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US Election Result 2024: अमेरिका में अब कमजोर पड़ रहा है लोकतंत्र?

By राजेश बादल | Updated: November 6, 2024 12:46 IST

US Election Result 2024 LIVE: विश्व के तमाम लोकतांत्रिक और जागरूक समाजों को भी इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि अमेरिका अपने को दुनिया का चौधरी समझता है.

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ठळक मुद्दे यह अमेरिकी प्रजा के लिए चिंता की बात हो सकती है.गोरे देश की सियासत की गाड़ी पटरी से उतरी हुई है. वारदातों ने इस प्रजातंत्र का चेहरा मलिन कर दिया है.

US Election Result 2024 LIVE: बीता दशक अमेरिकी लोकतंत्र के नजरिये से कोई बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता. मुहावरे की भाषा में भले ही कहा जाए कि यह देश संसार का सबसे पुराना लोकतंत्र है, लेकिन चुनाव दर चुनाव हम वहां जम्हूरियत को कमजोर पड़ते देख रहे हैं. यहां मेरा आशय संवैधानिक प्रक्रिया के तहत निर्वाचन से नहीं बल्कि उन प्रवृत्तियों से है, जो इस तथाकथित सभ्य लोकतंत्र में बढ़ती जा रही हैं. एक अमीर और सौ फीसदी साक्षर राष्ट्र में सामंती आदतों के पनपने को यकीनन गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जा सकता है. यह अमेरिकी प्रजा के लिए चिंता की बात हो सकती है.

मगर, विश्व के तमाम लोकतांत्रिक और जागरूक समाजों को भी इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि अमेरिका अपने को दुनिया का चौधरी समझता है. इसलिए विषय और भी संवेदनशील हो जाता है. बराक ओबामा का कार्यकाल पूरा होने के बाद से ही इस गोरे देश की सियासत की गाड़ी पटरी से उतरी हुई है. राजनेताओं की सोच में सामंती व्यवहार घुल गया है, एक-दूसरे पर स्तरहीन अश्लील आक्रमण होने लगे हैं, संवैधानिक मर्यादाओं का तार-तार बिखरना दिखाई दे रहा है और फायरिंग तथा जानलेवा हमले की हिंसक वारदातों ने इस प्रजातंत्र का चेहरा मलिन कर दिया है.

हालांकि ऐसे दृश्यों के उदाहरण आप भारतीय गणतंत्र के भी दे सकते हैं, लेकिन तब आपको याद रखना होगा कि यहां हजार साल पुरानी राजशाही, निरंकुश शासन और अमानवीय गुलामी की गहरी जड़ें हैं. केवल 77 साल में यह जड़ें नहीं सूख सकतीं. इसके अलावा हमें यह भी याद रखना होगा कि हिंदुस्तान में अमेरिका से लगभग 78 करोड़ अधिक मतदाता हैं.

आप यूं भी कह सकते हैं कि पांच अमेरिका के बराबर मतदाता केवल हिंदुस्तान में हैं और यहां जितनी सामाजिक तथा धार्मिक विविधता है, उसमें अभी भी सौ फीसदी स्वस्थ लोकतंत्र का सपना देखना दूर की कौड़ी है. हाल ही में द न्यूयॉर्क टाइम्स और सिएना कॉलेज के संयुक्त सर्वेक्षण में अमेरिका के तीन-चौथाई मतदाताओं ने माना है कि देश में लोकतंत्र खतरे में है.

लगभग आधे का मानना है कि लोकतंत्र का यह संस्करण लोगों का बेहतर प्रतिनिधित्व नहीं कर रहा. मतदाता मानते हैं कि देश में जबरदस्त भ्रष्टाचार है. यदि हम इस सर्वेक्षण का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि मुल्क में पूंजी का प्रभाव बढ़ने से लोकतंत्र की सामुदायिक नेतृत्व भावना कमजोर पड़ी है. संपन्नता ने व्यक्ति के राजसी संस्कारों को जगाने का काम किया है.

इससे अनेक बुराइयों ने प्रशासनिक तंत्र में घर बना लिया है. देश की राजनीति में पैसे का बोलबाला है.राष्ट्रपति पद के रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प का ताजा बयान इसका सबूत है. वे पेंसिल्वेनिया में कहते हैं कि पिछले चुनाव में हार के बाद उन्हें व्हाइट हाउस नहीं छोड़ना चाहिए था. यानी हार के बाद भी वे सिंहासन खाली करने के लिए तैयार नहीं थे.

अब इस कथन से आशंका यह हो रही है कि इस बार के चुनाव में यदि वे हार गए तो परिणामों को स्वीकार ही नहीं करेंगे. यह लोकतंत्र के दृष्टिकोण से एक जहरीला बयान है. अब उनका चुनाव अभियान चलाने वालों की मानें तो वे हार होने से पहले ही नतीजे पलटने के लिए देश भर में मुहिम छेड़ेंगे. उनके समर्थकों ने बारीक अंतर से हार-जीत दिखा रहे सात राज्यों में अभी से करीब 100 अदालती याचिकाएं लगाई हैं.

चुनाव कार्य में लगे 38 प्रतिशत अधिकारियों को धमकियां मिली हैं और 54 फीसदी निर्वाचन अधिकारी बेहद भयभीत हैं. उन्हें अपने ऊपर ट्रम्प के समर्थकों की ओर से जानलेवा हमले का डर है. दो बार डोनाल्ड ट्रम्प पर ऐसी फायरिंग हुई कि उनको कोई शारीरिक नुकसान नहीं हुआ (राहत की बात है) अलबत्ता उन्होंने अपने ऊपर हमलों को रैलियों में जमकर भुनाया और सहानुभूति बटोरी.

ट्रम्प कई बार कह चुके हैं कि बिना चुनावी धोखाधड़ी के वे हार नहीं सकते. उनके वकील मतदान से पहले ही इस तैयारी में हैं कि समूचे डेमोक्रेटिक मतों को ही अवैध करार दे दिया जाए. यह मंशा तो किसी भी सभ्य लोकतंत्र में उचित नहीं मानी जा सकती. डोनाल्ड ट्रम्प अपने अलोकतांत्रिक व्यवहार और शर्मनाक झूठे कथनों के लिए पूरे संसार में कुख्यात हैं.

वाशिंगटन पोस्ट के एक तथ्यात्मक सर्वेक्षण में पाया गया था कि उन्होंने राष्ट्रपति रहते हुए 30 हजार से अधिक झूठ बोले. अर्थात प्रतिदिन उन्होंने 21 बार गलतबयानी की. एक अन्य अखबार ने तो उनके असत्य कथनों का खास परिशिष्ट ही निकाल दिया था. न्यायालय की एक जूरी उन्हें ऐसे मामलों में दोषी ठहरा चुकी है और अटॉर्नी जनरल भी उनकी आलोचना कर चुके हैं.

जिन हिंदुओं के बारे में वे इन दिनों चिंतित हैं, अपने कार्यकाल में उनके लिए उन्होंने कुछ नहीं किया. भारत का अपमान करने में भी वे पीछे नहीं रहे. अफगानिस्तान में मानवीय सहायता के बारे में वे भारत की खिल्ली उड़ाते रहे हैं. उन्होंने तो यहां तक कहा कि भारत जितना पैसा अफगानिस्तान के लोगों पर खर्च कर रहा है, उतना तो अमेरिका एक घंटे में वहां खर्च कर देता है.

इसका अर्थ यह नहीं कि डोनाल्ड ट्रम्प की प्रतिद्वंद्वी कमला हैरिस लोकतंत्र की बड़ी हिमायती हैं. जो लोग उनके सियासी सफर को गहराई से समझते हैं, वे जानते हैं कि कमला एक बेहद महत्वाकांक्षी महिला हैं. वे भारत सरकार की कश्मीर नीति की पुरानी कट्टर आलोचक रही हैं. लोकतांत्रिक मूल्य उनके व्यवहार में नहीं नजर आते. फिर भी ट्रम्प की तुलना में वे बेहतर डेमोक्रेट हैं.

उनके सामने बड़ी बाधा अमेरिकी मतदाताओं की परंपरावादी सोच भी है, जिसके तहत आज तक कोई महिला अमेरिका की राष्ट्रपति नहीं चुनी गई. जो भी मैदान में उतरीं, हार गईं. क्या यह ताज्जुब की बात नहीं है कि अमेरिका में संविधान लागू होने के 133 साल बाद स्त्रियों को वोट डालने का हक मिला. वह भी लंबे संघर्ष के बाद. भारत में तो संविधान लागू होते ही महिलाओं को बराबरी से मत देने का अधिकार मिल गया था. इसी तरह वहां अश्वेतों को भी मताधिकार के लिए दशकों तक संघर्ष करना पड़ा था.

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