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राजनीति मौके का लाभ उठाने की कला नहीं, सांसदों को वोट देना भी नहीं आता!

By विश्वनाथ सचदेव | Updated: September 10, 2025 05:28 IST

उपराष्ट्रपति पद के लिए मतदान क्या सचमुच इतनी जटिल प्रक्रिया है कि सबकुछ जानने का दावा करने वाले हमारे सांसदों को यह भी सिखाना पड़े कि वोट कैसे डाला जाता है!

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ठळक मुद्देहमारे सांसदों को वोट देना भी नहीं आता! यह सुनकर मैं भी अनायास ही मुस्कराने लगा था.कम पढ़े-लिखे, या फिर अनपढ़ भी सांसद बनते हों. पर इक्कीसवीं सदी के हमारे सांसद तो ऐसे नहीं हैं.मतदान का तरीका सिखाने की नहीं, अपने-अपने सांसदों को एकजुट रखने की है.

सातवीं-आठवीं में पढ़ने वाला वह बच्चा टीवी पर समाचार सुनते-सुनते अचानक हंस पड़ा. समाचार तो मैं सुन रहा था, उसने अनायास ही वह समाचार सुन लिया होगा. समाचार उपराष्ट्रपति के चुनाव के बारे में था और एंकर कह रहा था, सत्तारूढ़ पक्ष और विपक्ष दोनों ने अपने सांसदों को मतदान का तौर-तरीका समझाने के लिए संसद-भवन में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए. जब मैंने बच्चे से हंसने का कारण पूछा तो उसने बताया कि उसे हंसी इस बात पर आ रही थी कि हमारे सांसदों को वोट देना भी नहीं आता! यह सुनकर मैं भी अनायास ही मुस्कराने लगा था.

बात तो सही है, उपराष्ट्रपति पद के लिए मतदान क्या सचमुच इतनी जटिल प्रक्रिया है कि सबकुछ जानने का दावा करने वाले हमारे सांसदों को यह भी सिखाना पड़े कि वोट कैसे डाला जाता है! रहा होगा कोई जमाना जब कुछ कम पढ़े-लिखे, या फिर अनपढ़ भी सांसद बनते हों. पर इक्कीसवीं सदी के हमारे सांसद तो ऐसे नहीं हैं.

बहरहाल, मैंने उस बच्चे को बताया कि बात मतदान का तरीका सिखाने की नहीं, अपने-अपने सांसदों को एकजुट रखने की है. इस तरह के कार्यक्रम आयोजित करके राजनीतिक दल अपने समर्थकों को जोड़े रखने की कोशिशें करते हैं. यह सुनकर वह बच्चा फिर हंस पड़ा था. इस बार मैंने नहीं पूछा कि वह क्यों हंसा है.

मैंने अपने आप से पूछा था, यह कैसा जनतंत्र है हमारा कि हमें अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों को भी यह समझाना पड़ता है कि जनतंत्र में विचारधारा का भी कुछ मतलब होता है; कि राजनीति अवसर का लाभ उठाने की कला मात्र नहीं है; कि विचारधारा का भी हमारी राजनीति से कुछ रिश्ता होना चाहिए. यह दुर्भाग्य ही है कि हमारी राजनीति सत्ता हथियाने और सत्ता में बने रहने तक ही सीमित होती जा रही है.

विचारों और विचारधाराओं का नाम लेकर राजनीतिक दल बनाए अवश्य जाते हैं, पर चलते वे इसी सिद्धांत पर ही हैं कि सारा खेल सत्ता का है. यदि ऐसा न होता तो हमारे निर्वाचित प्रतिनिधि ‘आयाराम-गयाराम’ का घटिया खेल खेलते न दिखाई देते. जिस गति और आसानी से हमारे राजनेता अपना पाला बदलते हैं, उस पर आश्चर्य ही नहीं होता, शर्म भी आती है.

राजनीतिक दल भी जिस तरह नेताओं की अदला-बदली को प्रोत्साहन देते हैं, वह भी अपने आप में हास्यास्पद ही नहीं, शर्मनाक भी है. हमारे राजनेता, चाहे वे किसी भी रंग के झंडे वाले हों, किसी मूल्य या आदर्श के आधार पर राजनीति करने में विश्वास नहीं करते. कहते वे भले ही कुछ भी रहें, करते वे घटिया राजनीति ही हैं- इस घटिया राजनीति में नीतियों-सिद्धांतों और अंतरात्मा की आवाज का कोई मतलब नहीं होता.

मतलब होता है तो सिर्फ इस बात का कि राजनीति के इस खेल में मुझे कितना और कैसा लाभ मिल सकता है. लोकसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति का पद दलीय हितों से कहीं ऊपर होता है- ऊपर होना चाहिए.  पर अक्सर जो कुछ देखा जाता है वह इसके विपरीत ही होता है.

लोकसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति का चुनाव सांसद ही करते हैं. उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अपने विवेक से यह कार्य करेंगे. इसीलिए इन चुनावों के लिए कोई व्हिप भी जारी नहीं किया जाता. मतदान भी गुप्त ही होता है.

इस सारी प्रक्रिया का अर्थ और उद्देश्य यही है कि मतदाता सांसद बिना किसी दबाव के दलीय स्वार्थों से ऊपर उठकर मतदान कर सकें. पर अक्सर देखा यही गया है कि इन पदों के लिए मतदान का आधार दलीय स्थितियां ही होती हैं. यह स्थिति बदलनी चाहिए. विवेकहीन राजनीति किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कही जा सकती.

टॅग्स :भारत के उपराष्ट्रपतिसंसदBJPकांग्रेस
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