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‘वैश्विक गांव’ में उभरती विभाजक रेखाएं

By राजकुमार सिंह | Updated: September 18, 2025 07:42 IST

यह सच है कि पढ़ाई के लिए ऑस्ट्रेलिया जानेवाले भारतीय छात्र वहां की अर्थव्यवस्था में लगभग छह अरब डॉलर का सालाना योगदान देते हैं.

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कभी जिस अंग्रेजी सत्ता की बाबत कहा जाता था कि उसका सूरज कभी नहीं डूबता, उसी ब्रिटेन के लाखों मूल निवासी अगर पिछले दिनों ‘यूनाइट द किंगडम’ के नारों के साथ प्रवासियों के विरुद्ध रैली निकालते नजर आए तो संदेश साफ है कि विश्व को एक गांव के रूप में देखने-दिखाने के सपने बिखरने लगे हैं. पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में आर्थिक उदारीकरण के नाम पर वैश्विक गांव का नारा दिया गया था.

भारत समेत तमाम देशों ने अर्थव्यवस्था ही नहीं, सोच और समझ की दृष्टि से भी अपने खिड़की-दरवाजे पूरी दुनिया के लिए खोल दिए. विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तों के दबाव में आर्थिक उदारीकरण को गति मिली, लेकिन सभी जानते हैं कि उसके मूल में अपने उत्पादों के लिए दुनिया भर के बाजार हासिल करने की अमेरिकी रणनीति काम कर रही थी.  इसलिए भी, अमेरिका के वैचारिक विरोधियों ने अर्थव्यवस्था के उस उदारीकरण और वैश्वीकरण का विरोध किया.

कुछ परंपरागत क्षेत्रों पर नकारात्मक असर के अलावा उससे लाभ भी मिला, लेकिन साढ़े तीन दशक बाद अब विश्व व्यवस्था फिर वापस अपने-अपने दायरे में लौटने को बेताब दिख रही है. विडंबना यह कि इसकी शुरुआत भी अमेरिका से ही हुई. अमेरिका को फिर महान बनाने और अवैध प्रवासियों को बाहर निकालने के नारे के साथ, चार साल बाद, दूसरी बार राष्ट्रपति बनने में सफल रहे डोनल्ड ट्रम्प की नीतियों का भले ही अब अमेरिका में भी विरोध होने लगा हो, लेकिन ‘स्थानीय बनाम प्रवासी’ का मोर्चा खोलने की राजनीति यूरोप समेत दूसरे देशों में भी रंग दिखाने लगी है.

ये पश्चिमी देश हर तरह के उदारीकरण के लिए जाने जाते रहे हैं. इसलिए भी वे प्रवासियों की पसंद की सूची में ऊपर रहे हैं. प्रवासियों को वहां बेहतर जीवन स्तर मिला तो उन्होंने भी उनके सर्वांगीण विकास में अपना योगदान दिया. अब अचानक वे ही प्रवासी इन देशों को अपने मूल निवासियों और अंतत: राष्ट्रीय हितों के लिए खतरा नजर आने लगे हैं.  अगर अमेरिका सरीखे विश्व के सबसे पुराने लोकतंत्र और मजबूत अर्थव्यवस्थावाले उदार समाज में राष्ट्रवाद डोनाल्ड ट्रम्प को दूसरी बार राष्ट्रपति बनवानेवाला ‘ट्रम्प कार्ड’ बन सकता है तो फिर ब्रिटेन, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया समेत अन्य देशों के राजनेता उसे क्यों नहीं आजमाना चाहेंगे?  

इस विश्वव्यापी समस्या का अधिक चिंताजनक पहलू यह भी है कि अवैध प्रवासियों के विरुद्ध मुखर होते इस विरोध की आंच अंतत: वैध प्रवासियों तक भी पहुंचेगी, क्योंकि उनके चलते मूल निवासियों के लिए रोजगार के घटते अवसरों और बढ़ती मुश्किलों की बहस शुरू हो चुकी है. यह सच है कि पढ़ाई के लिए ऑस्ट्रेलिया जानेवाले भारतीय छात्र वहां की अर्थव्यवस्था में लगभग छह अरब डॉलर का सालाना योगदान देते हैं.

यह भी कि ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भारतीय पेशेवरों की महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन कोई भी प्रवासी मूलत: अपने बेहतर जीवन के लिए विदेश जाता है, न कि उस देश को बेहतर बनाने में योगदान देने. सत्ता राजनीति अपनी सुविधा के लिए इस तथ्य को छिपा जाती है कि कम वेतन पर स्थानीय पेशेवर न मिलने अथवा उतने कुशल स्थानीय पेशेवर न मिलने से ही प्रवासी पेशेवरों को इन देशों की कंपनियां नौकरी देती हैं, न कि धर्मार्थ भाव से. जरूरत यह भी समझने-समझाने की है कि परस्पर आदान-प्रदान से ही भविष्य में बेहतर दुनिया बनेगी, संकीर्ण सोच से नहीं.      

टॅग्स :LondonUK
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