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वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग: बदहाली से जूझ रहा है पाकिस्तान

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: January 16, 2023 11:05 IST

पाकिस्तान के पंजाब को गेहूं का भंडार कहा जाता है लेकिन सवाल यह है कि बलूचिस्तान और पख्तूनख्वाह के लोग आटे के लिए क्यों तरस रहे हैं? यहां सवाल सिर्फ आटे और बलूच या पख्तून लोगों का ही नहीं है, पूरे पाकिस्तान का है. 

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ठळक मुद्देआटे की कमी इतनी है कि जिसे उसकी थैली मिल जाती है, उससे भी छीनने के लिए कई लोग बेताब होते हैं.मारपीट में कई लोग अपनी जान से भी हाथ धो बैठते हैं.अमेरिका, यूरोपीय राष्ट्र और सऊदी अरब ने मदद जरूर की है लेकिन पाकिस्तान को कर्जे से लाद दिया है.

पाकिस्तान के आजकल जैसे हालात हैं, मेरी याददाश्त में भारत या हमारे पड़ोसी देशों में ऐसे हाल न मैंने कभी देखे और न ही सुने. टीवी चैनलों में वहां के दृश्य देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं. गेहूं का आटा वहां 250-300 रु. किलो बिक रहा है. वह भी आसानी से नहीं मिल रहा है. बूढ़े, मर्द, औरतें और बच्चे पूरी-पूरी रात लंबी लाइनों में लगे रहते हैं. वहां ठंड शून्य से भी काफी नीचे होती है. 

आटे की कमी इतनी है कि जिसे उसकी थैली मिल जाती है, उससे भी छीनने के लिए कई लोग बेताब होते हैं. मारपीट में कई लोग अपनी जान से भी हाथ धो बैठते हैं. पाकिस्तान के पंजाब को गेहूं का भंडार कहा जाता है लेकिन सवाल यह है कि बलूचिस्तान और पख्तूनख्वाह के लोग आटे के लिए क्यों तरस रहे हैं? यहां सवाल सिर्फ आटे और बलूच या पख्तून लोगों का ही नहीं है, पूरे पाकिस्तान का है. 

पूरे पाकिस्तान की जनता त्राहिमाम कर रही है, क्योंकि खाने-पीने की हर चीज के दाम आसमान छू रहे हैं. गरीब लोगों के तो क्या, मध्यम वर्ग के भी पसीने छूट रहे हैं. बेचारे शाहबाज शरीफ प्रधानमंत्री क्या बने हैं, उनकी शामत आ गई है. वे सारी दुनिया में झोली फैलाए घूम रहे हैं. विदेशी मुद्रा का भंडार सिर्फ कुछ हफ्तों का ही बचा है. यदि विदेशी मदद नहीं मिली तो पाकिस्तान का हुक्का-पानी बंद हो जाएगा. 

अमेरिका, यूरोपीय राष्ट्र और सऊदी अरब ने मदद जरूर की है लेकिन पाकिस्तान को कर्जे से लाद दिया है. ऐसे में कई पाकिस्तानी मित्रों ने मुझसे पूछा कि भारत चुप क्यों बैठा है? भारत यदि अफगानिस्तान और यूक्रेन को हजारों टन अनाज और दवाइयां भेज सकता है तो पाकिस्तान तो उसका एकदम पड़ोसी है. मैंने उनसे जवाब में पूछ लिया कि क्या पाकिस्तान ने कभी पड़ोसी का धर्म निभाया है? 

फिर भी, मैं मानता हूं कि नरेंद्र मोदी इस वक्त पाकिस्तान की जनता (उसकी फौज और शासकों के लिए नहीं) की मदद के लिए हाथ बढ़ा दें तो यह उनकी ऐतिहासिक पहल मानी जाएगी. पाकिस्तान के कई लोगों को टीवी पर मैंने कहते सुना है कि ‘इस वक्त पाकिस्तान को एक मोदी चाहिए.’

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