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वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग: यूक्रेन संकट को लेकर भारत की दुविधा

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: January 22, 2022 13:59 IST

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और विदेश मंत्री खुलेआम रूस को धमकी दे रहे हैं कि यदि रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तो उसके नतीजे बहुत बुरे होंगे।

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इस समय यूक्रेन पर सारी दुनिया की नजर लगी हुई हैं, क्योंकि अमेरिका और रूस एक-दूसरे को युद्ध की धमकी दे रहे हैं। जैसे किसी जमाने में बर्लिन को लेकर शीतयुद्ध के उष्णयुद्ध में बदलने की आशंका पैदा होती रहती थी, वैसा ही आजकल यूक्रेन को लेकर हो रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और विदेश मंत्री खुलेआम रूस को धमकी दे रहे हैं कि यदि रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तो उसके नतीजे बहुत बुरे होंगे।

सचमुच यदि यूरोप में युद्ध छिड़ गया तो इस बार वहां प्रथम और द्वितीय महायुद्ध से भी ज्यादा लोग मारे जा सकते हैं, क्योंकि इन युद्धरत राष्ट्रों के पास अब परमाणु शस्त्नास्त्नों और प्रक्षेपास्त्रों का अंबार लगा हुआ है। रूस ने यूक्रेन की सीमा पर लगभग एक लाख फौजियों को जमा कर रखा है। यूक्रेन के दोनबास क्षेत्र पर पहले से रूस-समर्थक बागियों का कब्जा है।

यूक्रेन पर लंबे समय तक रूस का राज रहा है। वह अभी लगभग दो-दशक पहले तक रूस का ही एक प्रांत था। इस समय यूरोप में यूक्रेन ही रूस के बाद सबसे बड़ा देश है। लगभग सवा चार करोड़ की आबादी वाला यह पूर्वी यूरोपीय देश पश्चिमी यूरोप के अमेरिका-समर्थक देशों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाने की कोशिश करता रहा है।

वह रूस के शिकंजे से उसी तरह बाहर निकलना चाहता है, जिस तरह से सोवियत खेमे के अन्य 10 देश निकल चुके हैं। उसने यूरोपीय संघ के कई संगठनों के साथ सहयोग के कई समझौते भी कर लिए हैं। रूस के नेता व्लादिमीर पुतिन को डर है कि कहीं यूक्रेन भी अमेरिका के सैन्य संगठन ‘नाटो’ का सदस्य न बन जाए। यदि ऐसा हो गया तो नाटो रूस की सीमाओं के बहुत नजदीक पहुंच जाएगा। 

यूक्रेन और जार्जिया जैसे देशों को रूस अपने प्रभाव-क्षेत्र से बाहर नहीं खिसकने देना चाहता है। जोजफ स्तालिन का जन्म जार्जिया में ही हुआ था। इन दोनों देशों के साथ-साथ अभी भी मध्य एशिया के पूर्व-सोवियत देशों में रूस का वर्चस्व बना हुआ है। अफगानिस्तान से अमेरिकी पलायन के कारण रूस की हिम्मत बढ़ी है। यों भी यूक्रेन पर बाइडेन और पुतिन के बीच सीधा संवाद भी हो चुका है और दोनों देशों के विदेश मंत्री भी आपस में बातचीत कर रहे हैं।

मुझे नहीं लगता कि यूक्रेन को लेकर दोनों महाशक्तियों के बीच युद्ध छिड़ेगा, क्योंकि वैसा होगा तो यूरोप के नाटो देशों को मिलनेवाली रूसी गैस बंद हो जाएगी। उनका सारा कारोबार ठप हो जाएगा और उधर रूस की लड़खड़ाती हुई अर्थव्यवस्था पेंदे में बैठ जाएगी। खुद यूक्रेन भी युद्ध नहीं चाहेगा, क्योंकि लगभग एक करोड़ रूसी लोग वहां रहते हैं।

इस संकट में भारत की दुविधा बढ़ गई है। इस समय भारत तो अमेरिका के चीन-विरोधी मोर्चे का सदस्य है और वह रूस का भी पुराना मित्र है। उसे बहुत फूंक-फूंककर कदम रखना होगा।

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