सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि सरकार का यह रवैया अनुचित है, क्योंकि 1993 में जो काॅलेजियम पद्धति तय हुई थी, उसके अनुसार यदि चयन-मंडल किसी नाम को दोबारा भेज दे तो सरकार के लिए उसे शपथ दिलाना अनिवार्य होता है।
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प्रथमदृष्टया तो यह लूला दा सिल्वा की ब्रासीलिया में हैरतअंगेज वापसी और बोलसोनारो की उम्मीदों के विपरीत पराजय इसका तात्कालिक कारण हो सकती है। लेकिन इसके अन्य आयामों को जानने के लिए तो ब्राजील के अंदर झांक कर देखना होगा।
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रूस-यूक्रेन युद्ध तथा चीन की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था से यूरोपीय देशों के साथ-साथ अमेरिका की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होने लगी है। तमाम विकसित देशों में ऊर्जा तथा अन्न के संकट की आहट आने लगी है। आयात-निर्यात पर भी बहुत बुरा असर पड़ा है। आर्थिक मंदी किस
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जिन पहाड़ों, पेड़ों, नदियों ने पांच हजार साल से अधिक तक मानवीय सभ्यता, अध्यात्म, धर्म, पर्यावरण को विकसित होते देखा था, वह बिखर चुके थे। न सड़क बच रही है न मकान, न ही नदी के किनारे। सरकार ने भी कह दिया कि जोशीमठ को खाली करना होगा।
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भाजपा जहां लोकसभा चुनावों के पूर्व अपने कल-पुर्जों को दुरुस्त करने में लगी है वहीं कांग्रेस भी कई राज्यों में अपने वाटरलू का सामना कर रही है। भाजपा का फोकस इस बात पर है कि अपने हिंदू वोट बैंक को बरकरार रखते हुए मुस्लिम वोट कैसे हासिल किए जाए।
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आपको बता दें कि स्वामी विवेकानंद युवाओं को हमेशा प्रेरित करते रहते थे। ऐसे में उन्होंने देश के युवाओं के लिए कहा था ‘उठो, जागो और तब तक मत रूको, जब तक कि मंजिल प्राप्त न हो जाए।’
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आपको बता दें कि आम चुनाव अभी कुछ दूर हैं, पर नौ राज्यों में चुनाव बहुत दूर नहीं हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों का मुकाबला भाजपा कैसे करेगी।
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एक मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष का लोकतंत्र के एक स्तंभ पर खुल्लमखुल्ला आरोप लगाना कितना शालीन है? उनसे यह सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए कि एक पूर्व मुख्यमंत्री को इस मामले में राज्य के मुख्यमंत्री या गृह मंत्री के पास क्यों नहीं जाना चाह
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पंडित जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद तीन मूर्ति भवन लालबहादुर शास्त्री को आवंटित हुआ। लेकिन उन्होंने वहां शिफ्ट करने से मना कर दिया था। शास्त्रीजी तीन मूर्ति भवन में मोटे तौर पर दो कारणों के चलते जाने के लिए तैयार नहीं थे।
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द्रमुक के जब दो धड़े हुए और एम.जी. रामचंद्रन के नेतृत्व में अन्ना द्रमुक अस्तित्व में आई तब द्रविड़ राजनीति का वह धड़ा हिंदू धर्म की परंपराओं तथा आस्थाओं में विश्वास को खुलेआम जताने लगा.
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