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अनिश्चितता के बीच जलवायु के लिए भारत का संकेत

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: March 30, 2026 05:22 IST

एनडीसी में 2035 तक सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन सघनता को 47 प्रतिशत घटाने का लक्ष्य रखा गया है, जो इसमें प्रगति दर्शाता है.

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ठळक मुद्देकरोड़ों नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा व उनकी खर्च उठाने की क्षमता पर भी प्रमुखता से ध्यान दिया है.कृषि वानिकी, मृदा स्वास्थ्य और जैव विविधता संरक्षण में निवेश के रास्ते खुल सकते हैं.नए एनडीसी में लचीले बुनियादी ढांचे और अनुकूलन पर बहुत जोर दिया गया है.

डॉ. अरुणाभा घोष

जब पश्चिम एशिया में संघर्ष और ऊर्जा सुरक्षा की चिंताएं विभिन्न देशों को उनकी जलवायु प्रतिबद्धताओं से पीछे खींच रही हैं, तब भारत ने, पेरिस समझौते के तहत, 2031-2035 के लिए नए ‘राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान’ (एनडीसी) घोषित करके एक महत्वपूर्ण संकेत दिया है. 2035 तक गैर-जीवाश्म बिजली की 60 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करने का लक्ष्य बताता है कि भारत ने एक तरफ विद्युत क्षेत्र को कार्बन उत्सर्जन मुक्त बनाने का लक्ष्य बढ़ाया है और दूसरी तरफ करोड़ों नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा व उनकी खर्च उठाने की क्षमता पर भी प्रमुखता से ध्यान दिया है.

यह उल्लेखनीय है कि भारत के विद्युत बाजार तेजी से विकसित हो रहे हैं. अगर यही रफ्तार बनी रहती है, और आपूर्ति श्रृंखला की बाधाएं घटती हैं तो भारत अपने लक्ष्य से आगे निकल सकता है, जैसा कि वह पहले कई बार कर चुका है. एनडीसी में 2035 तक सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन सघनता को 47 प्रतिशत घटाने का लक्ष्य रखा गया है, जो इसमें प्रगति दर्शाता है.

वहीं, नवाचार पर जोर देने का अर्थ है कि ग्रीन हाइड्रोजन, दुर्लभ खनिज, कार्बन कैप्चर और उन्नत बैटरी सिर्फ बिजली क्षेत्र को नहीं, बल्कि ऊर्जागत परिवर्तन को सुरक्षित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. भारत ने ‘कार्बन सिंक’ निर्माण को भी प्रमुखता से बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, जिससे कृषि वानिकी, मृदा स्वास्थ्य और जैव विविधता संरक्षण में निवेश के रास्ते खुल सकते हैं.

नए एनडीसी में लचीले बुनियादी ढांचे और अनुकूलन पर बहुत जोर दिया गया है. यह देश की अनिश्चित बारिश, लू और तटीय जोखिम जैसी जलवायु सुभेद्यताओं और विकास, आजीविका व बुनियादी ढांचे को सुरक्षित बनाने की जरूरत को मान्यता दिया जाना दर्शाता है. मैंग्रोव वनों की बहाली और तट संरक्षण, चक्रवातों व तूफानों के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और राज्यों में ‘हीट एक्शन प्लान’ को बढ़ाने जैसे उपाय बताते हैं कि अनुकूलन और लचीलापन भारत की जलवायु रणनीति के मुख्य स्तंभ बन रहे हैं.

इसी के साथ-साथ ‘मिशन लाइफ’, जो सर्कुलर इकोनॉमी और जैव-अर्थव्यवस्था में अवसर लाता है, दर्शाता है कि कैसे सतत जीवनशैली नए विकास और मूल्य सृजन को बढ़ा सकती है. नया एनडीसी यह भी दर्शाता है कि भारत ‘ग्रीन इकोनॉमी’ के विचार को आत्मसात कर रहा है, जिसमें जलवायु कार्रवाइयों को अलग-थलग रखकर नहीं देखा जाता,

बल्कि उसे देश के व्यापक विकास और आर्थिक रणनीति में शामिल माना जाता है. बड़े आर्थिक झटकों और चरम जलवायु स्थितियों का सामना करने के बावजूद, भारत अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं पर अडिग रहा है और उसने अपनी ऊर्जा सुरक्षा व लचीलेपन में संतुलन बनाने वाले नए एनडीसी की घोषणा की है.

जलवायु लक्ष्य तय करना और उन्हें समय से पहले पूरा कर लेना भारत का इतिहास रहा है. यह पैटर्न, जहां लक्ष्य आधार होते हैं, न कि सीमाएं, नए लक्ष्यों को विश्वसनीयता देता है. वैश्विक अनिश्चितता बढ़ने के बावजूद, अपने जलवायु लक्ष्यों को विस्तार देना भारत की सशक्त इच्छाशक्ति दिखाता है.

यह बताता है कि जिस तरह से भारत जलवायु परिवर्तन प्रेरित भीषण गर्मी और अनिश्चित बारिश का सामना करने की तैयारी कर रहा है, जलवायु कार्रवाई, आर्थिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा सभी एक साथ चलने चाहिए.

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