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राज्य में मनभेद या फिर रंगभेद की राजनीति

By Amitabh Shrivastava | Updated: January 24, 2026 05:58 IST

एआईएमआईएम की सहर शेख हरे रंग की बात कर रही हैं तो दूसरी ओर भाजपा की नेता नवनीत राणा उन्हें जवाब देने के लिए मैदान में हैं, जो कहती हैं कि देश में केवल दो ही रंग चल सकते हैं- भगवा और नीला.

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ठळक मुद्देमानना है कि ऐसी बयानबाजी से धार्मिक भावनाएं भड़क सकती हैं.हाल के दिनों में रंगों को ही राजनीति का सहारा बनाया जाने लगा है.केसरिया, सफेद, हरा और केंद्र में एक नीले रंग का अशोक चक्र हैं.

मुंबई के मुंब्रा इलाके से नगरसेविका का चुनाव जीतने वाली ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) की सहर शेख इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चाओं में बनी हुई हैं. जिसकी वजह सिर्फ इतनी है कि उन्होंने कहा कि वह अगले पांच साल में पूरे मुंब्रा को हरे रंग में रंगना चाहती हैं. उनके चुनावी खुशी के इस बयान को इतना अधिक गंभीरता से लिया गया कि मामला पुलिस तक जा पहुंचा और भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) के पूर्व सांसद किरीट सोमैया ने शिकायत तक दर्ज कर दी. उनका मानना है कि ऐसी बयानबाजी से धार्मिक भावनाएं भड़क सकती हैं.

यद्यपि यह उसी दल के नेता की समस्या है, जिसने मनपा चुनाव के बाद जगह-जगह पोस्टर लगाकर अपनी जीत को भगवा की शान बताया है. उसने हर पल अपने आप को एक रंग के माध्यम से विभक्त किया और अपनी पहचान को बदलने नहीं दिया. देश में रंग विभाजन से राजनीति तय होने के दौर में किसी का रंग अच्छा और किसी का रंग बुरा कैसे साबित किया जा सकता है.

यहां तक कि जीत के बाद भी पहचान को लेकर सहारे की आवश्यकता पड़ने पर जीत के मतों को आम स्वीकार्यता का प्रतीक कैसे माना जा सकता है. सांस्कृतिक रूप से आंकलन करने पर भारतीय संस्कृति अनेक रंगों के सम्मिश्रण से अपनी अद्वितीय पहचान रखती है. त्यौहारों के रंग और रंगों के त्यौहार, दोनों ही भारत को दुनिया से अलग रखते हैं.

जिसका सीधा संबंध मनुष्य से अधिक प्रकृति से है और वह उसका आनंद लेता है. रंग वैमनस्य का कारण न बनते हुए एकजुटता का आधार हैं. राष्ट्रध्वज के रंगों से लेकर संस्थाओं और संगठनों के झंडे अपने-अपने रंग में संदेश देते हैं. किंतु हाल के दिनों में रंगों को ही राजनीति का सहारा बनाया जाने लगा है.

यदि एआईएमआईएम की सहर शेख हरे रंग की बात कर रही हैं तो दूसरी ओर भाजपा की नेता नवनीत राणा उन्हें जवाब देने के लिए मैदान में हैं, जो कहती हैं कि देश में केवल दो ही रंग चल सकते हैं- भगवा और नीला. यानी राजनीति के अखाड़े में तीसरा रंग मिला दिया गया है. इन सियासी रंगों से परे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे में तीन प्रमुख रंग केसरिया, सफेद, हरा और केंद्र में एक नीले रंग का अशोक चक्र हैं.

उसमें सबसे ऊपर केसरिया शक्ति/साहस, बीच में सफेद शांति/सत्य और सबसे नीचे हरा रंग उर्वरता/समृद्धि का प्रतीक है. सफेद पट्टी के बीच में 24 तीलियों वाला गहरा नीला अशोक चक्र धम्म चक्र और निरंतर प्रगति व न्याय का प्रतीक है. यानी राष्ट्रीय और भारतीय पृष्ठभूमि के साथ रंगों का महत्व देखने पर देश का झंडा हर रंग का महत्व सिद्ध कर देता है.

इसी प्रकार हिंदुओं में सांस्कृतिक रूप से लाल रंग सुहाग का प्रतीक माना जाता है. हरे रंग की चूड़ियां विवाह के समय पहनी जाती हैं. त्यौहारों पर देवी को अलग-अलग रंग के रूप में पूजा जाता है. कुल मिलाकर समूचे इंद्रधनुष के रंग मनुष्य के जीवन में अपना स्थान बनाए हुए दिखाई देते हैं. मगर उन्हें राजनीतिक पहचान देने का सिलसिला कुछ ही दिन से आरंभ हुआ है.

जिसमें जाति और धर्म की राजनीति करने वालों ने अलग दिशा दी है. हालांकि विवादों में घिरने के बाद सहर शेख ने स्पष्टीकरण देते हुए अपने बयान को राजनीतिक मंच से दिया गया बताया. उसे किसी धर्म-जाति से जोड़ने से बचने का प्रयास किया. किंतु उन्होंने जिस अंदाज में डींगें मारते हुए बयान दिया, उससे विवादों को जन्म मिलना स्वाभाविक था.

जब जीत की खुशियों के रंग अलग-अलग होंगे तो रंगों से मनभेद भी होंगे. किंतु राजनीति का स्तर क्या इतना संकीर्ण होगा? यह माना जा सकता है कि राजनीति में पहचान केवल समाजसेवा नहीं रह गई है. अब उसमें पार्टी को ‘ब्रांड’ की तरह बनाया जा रहा है. विज्ञापन, होर्डिंग, झंडे से लेकर कार्यालय और स्टेशनरी तक पहचान साबित करने के लिए अनेक प्रकार की विज्ञापन और मार्केटिंग एजेंसियों की सहायता ली जा रही है. जिसमें रंगों की पहचान को अलग महत्व मिल रहा है.

बीते विधानसभा चुनाव में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी(अजित पवार गुट) ने गुलाबी रंग का सहारा लिया, जिसमें नेताओं के वस्र तक बदल गए. यही स्थिति उसकी मनपा चुनाव में भी रही. बावजूद इसके रंगों को आपसी संघर्ष का आधार नहीं बनाया गया. किंतु अब खुशी और गम को रंगों से जोड़ना सामाजिक रिश्तों को तंग कर रहा है.

फिलहाल यह समझना आवश्यक है कि जब रंगों का आधार प्राकृतिक है तो उन्हें जाति धर्म के आधार पर कैसे बांटा जा सकता है. उनका बंटवारा इंसान की निजी पसंद पर निर्भर है. फिर चुनावी परिणामों से राजनीति की रोटियां रंगों से कैसे सेंकी जा सकती हैं? संभव है कि किसी स्थान पर अप्रत्याशित सफलता मिली हो,

लेकिन उसे किसी एक रंग में कैसे बांधा जा सकता है. यह सीमित सोच है और उससे बाहर निकालना होगा. यह एआईएमआईएम और भाजपा के बीच मुकाबले का आधार नहीं है. इससे लोगों को भड़काया नहीं जा सकता है. मंचों से धार्मिक नारे लगाना और रंगों में इंसान को बांटना किसी भी राजनीतिक दल से अपेक्षित नहीं है. धर्मनिरपेक्ष समाजवादी गणराज्य में रंगभेद की नीति से सत्ता का मार्ग प्रशस्त नहीं किया जा सकता है. मूल्य आधारित राजनीति में सिद्धांतों को महत्व देकर ही मजबूत संरचना तैयार की जा सकती है.

यह बात मुंब्रा में ध्यान रखी जानी चाहिए और भगवा देश की संकल्पना का दिवास्वप्न देखने वालों को भी समझ में आनी चाहिए. जिस राष्ट्र की हजारों साल पुरानी संस्कृति और सभ्यता हो, वहां सिर्फ राजनीति के लिए रंगभेद से मनभेद पैदा नहीं किया जाना चाहिए.

टॅग्स :महाराष्ट्रबृहन्मुंबई महानगरपालिकाअसदुद्दीन ओवैसीऑल इंडिया मजलिस -ए -इत्तेहादुल मुस्लिमीन
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