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माता काली को भूमि पर लेटे शिव पर पैर रखे क्यों दिखाया गया है?

By प्रमोद भार्गव | Updated: April 13, 2021 10:08 IST

भारतीय दर्शन में पदार्थ को भी चेतना माना गया है. इसलिए कहा गया है कि पदार्थ रूपी शिव से जब शक्ति रूपी ‘ई’ विलोपित हो जाती है तो वह ‘शव’ बन जाता है.

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विज्ञान की नवीनतम अवधारणाओं के अनुसार यह जीव-जगत पदार्थ तथा ऊर्जा के समन्वय से अस्तित्व में आया है. इन्हीं दो तत्वों को सनातन भारतीय दर्शन में शिव एवं शक्ति कहा गया है. ऊर्जा का ही शुद्धतम रूप चेतना है. 

यही चेतना जीवन का निर्माण करती है. अकेला पदार्थ निष्क्रिय, नीरस और जड़ है. बावजूद ऊर्जा कणों से निर्मित इस जड़ पदार्थ में भी हलचल है. 

भारतीय दर्शन में इसी हलचल को चेतना माना गया है इसीलिए वह पदार्थ को भी चेतना मानता है. अतएव कहा गया है कि पदार्थ रूपी शिव से जब शक्ति रूपी ‘ई’ विलोपित हो जाती है तो वह ‘शव’ बन जाता है. 

मां काली के शिव पर खड़े होने का मतलब क्या है?

दुर्गा की यह शक्ति जब ‘काली’ रूप में अवतरित होती है तो वह इसी शव पर खड़ी होकर उसे शिव बनाती है. फलस्वरूप काली को भूमि पर लेटे हुए शिव पर पैर रखे मूर्तियों व चित्रों में दर्शाया गया है. 

काली के इस अमूर्त रूप का जिस मूर्त रूप में चित्रण है, उसे यूं भी समझ सकते हैं कि जो ऊर्जामयी शक्तियां मनुष्य के अनुकूल हैं, वे दैवीय और जो प्रतिकूल है, वह आसुरी शक्तियां हैं. जिस ऊर्जामयी चेतना को ऋषियों ने हजारों साल पहले समझ लिया था, आज इसी चेतना को समझने के अभिनव प्रयास बिहार के योग विश्वविद्यालय में हो रहे हैं.  चेतना ऊर्जा की विवेकपूर्ण संपूर्ण अभिव्यक्ति है, किंतु यह विज्ञान के लिए अबूझ पहेली बनी हुई है. कृत्रिम बुद्धि यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तो विज्ञान ने आविष्कृत कर ली है. लेकिन चेतना को पढ़ पाना अभी भी दूर की कौड़ी बनी हुई है. चुनांचे चेतना को समझा या अनुभव अवश्य किया जा सकता है, लेकिन इसका रचा जाना लगभग असंभव है. 

भारतीय योगी-मनीषी इसका अभ्यास सदियों से करते आए हैं. योग वशिष्ठ और पतंजलि योग में इस चेतना को अनुभव करने के अनेक उदाहरण हैं. बिहार के मुंगेर में स्थित दुनिया के पहले योग विवि में इस ऊर्जा के विविध आयामों का पढ़ने की कोशिश कुछ वर्षो से की जा रही है.

देवी दुर्गा के शक्ति रूपों के मायने

संस्कृत ग्रंथों में देवी दुर्गा के शक्ति रूपों का मिथकों व प्रतीकों में उल्लेख वास्तव में ब्रह्मांडीय जैव व्यवस्था का प्रस्तुतिकरण है, जिसमें घटनाएं, स्थितियां और स्थापनाएं समूची वैश्विक व्यवस्था को आकार देती हुई आगे बढ़ती, जीवन-चक्र  के समस्त बदलावों और विकास प्रक्रिया को रेखांकित करती हैं. 

मरकडेय-पुराण में प्रकाश और ऊर्जा के सार तत्व के बारे में उल्लेख है कि देवों ने अपने समक्ष एक प्रकाश-पुंज देखा, जो एक विराट पर्वत के समान आलोकित हो रहा था. उसकी ज्वाला से पूरा आकाश दीप्त हो उठा. फिर वहां से लपटें एक पिंड में परिवर्तित होने लगीं. 

इस पिंड से ऊर्जामयी प्रकाश जन्मा, जो एक स्त्री-रूप में परिणत हो गया. इस काया से प्रस्फुटित हो रही कांति ने तीनों लोकों को दीप्तिमान कर दिया. प्रकृति के इस चमत्कार की सभी दिव्य शक्तियां साक्षी थीं. 

इन शक्तियों ने स्वर्ग, पृथ्वी और समुद्र पर अनादि-अनंत ऊर्जा के सृजन के लिए अपने तत्वों के श्रेष्ठतम भाग दिए और आकाश पर आदि मां, यानी जगत-जननी प्रगट हो गईं. आज जितने भी थल, जल और नभचरों का अस्तित्व है, यह इसी ऊर्जामयी मां का सृजन है. 

इसे ही महामाया, अंबिका, महादेवी और महासुरी भी कहा गया है. इसे अंबिका इसलिए कहा गया, क्योंकि जीवनदायी मां का एक नाम अंबिका भी है. देवों की भी यह मां है इसलिए इसे महादेवी और असुर भी इसी ऊर्जा से जन्मे इसलिए महासुरी कहा गया.

दरअसल ऊर्जा या प्रकृति के जो भी जीवनदायी तत्व हैं, वे ऊर्जा के अक्षय स्रोत हैं, उनका पूर्ण रूप में क्षरण कभी नहीं होता है लेकिन विघटन होता है. इसलिए विघटित शक्ति को आसुरी और अक्षय अर्थात केंद्रीय शक्ति को दैवीय कहा है. 

इसी ऊर्जा से पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य का निर्माण हो रहा है. एक ही पदार्थ से एक के बाद एक वस्तुएं रूपांतरित होकर नया आकार लेती रहती हैं. इन सभी अस्तित्वों में चेतना अंतर्निहित है. लेकिन चेतना का आकार अत्यंत सूक्ष्म है. 

चेतना के इस पहलू को भारतीय मनीषियों ने बहुत पहले जान लिया था, अब इसे ही दुनिया के आधुनिक वैज्ञानिक जानने में अपनी प्रज्ञा लगा रहे हैं.

 

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