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भरत झुनझुनवाला का ब्लॉगः लंबे समय तक संकट से नहीं उबार सकते राहत पैकेज

By भरत झुनझुनवाला | Updated: April 19, 2020 06:39 IST

राहत पैकेज देने के लिए सरकार के पास रकम कहां से आएगी? लॉकडाउन की अवधि में व्यापार बंद होने से इनके द्वारा दी जाने वाली टैक्स की रकम शून्यप्राय हो गई है. सरकार के पास अपने वर्तमान खर्चो को जारी रखने के लिए भी रकम उपलब्ध नहीं है. सरकारी कर्मियों का वेतन दिया ही जा रहा है. इसलिए सरकार को अपने वर्तमान खर्च ही ऋण लेकर करने पड़ेंगे.

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वर्तमान संकट में छोटे और बड़े उद्योगों की परिस्थिति अलग-अलग है. छोटे व्यापारियों के लिए लॉकडाउन समाप्त होने के बाद अपने धंधे को पटरी पर लाना कठिन होगा क्योंकि इस अवधि में उन्होंने अपनी चालू पूंजी का उपयोग अपने परिवार के पालन-पोषण में कर लिया है. नया माल खरीदने के लिए अब उनके पास पूंजी उपलब्ध नहीं है. तुलना में बड़े उद्योगों की स्थिति अलग होती है. उनके पास नगद की बचत भी होती है और यदि आवश्यक हो जाए तो बैंक से ऋण भी वे आसानी से ले पाते हैं. उनके पास चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की फौज होती है जो कि बैंक के कागजात को पूरा कर सकें. इसलिए लॉकडाउन के समाप्त होने के बाद छोटे व्यापारियों को वापस पटरी पर लाना बड़ी चुनौती है. 

यहां हमें यह भूल नहीं करनी चाहिए कि केवल बड़े व्यापारियों को मदद करके हम अर्थव्यवस्था को संकट से निकालने का प्रयास करें. अर्थव्यवस्था में बड़े और छोटे का एक निर्धारित अनुपात होता है जैसे भोजन में घी और रोटी का उचित अनुपात होता है. यदि केवल घी परोस दिया जाए और साथ में रोटी न परोसी जाए तो भोजन अपाच्य हो जाता है. इसी प्रकार यदि केवल बड़े व्यापारियों को मदद की जाए और छोटे को डूबने दिया जाए तो अर्थव्यवस्था बिगड़ जाती है. कारण यह कि छोटे उद्योगों द्वारा ही ज्यादा रोजगार बनाए जाते हैं और इनके द्वारा दिए गए वेतन से बाजार में मांग ज्यादा उत्पन्न होती है.

दूसरी बात यह है कि राहत पैकेज देने के लिए सरकार के पास रकम कहां से आएगी? लॉकडाउन की अवधि में व्यापार बंद होने से इनके द्वारा दी जाने वाली टैक्स की रकम शून्यप्राय हो गई है. सरकार के पास अपने वर्तमान खर्चो को जारी रखने के लिए भी रकम उपलब्ध नहीं है. सरकारी कर्मियों का वेतन दिया ही जा रहा है. इसलिए सरकार को अपने वर्तमान खर्च ही ऋण लेकर करने पड़ेंगे. राहत पैकेज का पोषण करने के लिए और अधिक मात्ना में ऋण लेना अनिवार्य हो जाएगा. यह ऋण मुफ्त नहीं आता है. इस पर सरकार को जो ब्याज अदा करना पड़ेगा वह अंतत: जनता पर टैक्स लगा कर ही वसूल किया जाएगा. इस ऋण की अदायगी भी जनता से ही रकम वसूल करके की जाएगी. आज यदि हम स्टिम्युलस (राहत) पैकेज ले रहे हैं तो कल उसके भुगतान का खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा.

सरकार के सामने दो रास्ते उपलब्ध हैं. पहला यह है कि छोटे उद्यमों को टैक्स में छूट दे और जो खर्च बढ़ाए जाएं उनका उपयोग आम आदमी की क्र य शक्ति बढ़ाने में किया जाए. जैसे पेंशन की रकम वितरित करने से जनता के हाथ में क्रयशक्ति बढ़ती है. छोटे उद्यम पर टैक्स घटाना अथवा बढ़ाए गए खर्च का आम जनता के हाथ में वितरण करना दोनों का प्रभाव लगभग एक समान होता है. चूंकि छोटे उद्योगों से वेतन वितरित होते हैं और आम आदमी की क्रयशक्ति बढ़ती है.

सीधे देखा जाए तो प्रतीत होता है कि इस फार्मूले में बड़े उद्योग संकट में रह जाएंगे. जैसे कार बनाने के कारखाने को लॉकडाउन की इस अवधि में जो नुकसान हुआ है उससे वे नहीं उबर पाएंगे. अथवा उड्डयन कंपनियों को जो घाटा लगा है उसकी भरपाई नहीं होगी. छोटे व्यापारियों को टैक्स में छूट देने अथवा आम आदमी के हाथ में क्र यशक्ति देने से इन क्षेत्नों का संकट बना रहेगा. लेकिन कुछ ही समय में इन्हें भी राहत मिलेगी. 

छोटे व्यापारियों को टैक्स में छूट देने से उनका धंधा बढ़ेगा, उनके द्वारा रोजगार ज्यादा संख्या में सृजित किए जाएंगे, रोजगार बढ़ेंगे और बाजार में मांग बढ़ेगी जिसकी आपूर्ति बड़े उद्योग भी करेंगे. आम आदमी के हाथ सीधे वितरण से और छोटे उद्योगों के माध्यम से रोजगार सृजन से आम आदमी की क्र यशक्ति बढ़ेगी और उस क्रयशक्ति से आने वाले समय में कारें बिकेंगी और घरेलू उड्डयन भी वापस पटरी पर आ सकता है.

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