Labour Day 2026: श्रम और उत्पादकता के मध्य अनिवार्य रिश्ते के चलते श्रम पर वर्चस्व स्थापित करने और अपने हित में करने की जद्दोजहद लम्बे समय से चलती चली आ रही है. दास, दस्यु, भृत्य, बेगार और मजदूर के रूप में समाज के कुछ हिस्से पीढ़ी-दर पीढ़ी वंचित और उपेक्षित ही बने रहे. श्रमिक की स्थिति जाति की औकात से भी जुड़ गई.
नीची जाति के लोग शरीर श्रम की प्रधानता के कार्यों में संलग्न हो गए. उनकी आर्थिक विपन्नता और निम्न सामाजिक स्थिति जगजाहिर है. उनका शोषण सदियों से होता चला आ रहा है. उनके साथ भेदभाव और पूर्वाग्रह का प्रमुख आधार अस्पृश्यता है जो सामाजिक दूरी को सुदृढ़ करती है.
समय के साथ इसके सामाजिक-राजनैतिक निहितार्थ जटिल होते गए हैं जिसका परिणाम आरक्षण की नीति और उसे लागू करने में दिखते हैं. उनको निम्न स्तर के काम सौंप कर और फिर उस काम को ‘हीन’ कह कर उनसे दूरी बनाई गई. पीढ़ी-दर-पीढ़ी पीछे धकेले जाते रहने से जीवन शैली, विश्वास और परम्पराओं का भी भिन्न रूप बनता गया.
एक ही समाज के अंग होने पर भी प्रभुत्व पर टिका सामाजिक स्तरीकरण ‘अन्नदाता’ (प्रभु) और ‘सेवक’ (आश्रित) की कोटियों को लेकर जाति-भेद की जड़ों को मजबूत करता रहा. तथ्य यह भी है कि अन्यान्य कारणों से सामाजिक वर्ग भेद किसी न किसी रूप में हर समाज में मिलता है पर भारतीय परिस्थितियों में श्रम का सामाजिक ताना-बना ज्यादा ही उलझता गया.
सामाजिक सुधारों और कानूनी पहल से जातिगत भेद-भाव से निजात पाने की कोशिश होती रही. इस बीच काम के तरीके और प्रकार भी बदले. कामकाज की दुनिया में प्रवेश को विशिष्टता, प्रशिक्षण और निपुणता की दृष्टि से अनेक श्रेणियों में रखने की शुरुआत हुई. आज सफेदपोश और उच्च नौकरियों में बहुत थोड़े से लोग हैं. दूसरी ओर असंगठित क्षेत्र में श्रमिकों का बाहुल्य है.
जीवन में तकनीकी की बढ़ती घुसपैठ के चलते मनुष्य के श्रम के स्वरूप में क्रांतिकारी बदलाव आ रहे हैं. जीवन के विभिन्न कार्यों के तरीके बदल रहे हैं. ज्यादा दिन नहीं हुए कोरोना ने दृश्य ही बदल दिया था जब रिमोट वर्किंग का दौर शुरू हुआ और नए ढांचे में कामकाज शुरू हुआ. आज बौद्धिक श्रम करने वाले ‘बुद्धिजीवी’ और शारीरिक श्रम करने वाले को ‘श्रमजीवी’ कहने का चलन है.
दो कोटियां बना कर एक अस्तित्व के दोनों पक्षों की परस्परपूरकता को खंडित कर दिया गया. बुद्धिजीवी और श्रमजीवी कहने से मन और शरीर का जो द्वैत शुरू हुआ वह भ्रामक होते हुए भी व्यावहारिक रूप से लागू है. शारीरिक श्रम की स्थिति में जहां श्रम प्रत्यक्ष होता है उसका मूल्य कम आंका जाता है. दूसरी ओर मानसिक श्रम की कीमत की कोई सीमा ही नहीं है.
भारतीय संविधान की दृष्टि में सभी श्रमिक एक समान हैं और किसी के विरुद्ध लैंगिक और जातिगत भेद-भाव नहीं होना चाहिए. रोजगार के लिए समान अवसर सबका अधिकार है. जबरन श्रम कराना निषिद्ध है और बाल श्रम पर रोक लगाई गई है. काम करने का अधिकार सक्रिय है और राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम भी लागू है.
लेकिन अभी भी देश में लाखों लोग बेरोजगार हैं और निम्न गुणवत्ता की नौकरियों में फंसे हुए हैं. देश के विकास को गति देने के लिए जरूरी है कि कार्यबल में शामिल होने के लिए नए प्रवेशकों को अवसर दिए जाएं. श्रम का आदर करने और सम्मान देने की संस्कृति अपना कर ही विकसित भारत का स्वप्न पूरा हो सकेगा.