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Women sexual crimes: क्रूर होते समाज में कैसे रुकेंगे यौन अपराध?

By राजेश बादल | Updated: August 27, 2024 05:19 IST

Women sexual crimes: असम के लखीमपुर और नागांव में ऐसी ही दो घटनाएं, तमिलनाडु में एनसीसी के फर्जी शिविर में छात्राओं से सामूहिक दुष्कर्म, उत्तर प्रदेश में मुरादाबाद और देवरिया, प्रयागराज और बाराबंकी तथा राजस्थान में धौलपुर और हिंडौन की बलात्कार-वारदातें पखवाड़े की बड़ी सुर्खियां हैं.

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ठळक मुद्देबत्तीस साल पहले अजमेर के दिल दहलाने वाले सामूहिक दुष्कर्म मामले की यात्रा इसका गवाह है.विकृत अपराधियों ने एक बड़े कारोबारी के बेटे से अप्राकृतिक कृत्य किया.लड़कियों को ब्लैकमेल किया, उनके परिवारों से पैसे ऐंठे.

Women sexual crimes: महिलाओं के साथ लगातार यौन अपराधों की खबरें विचलित करने वाली हैं. जिस तेजी के साथ हालिया दशकों में इन अपराधों का आंकड़ा बढ़ा है, उससे नहीं लगता कि समाज और देश मानसिक तरक्की के किसी रास्ते पर चल रहा है. साक्षरता का प्रतिशत बढ़ने के आंकड़ों पर हम अपनी पीठ नहीं थपथपा सकते और न ही आर्थिक संपन्नता पर गर्व कर सकते हैं. बंगाल के कोलकाता में प्रशिक्षु महिला चिकित्सक से दरिंदगी, महाराष्ट्र के बदलापुर में दो मासूम बच्चियों का उत्पीड़न, असम के लखीमपुर और नागांव में ऐसी ही दो घटनाएं, तमिलनाडु में एनसीसी के फर्जी शिविर में छात्राओं से सामूहिक दुष्कर्म, उत्तर प्रदेश में मुरादाबाद और देवरिया, प्रयागराज और बाराबंकी तथा राजस्थान में धौलपुर और हिंडौन की बलात्कार-वारदातें पखवाड़े की बड़ी सुर्खियां हैं.

इन मामलों में कहीं-कहीं समाज की ओर से गंभीर प्रतिरोध आंशिक राहत तो देता है, लेकिन अधिकतर मामलों में समाज की चुप्पी अच्छा संकेत नहीं देती. पीड़िताओं को न्याय नहीं मिलने का आक्रोश  चरम पर है और उनके लिए लड़ने वाले अल्पमत में हैं. बत्तीस साल पहले अजमेर के दिल दहलाने वाले सामूहिक दुष्कर्म मामले की यात्रा इसका गवाह है.

सात दिन पहले इसका निर्णय आया. राजस्थान का यह मामला आजाद भारत का सबसे बड़ा और तकलीफदेह वाकया है. उन दिनों मैं राजस्थान में था और इस मामले की कवरेज की थी. इस अपराध कथा को याद करके आज भी रूह कांप जाती है. उन दिनों हम सोचते थे कि जिंदगी में फिर कभी ऐसा कवरेज नहीं करना पड़े. कुछ विकृत अपराधियों ने एक बड़े कारोबारी के बेटे से अप्राकृतिक कृत्य किया.

फिर उसे ब्लैकमेल करके उसकी किशोर छात्रा मित्र को बुलवाया. उसके साथ दुष्कर्म हुआ. फिर उस छात्रा को ब्लैकमेल करके स्कूल की सौ किशोरियों के साथ दुष्कर्म का सिलसिला जारी रहा. मामला उजागर नहीं होता, यदि अपराधियों ने दुष्कर्म की तस्वीरों की रील कलर लैब में धुलने नहीं भेजी होती (उन दिनों फोटो के लिए कैमरे में रील डाली जाती थी).

लैब के मालिक ने प्रिंट निकाले तो उसने लड़कियों को ब्लैकमेल किया, उनके परिवारों से पैसे ऐंठे. जिनसे बात नहीं बनी तो फोटो सार्वजनिक कर दिए. एक समाचारपत्र ने खबर छाप दी. तीन दशक पहले के छोटे से, किंतु पढ़े-लिखे अजमेर में हंगामा हो गया. कई पीड़ित परिवार बदनामी से शहर छोड़ गए. छह लड़कियों ने आत्महत्या कर ली.

सौ में से 18 लड़कियों ने हौसला दिखाया और अंत तक लड़ाई लड़ी. कुल 18 अपराधी थे. इनमें से नौ को पहले ही सजा हो चुकी थी. बाकी को पिछले सप्ताह हुई. एक अपराधी ने आत्महत्या कर ली. लड़ाई लड़ने वाली किशोरियां अब बूढ़ी हो चली हैं. असल प्रश्न तो यह है कि क्या यह समाज और तंत्र उन किशोरियों की जवानी और सामाजिक प्रतिष्ठा वापस लौटा सकता है?

बरसों तक वे लड़कियां घरवालों से छिपते -छिपाते अदालत आती रहीं. इनमें से चंद किशोरियों का तो घर बस गया. वे दादी-नानी तक बन चुकी हैं. उनमें कुछ के तो घरवालों को अभी तक भी कुछ नहीं मालूम, मगर कुछ ऐसी भी हैं जिनकी बदनामी और अपयश के कारण शादी नहीं हो सकी. वे न्यायालय की कार्यवाही का सामना करते करते पचास-पचपन की उम्र पार कर चुकी हैं.

उनका गृहस्थ सुख और खोई हुई पारिवारिक जिंदगी अब दोबारा नहीं आ सकती. सबसे बड़ी बात यह कि ऐसे जघन्य अपराधों में समाज और तंत्र ने संवेदना नहीं दिखाई. कोई सरकार विशेष न्यायालय नहीं बना सकी. समर्पित डाकुओं के लिए तो स्पेशल कोर्ट बनाए गए, पर महिलाओं के सम्मान को लेकर कोई पहल नहीं हुई.

हम उनके सम्मान की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, पर उनकी हिफाजत के लिए कुछ विशेष प्रबंध नहीं करना चाहते. हमारी कथनी और करनी में फर्क है. आंकड़ों की बात करें तो दहशत होती है. राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान ब्यूरो की जानकारी इसे और विकराल बनाती है. भारत में एक साल में महिलाओं के साथ चार लाख से ज्यादा अपराध होते हैं.

हर घंटे में तीन स्त्रियों के साथ दुष्कर्म की वारदातें होती हैं. इनमें 73 फीसदी अपराधी सबूतों के अभाव में बरी हो जाते हैं. सिर्फ 27 प्रतिशत को सजा होती है. कई मामलों में यह सजा भी उच्च न्यायालयों में जाकर कम हो जाती है. एक दशक पहले तक हर साल औसतन 25000 दुष्कर्म के मामले दर्ज होते थे. लेकिन अब यह आंकड़ा बढ़कर चालीस हजार के आसपास जा पहुंचा है.

राजस्थान दुष्कर्म के मामले में सभी राज्यों से ऊपर है. इसके बाद उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश कमोबेश बराबरी पर हैं. फिर क्रमशः महाराष्ट्र, हरियाणा, ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, दिल्ली और असम हैं. ध्यान देने की बात यह है कि 96 प्रतिशत मामलों में जान-पहचान के लोग ही अपराधी निकलते हैं. इस कारण सामाजिक और पारिवारिक दबाव के चलते न्यायालय में सबूत कमजोर पड़ जाते हैं. मुजरिम छूट जाता है.

एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने बीते दिनों अपने एक सर्वेक्षण में पाया था कि भारत में अदालतें इसी वजह से प्रावधान होते हुए भी दुष्कर्म के अपराधियों को सख्त दंड नहीं दे पातीं. दुष्कर्म और उसके बाद महिला की हत्या करने के मामले लगभग हर दूसरे दिन आते हैं. पर, बीते चौबीस बरस में केवल पांच अपराधियों को फांसी की सजा दी गई. यह किसी भी जागरूक होते समाज के लिए शर्म का विषय है.

पच्चीस साल पहले अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में सुषमा स्वराज सूचना प्रसारण मंत्री थीं. उन दिनों भारत में उपग्रह क्रांति हुई थी. संसार भर के चैनल आप देख सकते थे. इनमें अनेक पोर्न चैनल थे. तब कुछ मामले ऐसे आए, जिनमें इन पोर्न चैनलों को देखकर यौन अपराध हुए.

सुषमा स्वराज ने इसे बेहद गंभीरता से लिया. आखिरकार सरकार की सख्ती रंग लाई. अश्लील कंटेंट वाले उन चैनलों पर बंदिश लग गई. यौन अपराधों पर भी नियंत्रण लगा. लेकिन इन दिनों फिर सब कुछ खुल्लमखुल्ला है. सरकार को इस पर रोक लगानी ही पड़ेगी.

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