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ब्लॉग: हरियाणा में चुनावी समीकरण बदलने की सुगबुगाहटें...आखिर क्या हैं मायने?

By राजकुमार सिंह | Updated: June 13, 2023 12:31 IST

पिछली बार 10 सीटें जीतनेवाली जजपा अगले चुनाव में ज्यादा सीटों पर दावा करना चाहेगी, जबकि भाजपा की कोशिश अपने दम पर बहुमत पाने की होगी.

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शांत नजर आ रही हरियाणा की राजनीति में फिर से लहरें उठ रही हैं. लहरें दोनों ओर हैं : सत्ता पक्ष में और विपक्ष में भी. सत्तारूढ़ भाजपा-जजपा गठबंधन में परस्पर कटाक्ष अब ज्यादा मुखर होने लगे हैं तो अचानक राज्य प्रभारी बदले जाने से कांग्रेस की राजनीति भी गरमा रही है. पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा बहुमत पाने से चूक गई थी. 90 सदस्यीय विधानसभा में उसे 40 सीटें मिली थीं, जबकि मुख्य विपक्षी कांग्रेस को 31. 

त्रिशंकु विधानसभा का बड़ा कारण नए राजनीतिक दल जजपा को माना गया, जिसने अप्रत्याशित रूप से 10 सीटें जीत कर अपने चुनाव चिन्ह चाबी को सत्ता की चाबी में तब्दील कर लिया. जाहिर है, सबसे बड़े दल के नाते भाजपा सत्ता में हिस्सेदारी के लिए लालायित निर्दलीयों के समर्थन से भी सरकार बना सकती थी, लेकिन स्थिरता का संदेश देने के लिए जजपा से गठबंधन को बेहतर विकल्प माना. 

कहा जो भी जाए, गठबंधन सत्ता में भागीदारी के लिए ही किए जाते हैं. इसलिए आश्चर्य नहीं कि जजपा नेता दुष्यंत चौटाला को मनोहर लाल सरकार में उपमुख्यमंत्री बनाते हुए भारी भरकम मंत्रालय भी दिए गए. शुरू में सब कुछ ठीक चला भी, लेकिन जनाधार के अंतर्विरोध और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से दोनों दलों के रिश्ते असहज होते गए. अब जबकि अगले चुनाव ज्यादा दूर नहीं हैं, दोनों ही दलों को अपनी रणनीति अभी से बनानी होगी. 

पिछली बार 10 सीटें जीतनेवाली जजपा अगले चुनाव में ज्यादा सीटों पर दावा करना चाहेगी, जबकि भाजपा की कोशिश अपने दम पर बहुमत पाने की होगी. जनाधार की भिन्नता और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के टकराव के मद्देनजर माना जाता रहा है कि अगले चुनाव से पूर्व टूट जाना ही इस गठबंधन की नियति है.  

उधर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की राजनीति फिर गर्माने के आसार हैं. संतुलन की कवायद करते-करते कांग्रेस आलाकमान ने साल भर से पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को हरियाणा में फ्री हैंड दे रखा है. वह स्वयं नेता प्रतिपक्ष हैं तो उन्हीं की पसंद उदयभान प्रदेश अध्यक्ष हैं. फिर भी इस बीच पर्याप्त मतों के बावजूद कांग्रेस का राज्यसभा उम्मीदवार हार गया, पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के पुत्र कुलदीप बिश्नोई भाजपा में चले गए, और प्रदेश संगठन है कि आज तक नहीं बन पाया. जिस गुट का भी प्रदेश अध्यक्ष होता है, वह चहेतों को भरना चाहता है, जिसका दूसरे गुट विरोध करते हैं. नतीजतन संगठन लटक जाता है.  

दिल्ली और पंजाब जीत चुकी आप भी हरियाणा में गंभीर चुनावी दांव लगाने की तैयारी में है. इनेलो के चश्मे की नजर किसे लगेगी और आप की झाड़ू किस पर चलेगी-यह देखना दिलचस्प होगा, और हरियाणा के भावी राजनीतिक परिदृश्य के लिए निर्णायक भी.

टॅग्स :हरियाणाकांग्रेसभारतीय जनता पार्टीभूपेंद्र सिंह हुड्डा
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