लाइव न्यूज़ :

पुण्य प्रसून वाजपेयी का ब्लॉग: वर्ष 2019 में चुनौतियां भी कम नहीं होंगी

By पुण्य प्रसून बाजपेयी | Updated: January 1, 2019 08:31 IST

ध्यान दें तो बरस बीतते बीतते एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर मनमोहन सिंह की राजनीति और अर्थशास्त्न को उस सियासत के केंद्र में खड़ा कर गया जो सियासत आज सर्वोच्च ताकत रखती है.

Open in App

 नए बरस का आगाज सवालों के साथ हो रहा है. ऐसे सवाल जो अतीत को खंगाल रहे हैं और भविष्य का ताना-बाना अतीत के साये में ही बुन रहे हैं. देश लूट या टूट के मझधार में आकर फंसा हुआ है. देश संसदीय राजनीतिक बिसात में मंडल-कमंडल की थ्योरी को पलटने के लिए तैयार बैठा है. देश के सामने आर्थिक चुनौतियां 1991 के आर्थिक सुधार को चुनौती देते हुए नई लकीर खींचने को तैयार हैं. देश प्रधानमंत्नी पद की गरिमा और ताकत को लेकर नई परिभाषा गढ़ने को तैयार है. और बदलाव के दौर से गुजरते हिंदुस्तान की रगों में पहली बार भविष्य को गढ़ने के लिए अतीत को ही स्वर्णिम मानना दौड़ रहा है.

ध्यान दें तो बरस बीतते बीतते एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर मनमोहन सिंह की राजनीति और अर्थशास्त्न को उस सियासत के केंद्र में खड़ा कर गया जो सियासत आज सर्वोच्च ताकत रखती है. सिलसिलेवार तरीके से 2019 में उलझते हालातों को समङों तो देश के सामने पहली सबसे बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार की लूट और सामाजिक तौर पर देश की टूट के बीच से किसी एक को चुनने की है.

कांग्रेसी सत्ता 2014 में इसलिए खत्म हुई क्योंकि घोटालों की फेहरिस्त देश के सामने इस संकट को उभार रही थी कि उसका भविष्य अंधकार में है. पर 2018 के बीतते बीतते देश के सामने भ्रष्टाचार की लूट से कहीं बड़ी लकीर सामाजिक तौर पर देश की टूट ही चुनौती बन खड़ी हो गई. संविधान से नागरिक होने के अधिकार वोटर की ताकत तले इस तरह दब गए कि देश के 17 करोड़ मुस्लिम नागरिक की जरूरत सत्ता को है ही नहीं इसका खुला एहसास लोकतंत्न के गीत गाकर सत्ता भी कराने से नहीं चूकी.

नागरिक के समान अधिकार भी वोटर की ताकत तले कैसे दब जाते हैं इसे 14 करोड़ दलित आबादी ने खुल कर महसूस किया. यानी संविधान के आधार पर खड़े लोकतांत्रिक देश में नागरिक शब्द गायब हो गया और वोटर शब्द हावी हो गया. 2019 में इसे कौन पाटेगा ये कोई नहीं जानता. 

2019 की दूसरी चुनौती 27 बरस पहले अपनाए गए आर्थिक सुधार के विकल्प के तौर पर राजनीतिक सत्ता पाने के लिए अर्थव्यवस्था के पूरे ढांचे को ही बदलने की है और ये चुनौती उस लोकतांत्रिक सत्ता से उभरी है जिसमें नागरिक, संविधान और लोकतंत्न भी सत्ता बगैर महत्वहीन है. यानी किसान का संकट, मजदूर की बेबसी, महिलाओं के अधिकार, बेरोजगारी और सामाजिक टूटन सरीखे हर मुद्दे सत्ता पाने या न गंवाने की बिसात पर इतने छोटे हो चुके हैं कि भविष्य का रास्ता सिर्फ सत्ता पाने से इसलिए जा जुड़ा है क्योंकि 2018 का पाठ अलोकतांत्रिक होकर खुद को लोकतांत्रिक बताने से जा जुड़ा.

टॅग्स :न्यू ईयरइंडियन एयर फोर्सभारत सरकार
Open in App

संबंधित खबरें

कारोबारFuel Price Freeze: पेट्रोल पर नुकसान बढ़कर 18 और डीजल पर 35 रुपये प्रति लीटर?, अप्रैल 2022 से खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं

कारोबारजयपुर मेट्रो परियोजनाः 13038 करोड़ रुपये की लागत, 36 स्टेशन और प्रहलादपुरा से तोड़ी मोड़ तक 41 किमी लंबा

भारतआपके घर में क्या-क्या है?, जनगणना के पहले चरण के लिए 33 प्रश्न जारी, लिव-इन में रहने वाले 2 लोग एक-दूसरे को अपना मानते हैं तो दंपति के समान?

कारोबारमार्च 2027 तक 10000000 घरों को सौर ऊर्जा लक्ष्य?, पीएम मोदी ने कहा- शहर चाहे बड़ा हो या छोटा, बदलाव दिख रहा, बड़ी संख्या में घरों की छतों पर सौलर पैनल

भारतरेलवे में आजीवन फ्री सफर, प्रथम श्रेणी/2 एसी/एसी चेयर कार में एक साथी के साथ निःशुल्क यात्रा करेंगे वीरता पुरस्कार विजेता

भारत अधिक खबरें

भारतNari Shakti Vandan Adhiniyam: महिलाएं राजनीति में सुधार ला सकेंगी?

भारतNari Shakti Vandan Adhiniyam: समावेशी लोकतंत्र की निर्णायक दिशा में कदम

भारतदक्षिण भारत के 5 राज्य में अभी 129 सांसद और परिसीमन के बाद होंगे 195?, कर्नाटक में 42,आंध्र प्रदेश में 38, तेलंगाना में 26, तमिलनाडु में 59 और केरल में 30?, अमित शाह ने समझाया गणित?

भारतमध्यप्रदेश: आचार्य शंकर की गुरु एवं संन्यास भूमि ओंकारेश्वर में मनाया जाएगा एकात्म पर्व, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सहित द्वारका शंकराचार्य सदानंद सरस्वती करेंगे शुभारंभ

भारतमहाराष्ट्र: 1 मई से रिक्शा और टैक्सी ड्राइवरों के लिए मराठी भाषा ज़रूरी