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सरकारी उदासीनता और ढहती विरासत

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: April 25, 2025 19:20 IST

लेकिन धरोहर को सरकारी संरक्षण की जरूरत है, उदासीनता की नहीं!

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अभिलाष खांडेकर

महंगे दामों में बिकने वाले एमएफ हुसैन, अनुभवी लेकिन प्रसिद्धि-विमुख एनएस बेंद्रे, डीजे जोशी, एमएस जोशी, रामचंद्र मुले व एलआर पेंढारकर के बीच क्या समानता है? ये सभी प्रसिद्ध इंदौर फाइन आर्ट्स स्कूल में दत्तात्रेय दामोदर देवलालीकर के छात्र थे. 1927-28 में होलकर महाराजा द्वारा स्थापित इस स्कूल ने भारत के कुछ बेहतरीन कलाकारों को जन्म दिया है. ऊपर बताए गए बड़े नाम 100 साल पहले इंदौर में फाइन आर्ट्स के छात्र थे.

डीडी देवलालीकर गुरु ने टैगोर द्वारा स्थापित प्रसिद्ध शांतिनिकेतन में कला की शिक्षा ली थी. उन्हें उस समय के सर्वश्रेष्ठ कला शिक्षकों में से एक माना जाता था. डीडी देवलालीकर खुद भी एक चित्रकार थे, बाद में उन्हें इंदौर के होलकर महाराजा ने कला विद्यालय शुरू करने के लिए आमंत्रित किया. कहने की आवश्यकता नहीं कि महाराजा होल्कर, जो श्रद्धेय अहिल्याबाई के वंशज थे, एक आधुनिक शासक थे, जिन्हें खेल और कला से प्रेम था तथा वैज्ञानिक शहरी विकास में उनकी गहरी रुचि थी.

गुरु देवलालीकर के अलावा, वे नागपुर से कर्नल सीके नायडू को भी लाए थे; नायडू ने 1932 में इंग्लैंड में पहले क्रिकेट टेस्ट में भारत का नेतृत्व किया. स्कॉटिश समाजशास्त्री और बहुश्रुत सर पैट्रिक गेडेस को भी महाराजा ने 1915-16 में इंदौर शहर को बेहतर ढंग से विकसित करने के लिए नियुक्त किया था. उनकी शहरी योजना पर आज भी वास्तुकारों, इतिहासकारों और योजनाकारों के बीच चर्चा होती है.

मुझे इंदौर ललित कला विद्यालय की याद तब आई जब मैंने हुसैन की एक पेंटिंग - जिसका शीर्षक था ‘ग्राम यात्रा’ - के बारे में पढ़ा, जो एक हालिया अंतर्राष्ट्रीय नीलामी में 118 करोड़ रुपए में बिकी थी. एक तरह से हुसैन भारत ‘वापस’ आ गए हैं, क्योंकि किरण नादर, एक अपेक्षाकृत नई कला संरक्षक, ने नई दिल्ली में अपने संग्रहालय के लिए उस कलाकृति को खरीदा है. 1954 में बनाई गई पेंटिंग को नॉर्वे के एक चिकित्सक ने खरीदा था, जो उस समय दिल्ली आए हुए थे. वैश्विक कला बाजारों में लगातार बढ़ती कीमतों के अलावा, नीलामी और चौंका देने वाली कीमत मुझे हुसैन के इंदौर के इतिहास में वापस ले गई.

आधुनिक कला इतिहासकार शायद ही कभी उनके इंदौरी संबंधों का जिक्र करते हैं, लेकिन इंदौर और उसके नागरिक विश्व प्रसिद्ध कलाकार के अपने ऐतिहासिक शहर से जुड़ाव पर गर्व करते हैं. हुसैन ने खुद एक बार मुझे इंदौर में एक खूबसूरत घर दिखाया था, जब वह अपनी लोकप्रियता के चरम पर थे. उन्होंने मुझे किस्सा सुनाया कि कैसे वह युवा कला छात्र के रूप में उस गेस्ट हाउस में जाते थे.

अतीत को याद करते हुए उन्होंने कहा... ‘चूंकि विश्व प्रसिद्ध मूर्तिकार कॉन्स्टेंटिन ब्रांकुसी (रोमानिया) इंदौर महाराजा के अतिथि के रूप में वहां रह रहे थे, इसलिए हम अध-खुले बड़े लोहे के दरवाजों से ब्रांकुसी की एक झलक पाने के लिए मर मिटते थे.’ यह 1994-95 का समय था जब हुसैन कुछ दिन इंदौर प्रवास पर थे. अब सुनिये इंदौर की कला विरासत और अक्षम्य सरकारी उदासीनता की दुःखद कहानी.

इंदौर फाइन आर्ट्स स्कूल को इसके साथ जुड़े विरासत मूल्य की परवाह किए बिना ध्वस्त कर दिया गया है. छात्र, कला प्रेमी और इतिहासकार सालों से इसके जीर्णोद्धार की मांग करते रहे लेकिन अधिकारियों ने इसे धीरे-धीरे खराब होने दिया और आखिरकार ढहा दिया गया. इमारत द्वारा खाली की गई जमीन कीमती है और आधिकारिक एजेंसियां इस पर ‘तुच्छ’ इमारतें बनाने के लिए नजर गड़ाए हुए हैं, जिनमें न तो जीवंतता होगी और न ही सुंदरता.

मध्य इंदौर में राजवाड़ा के आस-पास का पूरा इलाका, जहां आर्ट्स स्कूल के पास से पुरानी कान्ह नदी बहती थी, एक खूबसूरत जगह थी, जहां धरोहर इमारतें बिखरी हुई थीं. कान्ह अब ज्यादातर भारतीय नदियों की तरह एक नाले में तब्दील हो गई है!

सरकारें (जिनमें ‘शक्तिशाली’ अधिकारी भी शामिल हैं) जो भारत की विरासत के बारे में अंतहीन बातें करती हैं परंतु देवताओं और मंदिरों के नाम पर धार्मिक भावनाओं को भड़काती हैं, वे करदाताओं के पैसे से कई मंदिरों के आसपास ‘महाकाल-लोक’ जैसे बेहद महंगे परिसर बनाने में व्यस्त हैं. लेकिन उनमें इंदौर फाइन आर्ट्स स्कूल जैसी अन्य धरोहर इमारतों के लिए कोई समझ या सम्मान नहीं है.

भारत सरकार ने स्मार्ट सिटी मिशन के तहत 2015 में धरोहर शहरों के लिए हृदय (विरासत शहर विकास और संवर्धन योजना) नाम से एक नीति शुरू की थी. इसे अमरावती, द्वारका, मथुरा, वाराणसी आदि सहित 13 शहरों तक सीमित कर दिया गया. भारत में मंदिरों, मकबरों, मीनारों, महलों और वास्तुकला की दृष्टि से सुंदर आवासीय और सार्वजनिक इमारतों की विरासत भरी पड़ी है, जो सदियों से पर्यटकों को आकर्षित करती रही है. लेकिन धरोहर को सरकारी संरक्षण की जरूरत है, उदासीनता की नहीं!

अगर मध्य प्रदेश सरकार के अधिकारी वाकई विरासत और इतिहास के प्रति संवेदनशील होते, तो वे आसानी से इस कला विद्यालय की इमारत को बचा सकते थे, इसका जीर्णोद्धार कर सकते थे और इसे कला शिक्षण का बड़ा केंद्र बना सकते थे. इंदौर से और भी देवलालीकर और बेंद्रे पैदा हो सकते थे. छात्र और नागरिक अब पुरजोर मांग कर रहे हैं कि खाली जगह पर सिर्फ कला विद्यालय ही होना चाहिए, और कुछ नहीं. क्या वे गलत कह रहे हैं?

प्रतिष्ठित चित्रकारों हुसैन और तैयब मेहता- दोनों गुजर चुके है- की कलाकृतियों की ऊंची कीमतों पर नाज करने वाले कला समुदाय को विरासत भवनों और कला विद्यालयों को बचाने के लिए आगे आना चाहिए, आवाज उठानी चाहिए क्योंकि उन पर हर जगह हमला हो रहा है, उनका सतत नाश किया जा रहा है.

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