2014 के चुनावों में बीजेपी के वोटों का प्रतिशत काफी ज्यादा रहा था। इसे मोदी लहर में मिले वोट कहा गया लेकिन हालिया चुनावों में बीजेपी को मिले जीत के बाद फिर से बीजेपी को मजबूत दल के रूप में देखा जाने लगा है। लेकिन सैनी के बढ़ते जनाधार से अगर किसी दल को सबसे ज्यादा नुकसान होगा तो वो बीजेपी। बीजेपी भले ही 2 चुनाव जीतकर अपने अति आत्मविश्वास में हो लेकिन पिछले चुनाव जैसी परिस्थितियाँ नहीं है।
बीजेपी का आत्मविश्वास और चुनौतियां
पिछले चुनाव में डेरा का पूरा सहयोग बीजेपी को मिला था जिससे बीजेपी को करीब 25 सीटों पर महत्वपूर्ण बढ़त मिली थी जो कि इस बार मिलना मुश्किल दिख रहा। बीजेपी के पास एक अन्य विकल्प भी है या तो वो इनेलो के साथ गठबंधन करके इसकी भरपाई करे या फिर हरियाणा में एकला चलो रे की नीति पर आगे बढ़ रही शिरो मणि अकाली दल के साथ ताल-मेल बिठाए। हरियाणा सरकार में सिख समाज से किसी मंत्री को जगह न दिए जाने से बीजेपी से नाराज सिख समाज शिरोमणि अकाली दल से गठबंधन वाले दल की ओर अपने वोटों का ट्रांसफर करेगा। अगर बीजेपी ऐसा नहीं कर पाती है तो हो सकता है दिल्ली और पंजाब में भागीदार शिरोमणि अकाली दल से जुड़े सिख समाज का वोट हरियाणा में बीजेपी के अलावा किसी अन्य गठबंधन को हस्तांतरित हो जाए।
नवनिर्मित जेजेपी के रास्ते
नवनिर्मित पार्टी जेजेपी सुप्रीमो दुष्यंत अगर आम आदमी पार्टी के अलावा अकालियों को हरियाणा में अपने साथ जोड़ते हैं तो हरियाणा की राजनीति में काफी मजबूत स्थिति में आ जायेंगे पर इसके लिए सीटों के बंटवारे की गणित को हल कर पाना थोडा कठिन होगा। वहीं इंडियन नेशनल लोकदल के सितारे इन दिनों गर्दिश में नजर आ रहे हैं। प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण घटक के रूप में रही इनेलो को एक के बाद एक झटके लग रहे हैं। जींद उपचुनाव में इनेलो-बसपा प्रत्याशी की बुरी हार के बाद यह बात पुख्ता हो गई कि वोटों का ट्रान्सफर नहीं हुआ बल्कि वोट दूसरी जगहों पर चले गए।
क्या झटकों से उभर पाएगी इनेलो
प्रदेश की राजनीति के शिखर पर पहुँची इनेलो को एक के बाद अनेक झटके लगने की शुरुआत चौधरी देवीलाल की जयंती पर आयोजित सम्मान समारोह के बाद से पार्टी की प्रासंगिकता घटती चली गई और बीजेपी के खिलाफ एकजुट पार्टी एक दूसरे पर ही आरोप प्रत्यारोप में उलझकर रह गई। रैली में हुई नारेबाजी और अव्यवस्था इस कदर बढ़ी कि इनेलो सुप्रीमो को अपने पार्टी तीन महत्वपूर्ण नेताओं अजय, दुष्यंत और दिग्विजय को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके बाद अलग दल बनने का रास्ता खुला। फिर क्या था, आपसी बयानबाजी बढ़ती गई और इस क्रम में आगे अजय के परिवार द्वारा बनाई गई पार्टी को अभूतपूर्व समर्थन हासिल हुआ।
जींद उपचुनाव के समय दोनों परिवारों में एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी और इनेलो से जेजेपी में शामिल होने वाले नेताओं की संख्या बढती चली गई। इस क्रम में जेजेपी जहाँ मजबूत हुई वहीं बीजेपी के खिलाफ लड़ाई का विकल्प कमजोर होता गया। इनेलो व बसपा के बीच गठबंधन के चुनाव में बुरी हार के बाद जींद हरियाणा के राजनीतिक घटनाक्रम में व्यापक बदलाव देखने को मिल रहे हैं।
जींद उपचुनाव के नतीजों का प्रभाव
उपचुनाव के नतीजों ने हरियाणा की राजनीति में व्यापक बदलाव की परिस्थितियां उत्पन्न कर दी हैं। उन परिस्थितियों का प्रभाव सभी दलों पर पड़ता दिख रहा है। अगर बात इनेलो की हो तो इन नतीजों ने हरियाणा की राजनीति के केंद्र में रहने वाली इनेलो के लिए काफी चुनौतियाँ लेकर आई हैं । “रिश्ते छूटे गठबंधन टूटा” यह पूरी कहानी यूपी के समाजवादी पार्टी के टूट के समान है जिसमें चाचाओं से भतीजों ने बढ़त हासिल की है।
उपचुनाव में हार का ठीकरा इनेलो के मत्थे जड़ते हुए बसपा ने भी इनेलो से किनारा कर लिया और दूसरे महत्वपूर्ण दल लोकतान्त्रिक सुरक्षा पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया। बहुत तेजी से बदल रहे राजनीतिक घटनाक्रम में जहाँ इनेलो का सब कुछ लुटा वहीं कांग्रेस को भी धक्का लगा। 5 राज्यों की जीत के बाद हुए हरियाणा के उपचुनाव में कांग्रेस नें अपने मजबूत उम्मीदवार के सहारे चुनाव को जीतकर आगे बीजेपी के खिलाफ माहौल बनाने के लिए पुरजोर कोशिश की गई थी लेकिन कांग्रेस प्रत्याशी के तीसरे स्थान पर आने के बाद कांग्रेस को बीजेपी के विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर पाने की सोच को गहरा धक्का लगा। वहीं 50 दिन पहले गठित जेजेपी लगभग 38 हजार वोट लेकर काफी मजबूत दल के रूप में उभरी है।
अनेकता में बल दिखाने का विकल्प
कुल मिलकर बीजेपी को हराने के लिए बने मजबूत इनेलो बसपा गठबंधन की प्रासंगिकता की समाप्ति के बाद अब जजपा+आप व एलएसपी व बसपा के सामने आने का मार्ग प्रसस्त हुआ है। साथ ही इनेलो के लिए मात्र एक विकल्प यानी कि बीजेपी के साथ जाने की मात्र एक राह बची है वो भी छोटे पार्टनर बनने की ही मात्र एक सम्भावना ही बची है। पिछले दिनों एलएसपी व बसपा के बीच हुए इस समझौते में जहां बीएसपी को लोकसभा में बड़ा पार्टनर बनाया गया वहीं विधान सभा के लिए बसपा ने सैनी के दल को बड़ा पार्टनर माना है। यह ठीक वैसा ही है जब हजका को लोस चुनाव 2014 में बीजेपी ने मात्र दो सीटें दी थी और विधान सभा में अकेले चुनाव में चली गई थी।
अगर लोकसभा व विधान सभा चुनाव साथ नहीं हुए तो आगामी विधान सभा चुनाव में हरियाणा में इस तरह की सम्भावना भी बन सकती है। रविदासी समाज के मतदाताओं पर राज करने वाली बीएसपी और नॉन जाट वोटों (खासकर पीछ्डे समाज के नान जाट वोटों ) पर बीजेपी की सेंधमारी करने वाले इस गठबंधन को बीजेपी का विकल्प कहना अभी जल्दबाजी होगा लेकिन आगामी चुनाव में इनकी प्रासंगिकता काफी बढ़ने की उम्मीद है। वहीं सुरजेवाला की बुरी हार के बाद कांग्रेस के पास किसी चेहरे के साथ चुनाव मैदान में उतरने के विकल्प को धक्का लगा है अब अनेकता में बल दिखाने का विकल्प बेहतर दिख रहा है। जारी....
इस लेख में व्यक्ति विचार लेखक के निजी हैं।