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भरत झुनझुनवाला का ब्लॉग: बाजार में मांग बढ़ाकर ही उद्योगों को जीवनदान मिल सकता है

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: May 5, 2020 14:49 IST

अर्थव्यवस्था पर कुछ संकट पहले से थे और अब कोरोना वायरस के कारण हुए लॉकडाउन ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है. ऐसे में सरकार के सामने उद्योगों को एक बार फिर पटरी पर लाने की चुनौती है. पढ़ें भरत झुनझुनवाला का ब्लॉग...

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अर्थव्यवस्था का चक्र  उत्पादन से प्रारंभ होता है. उत्पादन की प्रक्रिया में श्रमिक को वेतन मिलता है. वेतन से वह बाजार में कपड़े आदि खरीदता है जिससे बाजार में माल की मांग बनती है. इस मांग की आपूर्ति करने के लिए पुन: उद्यमी निवेश और उत्पादन करता है.

उत्पादन का यह सुचक्र दो स्थानों पर टूट सकता है. पहला यह कि उत्पादन यदि बड़े उद्योगों और रोबोटों से किया गया तो उस उत्पादन में वेतन कम ही दिया जाता है. तदनुसार बाजार में कपड़े आदि की मांग कम बनती है. और यदि वेतन बांटे भी गए और बाजार में मांग भी बढ़ी तो भी उस मांग की आपूर्ति यदि आयातित माल से हुई तो अपने देश में पुन: निवेश और उत्पादन का सुचक्र स्थापित नहीं होगा. जैसे आपने एक फैक्टरी लगाई, फैक्टरी में वेतन बांटा, उस वेतन से श्रमिक ने चीन का कपड़ा खरीदा तो दोबारा निवेश और उत्पादन चीन में होगा न कि भारत में.

वर्तमान संकट में बड़े उद्योगों की मांग है कि उन्हें टैक्स में छूट दी जाए. मेरा मानना है कि इसके ठीक विपरीत बड़े उद्योगों को उबारने के लिए उन पर ही टैक्स को बढ़ाना पड़ेगा. कारण यह कि अर्थव्यवस्था में बड़े और छोटे उद्योग दोनों तभी पनपेंगे जब हमारे घरेलू बाजार में मांग उत्पन्न होगी. इस मांग को उत्पन्न करने के तीन स्रोत हो सकते हैं. पहला स्रोत यह कि यदि हम बड़े उद्योगों जैसे बड़ी कपड़ा मिल पर टैक्स लगा दें तो पॉवरलूम का कपड़ा बिकेगा और पॉवरलूम चलाने वाले छोटे उद्यमी द्वारा वेतन बांटा जाएगा, जिससे बाजार में मांग बनेगी. दूसरा यह कि चीन आदि में बड़े उद्योगों द्वारा बनाए गए सस्ते माल पर आयात कर बढ़ा दें. 

यदि ऐसा किया गया तो विदेशी बड़े उद्योगों का माल महंगा हो जाएगा और पुन: अपने देश के छोटे उद्योग उत्पादन में आ जाएंगे और उनके द्वारा वेतन अधिक दिया जाएगा. तीसरा स्रोत यह हो सकता है कि देश के हर नागरिक को एक रकम सीधे प्रति माह उसके खाते में हस्तांतरित कर दी जाए. इससे देश के नागरिकों की क्रय शक्ति बढ़ेगी, वे बाजार में माल खरीदेंगे और उस माल की आपूर्ति करने के लिए उद्यमी निवेश करेगा.

मान लीजिए सरकार के पास इस संकट से उबरने के लिए एक लाख करोड़ रु. की रकम है. यदि इस एक लाख करोड़ को बड़े उद्योगों को टैक्स में छूट के लिए दिया गया तो निश्चित रूप से वे कुछ उत्पादन बढ़ाएंगे. लेकिन वह बढ़ा हुआ उत्पादन एक चक्र  के बाद पुन: ठप हो जाएगा क्योंकि बड़े उद्योगों द्वारा रोबोट से बनाई गई कार को खरीदने के लिए बाजार में मांग उत्पन्न नहीं होगी. इसके विपरीत यदि उस एक लाख करोड़ रुपए को आम आदमी के लिए युनिवर्सल बेसिक इनकम के रूप में उसके खाते में डाल दिया जाए तो उस रकम से बाजार में मांग बनेगी जिस मांग की आपूर्ति के लिए छोटे उद्योग कपड़ा बनाएंगे और बड़े उद्योग बाइक बनाएंगे. दोनों का काम चल निकलेगा. 

इसलिए बड़े उद्योगों को उबारने के लिए उन पर टैक्स लगाना होगा. उन पर टैक्स लगाने से छोटे उद्योग पनपेंगे और उनके द्वारा बढ़ाई गई मांग से बड़े उद्योगों का भी माल बिकेगा. कुछ आयुर्वेदिक वैद्य बताते हैं कि यदि किसी रोगी को भूख न लग रही हो तो उसे कुछ समय के लिए धीरे-धीरे भोजन और कम देते हैं. इसके बाद भूख स्वत: बढ़ जाती है. इसी प्रकार बड़े उद्योगों पर टैक्स का भार बढ़ाएंगे तब उनकी स्थिति सुधरेगी.

सरकार के पास इस समय एक और स्वर्णिम अवसर विश्व अर्थव्यवस्था में गिरते हुए तेल के दाम का है. वर्तमान में केंद्र सरकार द्वारा तेल पर लगाए गए टैक्स से लगभग चार लाख करोड़ रु. प्रति वर्ष अर्जित किया जा रहा है. यदि सरकार द्वारा आरोपित टैक्स को वर्तमान के लगभग 23 रुपए प्रति लीटर से बढ़ा कर 100 रुपए प्रति लीटर यानी चार गुना कर दिया जाए तो बाजार में पेट्रोल का दाम वर्तमान में 75 रुपए से बढ़कर 150 रुपए हो जाएगा. 

सरकार को 12 लाख करोड़ रुपए प्रति वर्ष अतिरिक्त आय तेल से अर्जित हो जाएगी. मान लें कि तेल की कुछ खपत कम होगी तो भी 9 लाख करोड़ रुपए सरकार की आय होगी ऐसा माना जा सकता है. अपने देश में 30 करोड़ परिवार हैं. यदि सरकार को 9 लाख करोड़ की अतिरिक्त आय तेल से होती है तो हर परिवार को 30 हजार रुपए प्रति वर्ष या 2500 रुपए प्रति माह दिया जा सकता है.

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