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CJI बनने से पहले भी काफी चर्चित रहे हैं जस्टिस दीपक मिश्रा के ये पांच बड़े फैसले

By आदित्य द्विवेदी | Updated: October 2, 2018 20:36 IST

दीपक मिश्रा को 10 अक्टूबर 2011 को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया था। पिछले साल 28 अगस्त को उन्होंने बतौर चीफ जस्टिस कार्यभार ग्रहण किया था। 13 महीने के कार्यकाल के बाद वो 2 अक्टूबर को रिटायर हो गए।

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सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा 2 अक्टूबर को रिटायर हो गए। करीब 13 महीने के कार्यकाल में उन्होंने तमाम ऐतिहासिक फैसले दिए। खास तौर पर आखिरी एक महीने में दिए उनके फैसले लंबे समय तक देश की दिशा और दशा तय करेंगे। जस्टिस मिश्रा ऐसी शख्सियत हैं जो सीजेआई बनने से पहले भी काफी चर्चित रहे हैं। उनके फैसलों की गूंज लंबे समय तय सुनाई देती रही है। दीपक मिश्रा को 10 अक्टूबर 2011 को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया था। पिछले साल 28 अगस्त को उन्होंने बतौर चीफ जस्टिस कार्यभार ग्रहण किया था।

इनमें से कुछ फैसले उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रहते हुए सुनाए तो कुछ सुप्रीम कोर्ट में जज रहते हुए। दिल्ली के निर्भया गैंगरेप के दोषियों को फांसी सजा बरकरार रखना और चाइल्ड पोर्नोग्राफी वाली वेबसाइट बैन करने का फैसला भी काफी चर्चित रहा है। जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने ही यह आदेश दिया था कि पूरे देश में सिनेमा घरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान चलाया जाए और इस दौरान सिनेमा हॉल में मौजूद तमाम लोग खड़े होंगे। सीजेआई बनने से पहले जस्टिस मिश्रा के कुछ चर्चित फैसलों पर एक नजर डालते हैं-

1. सिनेमाघरों में राष्ट्रगान अनिवार्य

30 नवंबर 2016 को जस्टिस मिश्रा ने एक ऐसा फैसला सुनाया जिस पर कुछ लोगों ने ऐतराज जताया तो एक वर्ग ने खुशी जाहिर की। सुप्रीम कोर्ट में दो जजों की बेंच ने अपने आदेश में कहा कि सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाया जाएगा। इस दौरान स्क्रीन पर राष्ट्रीय ध्वज भी दिखाना होगा और लोगों को इसके सम्मान में खड़े होना अनिवार्य होगा। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 9 जनवरी, 2018 को एक अहम फ़ैसले में सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाने की अनिवार्यता खत्म कर दी।

2. याकूब मेमन को फांसी

1993 के मुंबई बम धमाका मामले में दोषी याकूब मेमन को फांसी की सजा जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच ने ही सुनाई थी। इस खास फैसले की खास बात यह रही कि आजाद भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट में आधी रात को सुनवाई हुई। 29 जुलाई 2015 को रात 3.18 बजे से सुबह 4.50 बजे तक सुनवाई चली। दोनों पक्षों को सुनने के बाद याकूब की माफी की याचिका खारिज कर दी गई। जस्टिस मिश्रा ने फैसला सुनाते हुए कहा, 'फांसी के आदेश पर रोक लगाना न्याय की खिल्ली उड़ाना होगा. याचिका रद्द की जाती है।' इसके कुछ घंटों बाद याकूब को फांसी दे दी गई थी।

3. वेबसाइट पर अपलोड हो FIR

पुलिस कार्रवाई को तेज और पारदर्शी बनाने के लिए जस्टिस दीपक मिश्रा ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। 7 सितंबर 2016 को सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने आदेश दिया कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 24 घंटे के अंदर एफआईआर वेबसाइट पर अपलोड करनी होगी। दुर्गम इलाकों को 72 घंटे का टाइम दिया गया। इस बेंच में जस्टिस मिश्रा के साथ जस्टिस सी नागप्पन भी थे। इससे पहले जब जस्टिस मिश्र ने दिल्ली के चीफ़ जस्टिस थे, 6 दिसंबर, 2010 को उन्होंने दिल्ली पुलिस को भी ऐसे ही आदेश दिए थे, ताकि लोगों को बेवजह चक्कर न काटना पड़े।

4. मानहानि की संवैधानिकता

सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने मानहानि के प्रावधानों की संवैधानिकता को बरकरार रखा था। इस बेंच में जस्टिस मिश्रा भी शामिल थे। काफी समय से इस कानून की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए जा रहे थे। जस्टिस मिश्रा ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता असीमित नहीं है। यह फैसला सुब्रमण्यम स्वामी, राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल व अन्य बनाम यूनियन केस में सुनाया गया।

5. प्रमोशन में आरक्षण पर रोक

27 अप्रैल 2012 को जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस दलवीर भंडारी की बेंच ने मायावती सरकार की प्रमोशन में आरक्षण की नीति पर रोक लगा दी थी। जस्टिस मिश्रा ने कहा कि प्रमोशन देने से पहले सावधानी से जानकारियां जुटाई जाएं। यूपी सरकार डेटा देने में नाकाम रही थी।  

दीपक मिश्रा का जन्म 1953 में हुआ था। उन्होंने 1977 में वकालत शुरू की लंबे समय तक उड़ीसा हाई कोर्ट में प्रैक्टिस की। 1996 में उन्हें उड़ीसा हाई कोर्ट में एडिशनल जज के तौर पर नियुक्ति मिली। 1997 में वो स्थायी जज बने। 23 दिसंबर 2009 को पटना हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस बनाए गए और 24 मई को दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस का कार्यभार संभाला। 10 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर नियुक्ति मिली। 

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