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अभय कुमार दुबे का ब्लॉग: अंग्रेजी जारी रहेगी या भारतीय भाषाएं स्थान लेंगी?

By अभय कुमार दुबे | Updated: September 8, 2021 10:42 IST

चौदह इंजीनियरिंग कॉलेजों ने पांच भारतीय भाषाओं में तकनीकी शिक्षा के कोर्स जारी किए हैं, लेकिन इन पाठ्यक्रमों को पढ़ाने के लिए अध्ययन-सामग्री उपलब्ध नहीं है.

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उन्नीसवीं सदी से ही भारत में ज्ञान-विज्ञान के लेखन पर अंग्रेजी का वर्चस्व रहा है. अंग्रेजों के जमाने में और फिर आजाद भारत में ज्ञान-विज्ञान के लेखन को मूलत: भारतीय भाषाओं में प्रोत्साहन देने और इसी को प्राथमिकता बनाने की कोशिश ही नहीं हुई. 

समझा गया कि यह काम अंग्रेजी में कर लिया जाएगा, और फिर जहां मजबूरी होगी वहां अंग्रेजी से भारतीय भाषाओं में कुछ अनुवाद कर लिया जाएगा. किसी भारतीय भाषा में ज्ञान-विज्ञान का मूल-लेखन होना आज तक भारत में आश्चर्य का विषय है. 

इस बात को इस तरह से भी कहा जा सकता है कि भारत में उच्च-शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है. अगर शुरू से इस माध्यम में भारतीय भाषाएं प्रयुक्त की जातीं, तो अभी तक हर भाषा में उसके अपने सांस्कृतिक लहजे और जमीन से जुड़े हुए अनुभवों के मुताबिक शब्दावली तैयार हो गई होती. 

संस्कृत या फारसी से शब्दावली ली जाती, कहीं-कहीं अंग्रेजी के शब्द भी रहते,  पर जो गद्य निकल कर आता, वह उस भाषा का अपना गद्य होता. भारतीय भाषाएं ज्ञान-विज्ञान के लिए अंग्रेजी से अनुवाद पर निर्भर न होतीं. 

इसका मतलब यह नहीं है कि अनुवाद की उपेक्षा कर दी जानी चाहिए. लेकिन कोई भाषा किसी भी क्षेत्र में केवल अनुवाद की मोहताज नहीं हो सकती. अनुवाद केवल सहयोगी भूमिका निभा सकता है. भाषा अपना बुनियादी किरदार तो मूल लेखन से ही बनाती है.

अभी इसी हफ्ते हिंदी में लिखे गए अकादमिक लेखों के पंजाबी में अनुवाद की समस्याओं पर मैं अपने एक ऐसे मित्र से विचार कर रहा था जो हिंदी, पंजाबी और अंग्रेजी के साथ-साथ समाज-विज्ञान में भी कुशल है. चर्चा इस बात पर थी कि हिंदी और पंजाबी दोनों भारतीय भाषाएं हैं, एक ही परिवार की और सहोदर हैं, दोनों की वाक्य रचना एक सी है, दोनों की शब्दावली का कम से कम एक हिस्सा समान है. 

ऐसे में हिंदी से पंजाबी में अनुवाद आसान होना चाहिए. लेकिन ऐसा क्यों है कि जब पंजाबी में अनुवाद किया गया लेख सामने आता है तो लगता है कि उसमें संस्कृतनिष्ठ शब्दावली और हिंदी की बहुतायत है. कहीं-कहीं तो केवल क्रियाएं ही पंजाबी की हैं और लिपि गुरमुखी की है- वरना बाकी कुछ भी पंजाबी का नहीं लग रहा है. 

जब संस्कृतनिष्ठता से बचने की कोशिश की जाती है, उसके विकल्प  के रूप में फारसीकरण कर दिया जाता है. ऐसे अनुवाद को पढ़कर  पाठक को लगेगा कि क्यों न इसे मूल हिंदी में ही पढ़ लिया जाए. चर्चा खत्म इस अफसोस के साथ हुई कि पंजाबी में समाज-विज्ञान के लेखक और अनुवादक ज्ञान-विज्ञान की शब्दावली का पंजाबीकरण करने के लिए जरूरी मेहनत नहीं कर रहे हैं और न ही वैसी सृजनशीलता दिखा रहे हैं जो दिखानी चाहिए.

मुझसे कई बार पूछा जा चुका है कि भारत को अंग्रेजी के इस वर्चस्व से मुक्ति कैसे मिलेगी? हर बार मैं यही कहता हूं कि जिस दिन देश का प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से सिर्फ एक वाक्य बोलेगा कि आज के बाद से हर क्षेत्र में उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी नहीं रहेगी-उसी दिन अंग्रेजी का दबदबा खत्म हो जाएगा. लोग अंग्रेजी बोलते-लिखते-पढ़ते रहेंगे. 

उसके लिए एक कोना सुरक्षित रहेगा, जिसका आकार फ्रेंच और जर्मन जैसी यूरोपीय भाषाओं के मुकाबले बड़ा होगा. अंग्रेजी के साथ हमारा लेन-देन जारी रहेगा, लेकिन ज्ञान-विज्ञान के अध्ययन और निर्माण के लिए उसकी अनिवार्यता खत्म हो जाएगी. यह अलग बात है कि ऐसा ऐतिहासिक वाक्य बोलने से  पहले प्रधानमंत्री को एक बेहद विराट योजनाबद्ध तैयारी करनी होगी. एक  पूरा का  पूरा समांतर बंदोबस्त खड़ा करना होगा.  

पाठ्यक्रम भारतीय भाषाओं में तैयार कर लिए जाएंगे, अनुवाद के जरिये बहुत सी सामग्री उपलब्ध हो चुकी होगी, भारतीय भाषाओं में पढ़ाने वाले अध्यापकों की कतार खड़ी हो चुकेगी.

इस पंद्रह अगस्त पर प्रधानमंत्री ने लाल किले से भारतीय भाषाओं में शिक्षा देने की आवश्यकता रेखांकित की और इस तरह उस ऐतिहासिक वाक्य को बोलने की पूर्वपीठिका तैयार कर दी. पूछा जा सकता है कि  क्या उनकी सरकार उस विराट योजना पर काम कर रही है जिसके बिना ऐसी कोई भी घोषणा बेमतलब रहने वाली है? प्रधानमंत्री ने जो बोला, वह बात नई शिक्षा नीति में पहले से लिखी हुई है. लेकिन यह नीतिगत दस्तावेज ऐसी कोई  पूर्व-योजना पेश नहीं करता. 

यह दस्तावेज ऐसे किसी भविष्य की तस्वीर नहीं खींचता जो भारतीय भाषाओं में ज्ञान-विज्ञान के अध्ययन-अध्यापन का नजारा दिखाता हो. न तो शिक्षा नीति और न ही प्रधानमंत्री के वक्तव्य से भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) के कानों  पर किसी तरह की जूं रेंगी है. 

चौदह इंजीनियरिंग कॉलेजों ने पांच भारतीय भाषाओं में तकनीकी शिक्षा के कोर्स जारी किए हैं, लेकिन इन पाठ्यक्रमों को पढ़ाने के लिए अध्ययन-सामग्री उपलब्ध नहीं है. कृत्रिम बुद्धि के जरिये पुस्तकों, अकादमीय पत्रिकाओं और वीडियो वगैरह के अनुवाद हेतु कुछ उपकरण तैयार अवश्य किए गए हैं लेकिन इन अनुवादों की गुणवत्ता की गारंटी करने का कोई इंतजाम नहीं दिख रहा है.  स्थानीय भाषाओं में पढ़ा सकने वाले अच्छे अध्यापकों का बेहद अभाव है और ऐसे शिक्षक तैयार करने का कोई कार्यक्रम नहीं बनाया गया है.

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