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पुण्य प्रसून वाजपेयी का ब्लॉग: आतंकवाद की खेती बन गया है पीओके

By पुण्य प्रसून बाजपेयी | Updated: February 27, 2019 06:14 IST

लश्कर, जैश और हिजबुल मुजाहिदीन के 81 कैंप हैं. 15 से 25 बरस के युवा कश्मीरियों को फिदायीन बनाने की ट्रेनिंग दी जाती है. आतंकी ट्रेनिंग के साथ 600 रुपए महीना दिया जाता है.

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पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर है, जिसकी पहचान आतंक की एक ऐसी प्रयोगशाला के तौर पर है जिसमें कश्मीरी को ही कश्मीर के नाम पर मौत के मुंह में ढकेलने की ट्रेनिंग दी जाती है. पर्दे के पीछे काम करते हैं पाकिस्तानी रेंजर, पाकिस्तानी सेना और आईएसआई. राजनीतिक तौर पर  जेकेएलएफ और हुर्रियत कान्फ्रेंस अपनी आतंकी भूमिका निभाते हैं और मंच पर जो आंतकी संगठन नजर आते हैं, उनमें लश्कर-ए- तोएबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिदीन, हरकत-उल-जेहाद-अल इस्लामी, हरकत उल मुजाहिद्दीन तथा अल बदर.

यानी बेहद सिस्टेमेटिक तरीके से कश्मीर को लेकर पाकिस्तानी सरकार ही इस तरह काम करती है कि कश्मीर उनका राग हो जाए और आतंकवाद उनकी स्टेट पॉलिसी कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर का दोहन जिस तरह पाकिस्तान ने कर दिया है उसकी तुलना में एलओसी के पार हमारा कश्मीर न सिर्फ जन्नत सरीखा अब भी है बल्कि सामाजिक-आर्थिक तौर पर कई हजार गुना ज्यादा बेहतर भारतीय कश्मीर है. दूसरी तरफ पीओके की हालत ये हो चली है कि 112 आंतकी कैंप नीलम और ङोलम नदी के किनारे चलते हैं.

लश्कर, जैश और हिजबुल मुजाहिदीन के 81 कैंप हैं. 15 से 25 बरस के युवा कश्मीरियों को फिदायीन बनाने की ट्रेनिंग दी जाती है. आतंकी ट्रेनिंग के साथ 600 रुपए महीना दिया जाता है. इस्लामाबाद से 138 किलोमीटर की दूरी पर मुजफ्फराबाद में पाकिस्तानी सेना, आईएसआई और हुर्रियत के नुमाइंदे लगातार लाइन ऑफ कंट्रोल पर मौजूद पाकिस्तानी रेंजरों से ट्रेनिंग पाने वाले आतंकियों को घुसपैठ कराने के लिए संपर्क में रहते हैं. 

इस कतार में पाकिस्तान का अनूठा सच तो ये हो चला है कि सत्ता की कमजोरी का लाभ आतंकवादी संगठनों को नहीं मिला बल्कि हर सत्ता ने अपनी कमजोरी को सौदेबाजी की ताकत में बदलने के लिए आतंकवादी संगठनों की पनाह ली. इसका बेहतरीन उदाहरण आंतक के वो तीन मास्टरमाइंड हैं जिन्हें कोई सत्ता छूती नहीं. मसलन, जैश का मसूद अजहर , लश्कर का  हाफिज सईद और हिजबुल मुजाहिदीन का सैयद सलाउद्दीन.

आलम तो ये है कि पाकिस्तानी सत्ता की निगरानी में तमाम आतंकी संगठनों के जेहादी काउंसिल को भी पाकिस्तान में मान्यता मिल जाती है. समझना यह भी होगा कि पाकिस्तान में आतंक के पनपने की बड़ी वजह गरीबी-मुफलिसी है. पाकिस्तान की आतंकवाद पर तैयार रिपोर्ट ‘प्रोबिंग माइंडसेट ऑफ टेररिज्म’ के  अनुसार करीब दो लाख परिवार आतंक की फैक्ट्री के हिस्से हैं. इनमें 90 फीसदी गरीब परिवार हैं. इन नब्बे प्रतिशत में से 60 प्रतिशत सीधे धर्मस्थलोें से जुड़े हैं.

पाकिस्तान के भीतर के सामाजिक ढांचे में उन लड़कों या युवाओं का रौब उनके अपने गांव या समाज में बाकियों की तुलना में ज्यादा हो जाता है जो किसी आतंकी संगठन से जुड़ जाता है. समझना यह भी होगा कि पाकिस्तान में आतंकवादी संगठन किसी को नहीं कहा जाता है. जैश-ए-मोहम्मद या लश्कर-ए-तोएबा तक कट्टरवादी इस्लामिक संगठन माने जाते हैं. इसलिए भारत जिन्हें आंतकी कहता है उन्हें पाकिस्तान आमिर यानी इस्लाम के स्कॉलर बताता है.

बालाकोट में जैश के कैंप को तबाह करने के साथ ये जानकारी आई है कि जैश के मुखिया मसूद अजहर का बहनोई मौलाना यूसुफ अजहर उर्फ मोहम्मद सलीम उर्फ उस्ताद गौरी और इब्राहिम अतर भी मारा गया. ये दोनों ही 1999 में आईसी 814 विमान अपहरण के पीछे थे और कंधार ले जाकर उन्होंने तीन आतंकियों की रिहाई की जो मांग की थी उसमें जम्मू की कोट बिलावल जेल में बंद मसूद अजहर भी था.

तो फिर पाकिस्तान को आतंकी की परिभाषा बताए कौन या इस्लाम और आतंकी के बीच की लकीर खींचने की हिम्मत करे कौन. लेकिन जो हालात अब बने हैं उसके संकेत साफ हैं, एयर स्ट्राइक के बाद भारत रु क नहीं सकता है और पाकिस्तान की सत्ता या सेना बिना जवाब दिए बिना टिके नहीं रह सकते. तो आतंकी चेहरे फिर सक्रि य होंगे और पीछे पाकिस्तान की वही स्टेट पॉलिसी होगी जो वहां सत्ता को बनाती है लेकिन भारत का आतंक के खिलाफ कार्रवाई के लिए उकसाती है. यानी एयर स्ट्राइक तात्कालिक सोच है. ऐसे में दुनिया को साथ लेना है या फिर अटैक करने के बाद दुनिया से पूछना है कि विकल्प क्या है

टॅग्स :भारतीय वायुसेना स्ट्राइकपाकिस्तानआतंकवादीजैश-ए-मोहम्मद
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