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राजेश बादल का ब्लॉग: यौन हिंसा रोकने वाले संकल्प का क्या हुआ?

By राजेश बादल | Updated: October 7, 2020 11:49 IST

निर्भया के बाद रांची, हैदराबाद, लखीमपुर और फिर हाथरस कांड ने हमारे सामाजिक और सियासी ढांचे को हिलाकर रख दिया है. हाथरस कांड ने कुछ सवाल भारतीय बिरादरी के सामने रखे हैं. इनमें सबसे खास तो यह है कि हमारी प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था कमजोर वर्गो के लिए कितनी संवेदनशील है.

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कुछ बरस पहले निर्भया-दुष्कर्म मामले के बाद सारे हिंदुस्तान ने जिस तरह अपराधियों को लेकर गुस्सा दिखाया था, उससे एकबारगी लगा था कि अब यह देश ऐसे जघन्य अपराधों को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं है. यकीनन उस प्रकरण में दरिंदों को कठोर दंड मिला, मगर उससे समाज ने सबक नहीं सीखा और न ही अपराधियों में कठोर दंड के प्रति कोई डर नजर आया. साल-दर-साल इस तरह की लोमहर्षक वारदातें होती रहीं और अपराधी बेखौफअपनी हैवानियत को अंजाम देते रहे. निर्भया के बाद रांची, हैदराबाद, लखीमपुर और फिर हाथरस कांड ने हमारे सामाजिक और सियासी ढांचे को हिलाकर रख दिया है. हाथरस कांड ने कुछ सवाल भारतीय बिरादरी के सामने रखे हैं. इनमें सबसे खास तो यह है कि हमारी प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था कमजोर वर्गो के लिए कितनी संवेदनशील है. अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति की सहायता के लिए अब खुलकर सामने आने में भी समाज सकुचाता है.

यह तो चंद उदाहरण हैं. भारत के पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण- सभी तरफ से इस तरह के आंकड़े भयावह, विकराल और डरावने आकार में सामने आते रहे हैं. कभी कोई वीभत्स प्रकरण प्रचार माध्यमों के जरिये पन्नों और परदों पर शीर्षक बटोरता है तो ठहरे समंदर में थोड़ी देर हलचल होती है. शांत होते ही फिर वही पाशविक सिलसिला शुरू हो जाता है. होड़ के चलते प्रचार माध्यम ऐसे मामलों में सारी सीमाएं पार कर जाते हैं. अन्यथा एक दौर ऐसा भी था, जब इस तरह के अपराध समाचारपत्नों के पृष्ठों पर बहुत बड़ी जगह नहीं घेरते थे. पर आजकल स्थिति इसके एकदम उलट है. 

साल-डेढ़ साल पहले थॉमसन-रॉयटर्स फाउंडेशन ने अपने एक सर्वेक्षण में पाया था कि भारत में महिलाओं के साथ अमानुषिक यातनाओं का सिलसिला तेजी से बढ़ा है. यह सर्वेक्षण संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में निर्विवाद और निष्पक्ष 548 विशेषज्ञों को साथ लेकर किया गया था. सर्वेक्षण के आंकड़े भारत को पहले नंबर पर ले जाते हैं. सात साल पहले किए गए ऐसे ही सर्वेक्षण में हिंदुस्तान चौथे स्थान पर और अफगानिस्तान सबसे ऊपर था. इसमें यौन हिंसा, मानव तस्करी और सांस्कृतिक परंपराओं के नजरिये से बेहद खराब पांच मुल्कों को छांटा गया था. उसके बाद उन पांच में से भी सर्वाधिक खराब देश को निकाला गया. इसमें विशेषज्ञों ने भारत को पहला क्र म दिया था. यह बात अलग है कि भारत ने इस सर्वेक्षण से अपनी असहमति जताई थी, लेकिन सरकारी आंकड़ों को कौन गलत ठहराएगा?

पूरे पच्चीस बरस हो गए. बीजिंग में 189 देशों ने सितंबर 1995 में चौथे विश्व महिला सम्मेलन के दरम्यान एक बड़ा संकल्प लिया था. संयुक्त राष्ट्र के बैनर तले हुए इस जमावड़े में समूचे विश्व में महिलाओं पर अत्याचार रोकने के लिए घोषणापत्न जारी किया गया था. घोषणापत्न पर हस्ताक्षर करने वाले देशों में भारत भी एक था. इसमें नई सदी से पहले यानी सन 2000 तक महिलाओं के विरुद्ध हिंसा पूरी तरह रोकने की सामूहिक प्रतिज्ञा की गई थी.

इस संकल्प में संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव बुतरस घाली ने सभी सदस्य राष्ट्रों की ओर से इसे एक चुनौती के रूप में लिया था. उन्होंने कहा था, ‘‘मैं उन सभी सरकारों से भी इस मामले में सहयोग मांगता हूं, जिन्होंने अब तक संयुक्त राष्ट्र के मानव अधिकार समझौतों और दस्तावेजों को अपना समर्थन नहीं दिया है. इस साल संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की पचासवीं वर्षगांठ मनाई जा रही है. इस साल महिलाओं के साथ यौन हिंसा जैसे अपराध सख्ती से रोकने के उपाय करने ही होंगे.’’ 

अफसोस है कि इस पवित्न संकल्प का सिल्वर जुबली साल आते-आते उसकी धज्जियां उड़ा दी गई हैं. भारत ही नहीं, अपितु अखिल विश्व में हम आज स्त्रियों के प्रति क्रूरता और अत्याचार बर्बरता की हद तक बढ़ते देख रहे हैं. कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि आधुनिक और सभ्य होता हमारा समाज मानसिक तौर पर आदम युग में लौट रहा है. दुष्कर्म के बाद पीड़िता को जिंदा रहने के लायक भी नहीं छोड़ा जाना एक नया आपराधिक चलन सामने आया है. खेदजनक तो यह है कि जाति और उप जातियों में बंटा समाज अब अपनी जाति के अपराधियों को धड़ल्ले से संरक्षण देता है. इस तरह वर्ग-संघर्ष की एक नई आशंका खड़ी हो रही है, जिसका कोई नैतिक आधार नहीं है.

वर्ग संघर्ष की आशंका इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि सियासी जमातें भी दलगत आधार पर व्यवहार करती हैं. हाथरस कांड के बाद एक निर्वाचित विधायक का बेतुका बयान आया कि माता-पिता अपनी बेटियों को संस्कार और मर्यादा सिखाएं. क्रूर और अमानवीय वारदातों में भी सियासी धाराएं अलग-अलग हो जाती हैं- यह मौजूदा दौर का सबसे घृणित और शर्मनाक रूप है. सत्तारूढ़ दल के सदस्य हुकूमत के बचाव में बेहूदे ढंग से अपना पक्ष रखते हैं. इससे समाज में उनकी स्थिति बिगड़ती ही है. उसे कौन स्वीकार करेगा ? मानवीय मूल्य राजनीति से कहीं ऊपर होते हैं. इसे मुल्क के नियंताओं को समझने की आवश्यकता है.

 

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