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राजेश बादल का ब्लॉगः मौलिक अधिकारों पर दो बड़े देश आमने-सामने  

By राजेश बादल | Updated: December 10, 2019 10:16 IST

अमेरिका ने पहली बार इतना सख्त रवैया अख्तियार किया है. अमेरिकी संसद के निचले सदन में उइगर मुसलमानों के हक में विधेयक पारित होने के बाद चीन भड़का हुआ है. उसका कहना है कि यह चीन के अंदरूनी मामलों में दखलंदाजी है.

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अमेरिका और चीन एक बार फिर नए मुद्दे पर आमने-सामने हैं. इस बार का मसला गंभीर है क्योंकि यह चीन में एक करोड़ मुस्लिमों की सामूहिक नजरबंदी से जुड़ा हुआ है. विश्व इतिहास में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता, जब इतनी बड़ी आबादी के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और अन्य मौलिक अधिकारों को दफना दिया गया हो. शिनजियांग के मुस्लिमों पर अमानवीय अत्याचार पर सारी दुनिया एक तरह से खामोश है. 

अमेरिका ने पहली बार इतना सख्त रवैया अख्तियार किया है. अमेरिकी संसद के निचले सदन में उइगर मुसलमानों के हक में विधेयक पारित होने के बाद चीन भड़का हुआ है. उसका कहना है कि यह चीन के अंदरूनी मामलों में दखलंदाजी है. दरअसल अमेरिकी विधेयक चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के इस व्यवहार की निंदा करता है. यह मानवीय अत्याचारों को संरक्षण देने वालों पर कड़ी पाबंदियां लगाने का अधिकार देता है. 

अमेरिका ने करीब 30 चीनी कंपनियों पर पहले ही पाबंदी लगा दी थी. इसके बाद चीनी अफसरों को वीजा नहीं देने का ऐलान किया था. इतना ही नहीं, चीनी राजनयिकों को निर्देश दिया गया था कि किसी अधिकारी से मिलने के लिए, किसी शोध संस्थान अथवा किसी शैक्षणिक संस्थान में जाने के लिए उन्हें पूर्व अनुमति लेनी होगी और विदेश मंत्नालय को भी सूचित करना होगा. चीन ने भी जवाबी कार्रवाई की. उसने अमेरिकी दूतावास को निर्देश दिए कि चीनी विदेश मंत्नालय की अनुमति के बिना उनके अफसर किसी भी अधिकारी से नहीं मिलेंगे और इसकी इत्तला उन्हें कम से कम पांच दिन पहले देनी होगी. चीन ने अमेरिका को यह चेतावनी भी दी कि वह समय रहते अपनी गलती सुधार ले तो बेहतर होगा अन्यथा परिणाम का सामना करने के लिए तैयार रहे.      गौरतलब है कि शिनजियांग के मुस्लिमों को निर्देश दिया गया है कि वे कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों के मुताबिक अपने धर्म में बदलाव करें. करीब दो बरस पहले शिनजियांग यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष प्रोफेसर ताशपोलत तियिक को चीनी पुलिस ने अपनी हिरासत में लिया था. तब से उनकी कोई खबर नहीं है. आशंका है कि उन्हें मार डाला गया है. पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही इशारा करती है. इस पर भरोसा करें तो निष्कर्ष यह है कि चीन के अल्पसंख्यक अब तक के सबसे बड़े खतरे का सामना कर रहे हैं. वहां का यूनाइटेड फ्रंट वर्क डिपार्टमेंट शी जिनपिंग की 2015 की नीति के मुताबिक काम कर रहा है. इसके तहत मुसलमानों, बौद्ध और ईसाइयों को कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियां अपनाना जरूरी है. 

बीते दिनों इस्लामिक एसोसिएशन की वेबसाइट पर एक ड्राफ्ट जारी हुआ था. इससे चीनी मुसलमान बेहद गुस्से में हैं. पश्चिमी प्रांत शिनजियांग के एक खुफिया शिविर में लाखों मुस्लिम कैद करके रखे गए हैं. हजारों लोग दाढ़ी या हिजाब के कारण हिरासत में हैं. यह तथ्य संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट में उजागर हुआ है. चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स में सरकार के चहेते मुस्लिम नेताओं ने अपनी कौम के सदस्यों से अपील की थी कि वे अपने धर्म का चीनीकरण करने में सहयोग दें. 

इस्लाम में मार्क्‍सवादी विचारधारा को शामिल करें, मस्जिदों में चीनी झंडा लगाएं वगैरह-वगैरह. संगठन की रिपोर्ट में भी इसे स्वीकार किया गया था. बीते दिनों निगङिाया प्रांत की मस्जिद को गिराने गए चीनी अफसरों को भारी विरोध सहना पड़ा था. मुस्लिम समुदाय ने मस्जिद घेर ली. अधिकारियों को वापस लौटना पड़ा. बताया गया कि मस्जिद के गुंबद सारी दुनिया की मस्जिदों की तरह के आकार के थे. जबकि चीन के नियमों के मुताबिक कम्युनिस्ट पार्टी के घोषित डिजाइन पर ही मस्जिद बन सकती है.

वैसे चीन का यह तर्क मासूम सा लगता है कि अन्य देश उसके अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप न करें. वह भारत के कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने को भारत का आंतरिक मामला नहीं मानता. वह म्यांमार के रोहिंग्या मसले में भी दखल देता है. अफगानिस्तान में तालिबान के साथ गलबहियां डालकर उन्हें समझौते की मेज पर लाने के प्रयास करता है. पाकिस्तान में विरोध के बावजूद अपने बैंक खोलता है, अपनी भाषा मंदारिन सीखने के लिए लोगों को बाध्य करता है.

नेपाल में भी मंदारिन के लिए माहौल बनाया गया और उइगर मुसलमानों के मसले में नाक पर मक्खी भी नहीं बैठने देता. उसकी नीति का यह विरोधाभास अजीब है. पाकिस्तान भी इस मामले में चीनी पिछलग्गू है. वह अनेक देशों के मुस्लिमों की हालत पर आंसू बहाता है, लेकिन चीनी मुसलमानों की दुर्दशा पर उसकी घिग्घी बंध जाती है. एक तरफ चीन का सरकारी चैनल अपनी फिल्म में कहता है कि वह खुद ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट और मुस्लिम आतंकवाद का शिकार है तो दूसरी तरफ कश्मीर में आतंकवाद का विरोध नहीं करता. 

अनेक सरकारी गोपनीय रिपोर्टे सबूत हैं कि भारत में नक्सली हिंसा के पीछे भी उसका हाथ है. ऐसे में अपने आंतरिक मामलों में दखल नहीं देने का तर्क गले से नहीं उतरता, जबकि मामला एक करोड़ अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों का हो. बांग्लादेश आखिर किस आधार पर बना था? करोड़ों लोगों से उनके मौलिक अधिकार छीन लिए गए थे और तब भारत समेत अनेक देशों को उनके लिए लड़ाई लड़नी पड़ी थी. क्या दुनिया की सबसे बड़ी आबादी को पालने वाला देश इस हकीकत को समझेगा?

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