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लोकमत : प्रवाह के विरुद्ध तैरते हुए पचास वर्ष

By विजय दर्डा | Updated: February 18, 2023 08:36 IST

वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी, लोकमत के संस्थापक-संपादक जवाहरलाल दर्डा के जन्म शताब्दी वर्ष और लोकमत नागपुर संस्करण की स्वर्ण जयंती के अवसर पर आज नागपुर में गृह मंत्री अमित शाह और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले की उपस्थिति में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया है। इस अवसर पर लोकमत के पचास वर्षों की प्रगति पर प्रकाश डालते हुए और भविष्य के संकेत देता एक विशेष लेख।

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लोकमत के नागपुर संस्करण का पहला अंक 15 दिसंबर 1971 को प्रकाशित हुआ था। पहले अंक के एक विशेष लेख में अपनी भूमिका स्पष्ट करते हुए हमारे पिताश्री, मार्गदर्शक श्रद्धेय जवाहरलालजी दर्डा बाबूजी ने कवि विनायक की एक पंक्ति उद्धृत की थी:

‘पूर्व दिव्य ज्यांचे त्यांना रम्य भावि काळ,बोध हाच इतिहासाचा सदा सर्व काळ’!

इसके मायने यह हैं कि इतिहास साक्षी है कि जिनका भूतकाल दिव्य होता है, उनका भविष्य उज्जवल होता है।

लोकमत अपनी 50 साल की सफल और गौरवशाली यात्रा को पूर्ण करते हुए अपना स्वर्ण जयंती वर्ष मना रहा है। इस लंबी यात्रा में लोकमत बड़े संघर्षों से जूझते हुए वंचितों-उत्पीड़ित-शोषितों के पक्ष में मजबूती से खड़ा रहा। तयशुदा दायरे को तोड़ते हुए यह अखबार समुदायोन्मुख हो गया। लोकमत ने अनेक उतार-चढ़ावों से गुजरते हुए महाराष्ट्र भर में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई।लोकनायक बापूजी अणे ने 1918 में यवतमाल में साप्ताहिक लोकमत की शुरुआत की। लोकमत नाम लोकमान्य तिलक ने दिया था। बाद में जंगल सत्याग्रह में अंग्रेजों के दमन के कारण इस साप्ताहिक को बंद कर दिया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद महात्मा गांधी की ‘स्वराज्य’ अवधारणा को मानने वाले बाबूजी बंद पड़े साप्ताहिक को चलाने की अनुमति लेने बापूजी के पास गए। तब बापूजी ने कहा, ‘साप्ताहिक का वह अध्याय समाप्त हो चुका है।’ आप अनुमति क्यों मांग रहे हैं? यह आवश्यक नहीं। अनुमति नहीं, मैं शुभेच्छा अवश्य दूंगा।’

और 1 मई, 1953 को मध्य प्रदेश और वर्‌हाड के तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल द्वारा राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज की उपस्थिति में यवतमाल से साप्ताहिक लोकमत को फिर से शुरू किया गया था। 1960 में इसे द्वि-साप्ताहिक बनाया गया। हालांकि, नागपुर में राष्ट्रीय विचार का कोई समाचारपत्र न होने का बाबूजी को मलाल था। इसलिए उन्होंने नागपुर से लोकमत को दैनिक रूप में प्रकाशित करने का निश्चय किया। लोकमत का प्रकाशन 15 दिसंबर 1971 से नागपुर से प्रारंभ हुआ। नागपुर से लोकमत की शुरुआत एक नए युग का आरंभ था। यह लोकजागरण का बीजारोपण था। शायद किसी और को इस दुस्साहस का अनुमान नहीं था, लेकिन बाबूजी इससे अच्छी तरह वाकिफ थे।

अब स्वतंत्रता प्राप्ति का जयघोष थम चुका था। स्वतंत्र देश की चुनौतियां प्रमुख होती जा रही थीं। उस समय बाबूजी ने देश के हृदय अर्थात नागपुर से राष्ट्रीय विचारों का एक दैनिक प्रारंभ करने का विचार किया। उस समय मराठी समाचारपत्र मुंबई, पुणे जैसे महानगरों से निकलकर अन्य शहरों में वितरित हो रहे थे। लोकमत के प्रकाशन के रूप में यह प्रवाह विपरीत दिशा में हो रहा था।यह धारा के विरुद्ध तैरने की शुरुआत थी। लोकमत ने परंपरागत रास्ते पर चलने से परहेज किया। प्रतिकूल परिस्थितियों के विरुद्ध अनेक मोर्चों पर लड़ते हुए अपना रास्ता बनाया और यत्नपूर्वक उस पर आगे बढ़ते गया। संवाददाताओं और वितरकों की श्रृंखला बनाई गई। ज्ञान को एकाधिकार मानने वाले वर्ग के लोगों पर विचार करने की बजाय नवशिक्षित बहुजन वर्ग से संवाददाताओं का चयन किया गया। ग्रामीण पत्रकारों की एक नई पीढ़ी तैयार की गई। नए लेखक खोजे गए। उन्होंने अपने लेखन का केंद्र ग्रामीणों और ग्रामीण क्षेत्र को बनाया। स्थानीय बोली और भाषा को तरजीह दी जाने लगी। वितरण की नई व्यवस्था बनाई गई। तकनीक के मामले में लोकमत अग्रणी रहा। समाचारपत्र, जो शहरों में मुट्ठी भर अभिजात वर्ग की प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गए थे, अब गांवों तक पहुंचने लगे। खेत-खलिहानों की महक के साथ सूचनाओं और जानकारियों की गंगा भी प्रवाहित होने लगी।

उपेक्षित वर्ग की मदद के लिए लोकमत के प्रतिनिधि दौड़ पड़े। मालिक की लाठी से मजदूर की पीठ पर पड़े निशानों की तस्वीर अखबार में प्रकाशित हो सकती है, उस समय यह कल्पना भी करना कठिन था। यह हिम्मत लोकमत ने दिखाई। बाद में, महाराष्ट्र के सामाजिक इतिहास को बदलने वाले अधिकांश सामाजिक आंदोलनों का जन्म लोकमत चौक में हुआ। नागपुर के बाद लोकमत के विस्तार की स्वर्णिम मुहर न केवल संपूर्ण महाराष्ट्र बल्कि गोवा और आगे चलकर दिल्ली पर भी अंकित हुई।

लोकमत रचनात्मकता के मार्ग पर चलता रहा। श्रमिकों के साथ-साथ किसानों, महिलाओं, युवाओं और छात्रों को भी अपनी बात रखने का मौका दिया गया। लोकमत सखी मंच, कैंपस क्लब, बाल विकास मंच, लोकमत युवा मंच, संस्कार मोती जैसी विभिन्न गतिविधियां, कारगिल युद्ध, भूकंप, बाढ़ जैसी राष्ट्रीय आपदाओं के दौरान की गई पहल, सैनिकों की संतानों के लिए जमा की गई राशि से मेलघाट में छात्रावास, स्कूल निर्माण, कुपोषित लोगों के लिए राहत कोष, किसानों के लिए कृषि मेले, धान उगाने वालों के लिए सम्मेलन, संतरा उत्पादकों के लिए संतरा महोत्सव।।।और क्या-क्या बताया जाए!

लोकमत प्रबंधन ने अपने संपादकों को पूर्ण स्वतंत्रता दी थी। लोकमत हमेशा संपादकों और पत्रकारों के साथ खड़ा रहा। नागपुर में फ्रीडम ऑफ प्रेस की प्रतिमा उस संपादकीय स्वतंत्रता का ही एक दृश्यमान प्रतिनिधित्व है। लोकमत मराठी अखबारों में वर्षों से नंबर एक पर बना हुआ है। इस सम्मान का वास्तविक हकदार विक्रेता है। लोकमत ने उसकी प्रतिमा बनाकर मुख्यमंत्री की उपस्थिति में विक्रेताओं द्वारा ही उसका अनावरण कर अपना आभार व्यक्त किया।

लोकमत पर कांग्रेस का मुखपत्र होने का लगातार आरोप लगाया गया, लेकिन यह सच नहीं था। बाबूजी कांग्रेस के एक वफादार कार्यकर्ता के रूप में बार-बार कहते रहे कि वह चुनाव के दौरान उसी अनुरूप भूमिका निभाएंगे, लेकिन समाचारपत्र के रूप में लोकमत स्वतंत्र रहेगा। आज भी उसी सिद्धांत का पालन किया जाता है। लोकमत पर चौतरफा हमले हुए, लेकिन लोकमत के व्यापक रुख से ये आरोप स्वत: ही कुंद हो गए। मार्ग कंटकाकीर्ण था। अगली यात्रा इन्हीं कांटों की खरोंचों को महसूस करते, उनसे बचते-बचाते आगे बढ़ने वाली साबित हुई। समय के साथ चलते हुए तमाम झटकों को झेलते हुए जो परिपक्वता आती है, वही अगले सफर के लिए शक्ति देती है।

अब तक लोकमत अनेक तरह से समाज की जरूरत रहा है और समाज को लोकमत की जरूरत रही है। इसे पहचानते हुए हम हाथों में हाथ डालकर संकल्प के साथ कदम बढ़ा रहे हैं। इसी संकल्प के कारण हमें विश्वास है कि अगले पचास-सौ वर्ष भी लोकमत के ही होंगे।

आने वाले समय में लोगों के प्रश्नों, समस्याओं और पीड़ाओं की जटिलता अलग तरह की होगी और युवा पीढ़ी को उसके समाधान का विचार करना होगा। उसके लिए, इस मुकाम पर चि। देवेंद्र, चि। ऋषि और चि। करण के सहयोगियों की टीम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन एल्गोरिद्म जैसे टूल्स से लैस है। ऑनलाइन युग में निर्बाध सेवा प्रदान करते हुए लोकमत ने ई-पेपर सहित डिजिटल मीडिया के माध्यम से सात समंदर पार छलांग लगा दी है। 24 घंटे चलने वाला न्यूज चैनल ‘न्यूज 18 लोकमत’ भी अब इसमें जुड़ गया है। वैश्वीकरण में जिस प्रकार संसार भर में दु:ख समान हैं, उसी प्रकार आशाओं, आकांक्षाओं, स्वप्नों और सुखों के संदर्भ भी एक जैसे होंगे। नई पीढ़ी चाहे दुनिया के किसी भी कोने में पहुंच जाए, बोर्डरूम चर्चा के दौरान अपनी मिट्टी की महक चाहती है। इसी वैश्विक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए लोकमत को आगे बढ़ना है।

यह मल्टीमीडिया का युग है। हम नए मीडिया के आविष्कार, सोशल मीडिया के महत्व, मीडिया में क्रांति का अनुभव कर रहे हैं। यद्यपि अखबारों के लिए आगे का रास्ता चुनौतीपूर्ण है, लेकिन यह नए वैश्विक अवसरों के द्वार भी खोल रहा है। अब उन अवसरों का लाभ उठाने का समय आ गया है। भले ही आसपास की परिस्थितियों के संदर्भ बदल जाएं, परंतु पत्रकारिता के मूल्य, समाज की नब्ज पाठक हमेशा ही केंद्र में रहेगा। इस अवसर पर हम विश्वास दिलाते हैं कि मूल्यों से निपटने की चेतना वैसी ही बनी रहेगी। वास्तव में, गांव-गांव के सभी एजेंटों, विक्रेताओं, संवाददाताओं, पूर्व कर्मचारियों, विज्ञापनदाताओं, पाठकों, शुभचिंतकों के प्रति आभार शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। मैं पूरी विनम्रता से इस बात को मानता हूं कि इन्हीं लोगों के बल पर लोकमत विभिन्न कठिनाइयों से गुजरते हुए, अनेक ऊंचाइयों को छूते हुए महाराष्ट्र, गोवा और दिल्ली पर अपना अधिकार जमा सका। जनशक्ति के बल पर यह रथ दौड़ पड़ा है। अभी बहुत दूर जाना है। चरैवेति, चरैवेति !! यानी चलते रहो, चलते रहो! विश्वास, आत्मविश्वास और आपसी विश्वास के साथ!

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