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बिहार में 'डॉग बाइट' बनता जा रहा है व्यापक स्वास्थ्य समस्या, पिछले साल आए 2,83,274 मामले, औसतन हर दिन 776 लोग हो रहे हैं कुत्ते के काटने का शिकार

By एस पी सिन्हा | Updated: February 4, 2026 15:57 IST

सर्वेक्षण के मुताबिक, वर्ष 2023-24 की तुलना में ये मामले लगभग 39 हजार अधिक हैं। पिछले वर्ष 2,44,367 लोग कुत्तों के शिकार हुए थे। यह राज्य में बढ़ते आवारा कुत्तों के आतंक और नगर निकायों की विफलता को दर्शाता है। 

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पटना:बिहार में 'डॉग बाइट' (कुत्ते का काटना) अब सबसे व्यापक स्वास्थ्य समस्या बन गई है। बिहार विधानसभा में पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार वर्ष 2024-25 में कुल 2,83,274 लोग कुत्तों का शिकार बने। सर्वेक्षण के मुताबिक, वर्ष 2023-24 की तुलना में ये मामले लगभग 39 हजार अधिक हैं। पिछले वर्ष 2,44,367 लोग कुत्तों के शिकार हुए थे। यह राज्य में बढ़ते आवारा कुत्तों के आतंक और नगर निकायों की विफलता को दर्शाता है। 

आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में औसतन हर दिन 776 लोग कुत्ते के काटने का शिकार हुए। हालांकि रिपोर्ट में रेबीज के मामलों की संख्या का उल्लेख नहीं किया गया जो आमतौर पर संक्रमित जानवरों, खासकर कुत्तों के काटने से फैलता है। रिपोर्ट में बताया गया कि दूसरी सबसे व्यापक बीमारी एक्यूट रेस्पिरेटरी इंफेक्शन (एआरआई) या इन्फ्लूएंजा जैसे लक्षणों वाली बीमारी रही। इस अवधि में राज्य में इस तरह के 31,025 मामले दर्ज किए गए। 

कुत्ते के काटने के मामलों में पटना शीर्ष पर रहा, जहां 29,280 मामले दर्ज किए गए। इसके बाद पूर्वी चंपारण (24,452), नालंदा (19,637), गोपालगंज (18,879), पश्चिमी चंपारण (17,820), जहानाबाद (12,900), गया जी (10,794), भोजपुर (10,496), पूर्णिया (10,373) और वैशाली (10,155) में लोग कुत्ते के काटने का शिकार हुए। 

वहीं, जिन जिलों में वर्ष 2024-25 में 2,000 से कम मामले दर्ज किए गए, उनमें रोहतास (1,967), सुपौल (1,878), खगड़िया (1,565) और औरंगाबाद (467) शामिल हैं। कुत्तों का काटना अब सामान्य बीमारियों से भी आगे निकल गया है। रिपोर्ट में बताया गया कि दूसरी सबसे व्यापक बीमारी 'एक्यूट रेस्पिरेटरी इंफेक्शन' (एआरआई) रही, जिसके 31,025 मामले मिले। 

यह आंकड़ा प्रशासन के लिए एक अलार्म की तरह है, क्योंकि यह सीधे तौर पर लोगों की सुरक्षा और स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे पर दबाव डाल रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार "कुत्ते, बिल्ली, चमगादड़ या बंदर के काटने के कारण रेबीज एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है। हर साल अनुमानित 59,000 लोगों की मौत रेबीज से होती है और इनमें अधिकांश मौतें संक्रमित कुत्तों के काटने से होती हैं। 

डब्ल्यूएचओ ने बताया कि रेबीज से बचाव के लिए टीका उपलब्ध है और संपर्क के तुरंत बाद उपचार से जान बचाई जा सकती है, लेकिन लक्षण दिखाई देने के बाद इसका कोई इलाज नहीं है और परिणाम घातक होते हैं इसके अलावा, रिपोर्ट में सांप के काटने की घटनाओं को भी राज्य के लिए एक बड़ी चिंता बताया गया है। वर्ष 2024-25 में राज्य में सांप के काटने से 138 मौतें दर्ज की गई हैं। 

पटना, चंपारण और गोपालगंज जैसे जिले कुत्तों के आतंक से त्रस्त हैं, वहीं कुछ जिलों में स्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर है। रोहतास, सुपौल और औरंगाबाद जैसे क्षेत्रों में मामले 2,000 से कम रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि नसबंदी और टीकाकरण अभियानों की सुस्त रफ़्तार इस संकट का मुख्य कारण है। यदि समय रहते आवारा कुत्तों की आबादी पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो यह संकट आने वाले समय में और भी विकराल रूप ले सकता है। 

 

टॅग्स :बिहारHealth Department
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