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महिलाओं का जीवन बदल रही हैं सहकारी समितियां 

By विवेक शुक्ला | Updated: July 5, 2025 07:11 IST

दरअसल देश के सहकारिता क्षेत्र में बदलाव की बयार बहने की शुरुआत नरेंद्र मोदी ने तब कर दी थी जब उन्होंने ग्रामीण विकास में सहकारिता के महत्व को समझते हुए इसके लिए एक अलग मंत्रालय बनाया.

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हाल ही में राजधानी के दिल्ली हाट में एक कश्मीरी महिला व्यवसायी खदीजा भट्ट बता रही थीं कि वे सारे भारत में कश्मीरी हस्तशिल्प और दूसरा सामान  बेचकर बेहतर जिंदगी गुजार रही हैं. यह इसलिए संभव हो रहा क्योंकि वे एक सहकारी संगठन के तहत काम करती हैं. भारत में सहकारिता आंदोलन से लाखों महिलाओं के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है.

यह आंदोलन, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता, सामाजिक सशक्तिकरण और आत्मविश्वास प्रदान कर रहा है. सहकारी समितियों के माध्यम से महिलाएं विभिन्न क्षेत्रों जैसे कृषि, दुग्ध उत्पादन, हस्तशिल्प, और सूक्ष्म वित्त में सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं. सहकारी समितियों ने महिलाओं को रोजगार के अवसर प्रदान किए हैं. उदाहरण के लिए, अमूल जैसी दुग्ध सहकारी समितियों में लाखों महिलाएं दूध उत्पादन और वितरण से जुड़ी हैं, जिससे उनकी आय में वृद्धि हुई है.

फिलहाल देश में 8 लाख से अधिक पंजीकृत सहकारी समितियां हैं, जिनसे लगभग 30 करोड़ लोग जुड़े हैं. 20 प्रतिशत कृषि ऋण, 35 प्रतिशत उर्वरक वितरण और 31 प्रतिशत चीनी उत्पादन अब सहकारी संगठनों द्वारा संभाला जाता है. इसके अलावा, डेयरी सहकारी समितियां भारत के सकल घरेलू उत्पाद  में 4.5% का योगदान देती हैं. अनुमान है कि 2030 तक सहकारी क्षेत्र 11 करोड़ से अधिक रोजगार के अवसर प्रदान करेगा, जिसमें प्रत्यक्ष और स्व-रोजगार दोनों शामिल हैं.  

पिछले एक दशक में सहकारी आंदोलन ने लंबी छलांग लगाई है, लेकिन कुछ चुनौतियां अभी भी बाकी हैं, जैसे भ्रष्टाचार, प्रबंधन की कमियां और कुछ क्षेत्रों में जागरूकता की कमी. सहकारिता मंत्री अमित शाह ने इन समस्याओं से निपटने के लिए सख्त कदम उठाए हैं, जैसे सहकारी समितियों में ऑडिट और जवाबदेही अनिवार्य करना. दरअसल देश के सहकारिता क्षेत्र में बदलाव की बयार बहने की शुरुआत नरेंद्र मोदी ने तब कर दी थी जब उन्होंने ग्रामीण विकास में सहकारिता के महत्व को समझते हुए इसके लिए एक अलग मंत्रालय बनाया.

फिर अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगी अमित शाह को इसका मंत्री नियुक्त किया. जानकार मानते हैं कि 2014 से पहले सहकारी संगठनों से लोग निराश थे. सहकारी समितियां भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुकी थीं. उनके कामकाज में पारदर्शिता की कमी थी, लेकिन इस मंत्रालय ने अब एक सुसंगत, आधुनिक और डाटा-आधारित सहकारी संगठन का मॉडल स्थापित किया है.

सहकारी संगठनों में बढ़ते जनविश्वास का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम से कर्ज वितरण पिछले तीन वर्षों में पांच गुना बढ़ गया है. इसने 2021 में  25,000 करोड़ रुपए के कर्ज वितरित किए थे, जबकि अब तक 1.28 लाख करोड़ रुपए स्वीकृत और वितरित किए जा चुके हैं.

यह जानना जरूरी है कि यदि ग्रामीण भारत का विकास करना है तो सहकारी आंदोलन को और मजबूत करना होगा. अच्छी बात यह है कि इस दिशा में देश में ठोस काम हो रहा है. हां, इस क्षेत्र में जो अब तक कमियां रही हैं उन्हें भी जड़ से खत्म करना ही होगा.  

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