब्लॉग: 96 वर्ष के संसद भवन ने भारतीय लोकतंत्र की गौरव गाथा लिखी

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: September 19, 2023 11:28 IST

19 सितंबर से नए संसद भवन में संसदीय विरासत की गौरवशाली गाथा आगे बढ़ेगी। पिछले कुछ वर्षों से संसद को बाधित करने की दु:खद प्रवृत्ति बढ़ गई है।

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सन् 1927 से देश की सेवा कर रहा संसद भवन लोकतंत्र के गौरवशाली इतिहास का एक अध्याय बन गया। 18 सितंबर को संसद के इस भवन में अंतिम संसदीय कार्यवाही हुई।

96 वर्ष पुरानी इस भव्य इमारत को अंग्रेजों ने बनवाया लेकिन इसमें श्रम और धन भारतीयों का लगा। लोकतंत्र के इस मंदिर में भारतीय शिल्प कला और संस्कृति की विलक्षणता के दर्शन होते हैं।

इस संसद भवन ने भारत की आजादी के संघर्ष को देखा तो स्वतंत्रता के सूर्य के उदित होने के पल भी देखे। इसके बाद संसद भवन ने स्वतंत्र भारत के विकास की यात्रा को भी देखा।

यह संसद भवन भारत में लोकतंत्र की गौरवशाली यात्रा का साक्षी है। इसने देखा कि भारत का लोकतंत्र तमाम उतार-चढ़ावों के बावजूद कैसे निरंतर मजबूत होता गया। इसमें इस संसद भवन के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

संसद के दोनों सदनों में जनप्रतिनिधियों ने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को सर्वोच्च सम्मान देते हुए अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया और नए संसद भवन में भी करते रहेंगे।

विभिन्न ज्वलंत मसलों पर इसी संसद भवन में चर्चाएं और बहस हुईं तथा देश के हित में दूरगामी फैसले लिए गए। इसी संसद भवन में कई क्रांतिकारी कानून बने जिन्होंने देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस संसद भवन ने 1975 का आपातकाल देखा तो 13 दिसंबर 2001 को पाकिस्तानपरस्त आतंकवादियों के नापाक हमले को भी झेला।

इस संसद भवन ने देश को विकास की राह दिखाई और विकास की इस यात्रा को सफल बनाने के लिए उसने लोकतंत्र के पथ को विशाल तथा मजबूत बनाया।

इस संसद भवन में विश्व ने भारत में एक ऐसे लोकतंत्र को साकार होते देखा जो सर्वसमावेशी, लचीला, सहिष्णु, विश्वबंधुत्व तथा विपरीत विचारधाराओं को भी समरस कर देने वाला है। इस लोकतंत्र में असहिष्णुता, पक्षपात तथा अधिनायकवाद के लिए कोई स्थान नहीं है।

इसी संसद भवन ने देश को संकट के समय राह दिखाई. 1962 में जब चीन ने भारत पर धोखे से हमला किया तो संसद भवन से राष्ट्रीय एकता की किरण निकली और देश को आर्थिक, तकनीकी तथा सैन्य रूप से मजबूत बनाने का मार्ग भी प्रशस्त हुआ। संसद भवन में दिग्गजों ने मंथन किया और 1962 की पराजय के आघात से देश को उबारा।

इसी संसद भवन में 1965 तथा 1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर जीत का जश्न मना तो सत्तर के दशक के भयानक सूखे के बाद हरित क्रांति का जयघोष भी हुआ।

इस संसद भवन ने चंद्रयान और मंगलयान, आदित्य एल1 की सफलताओं और जी20 के सफल आयोजन एवं ठोस आर्थिक नीतियों से देश को दुनिया की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होते देखा. इन सब कामयाबियों का मार्ग संसद भवन की इसी 96 साल पुरानी इमारत से होकर निकला था।

एक गरीब, पिछड़े, अशिक्षित, कुपोषित देश से भारत को दुनिया की महाशक्तियों की कतार में खड़ा करने का सपना इसी संसद भवन में देखा गया था और उसे साकार करने के कदमों पर भी इसी गौरवशाली इमारत में चर्चा हुई और रास्ता निकला।

इसी संसद भवन से अलग-अलग विचारधारा वाले दलों ने देश की सत्ता का संचालन किया लेकिन तमाम सत्तारूढ़ दलों ने देश के विकास तथा संसदीय लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत बनाने की दिशा में ही काम किया।

संसद के इसी भवन में पं. जवाहरलाल नेहरू, डॉ. बाबासाहब आंबेडकर, डॉ. राममनोहर लोहिया, मधु लिमये, जार्ज फर्नांडीस, इंदिरा गांधी, लालबहादुर शास्त्री, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, चंद्रशेखर, मुलायम सिंह यादव, सुषमा स्वराज, फिरोज गांधी, वी.के. कृष्ण मेनन, मीनू मसानी, विजयाराजे सिंधिया, इंद्रकुमार गुजराल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, बीजू पटनायक, बाबू जगजीवनराम, हेमवतीनंदन बहुगुणा, गुलजारीलाल नंदा, यशवंतराव चव्हाण, शंकरराव चव्हाण, हरेकृष्ण महताब, विजयलक्ष्मी पंडित, रफी अहमद किदवई, राजीव गांधी जैसे दिग्गजों ने अपने विचारों से देश को नई दिशा दिखाई।

19 सितंबर से नए संसद भवन में संसदीय विरासत की गौरवशाली गाथा आगे बढ़ेगी। पिछले कुछ वर्षों से संसद को बाधित करने की दु:खद प्रवृत्ति बढ़ गई है। नए संसद भवन में सांसदों पर नई ऊर्जा, नए उत्साह, नए विचारों से देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी होगी। यह तभी होगा जब हंगामे की जगह सार्थक चर्चा होगी।

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