मानव सभ्यता के इतिहास में कुछ ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिनका जीवन केवल एक युग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि युगों-युगों तक मानवता के पथ को आलोकित करता है. गौतम बुद्ध ऐसे ही एक अद्वितीय प्रकाशस्तंभ हैं, जिनका करुणा, अहिंसा और आत्मजागरण का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना ढाई हजार वर्ष पूर्व था. बुद्ध पूर्णिमा का पावन दिवस केवल एक ऐतिहासिक स्मृति नहीं, बल्कि आत्मबोध, समता और शांति के उस दिव्य संदेश का पुनर्स्मरण है, जिसकी आज के हिंसाग्रस्त और तनावपूर्ण विश्व को अत्यंत आवश्यकता है.
बुद्ध पूर्णिमा का दिन अद्वितीय है, क्योंकि इसी दिन गौतम बुद्ध का जन्म, ज्ञानप्राप्ति और महापरिनिर्वाण-तीनों घटनाएं घटित हुईं. नेपाल के लुम्बिनी में जन्मे सिद्धार्थ ने बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त किया और कुशीनगर में निर्वाण को प्राप्त हुए.
इस दृष्टि से यह दिन केवल एक महापुरुष का स्मरण नहीं, बल्कि जीवन की पूर्णता, जागरण और मुक्ति का प्रतीक है. आज भारत सहित विश्व के विभिन्न देशों- श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार, जापान और कोरिया में इसे विभिन्न नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है. श्रीलंका में ‘वेसाक’ के रूप में दीपों और करुणा के उत्सव के रूप में यह दिन विशेष रूप से उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है.
गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था, वे एक राजकुमार थे, किंतु जीवन के दु:ख- जरा, व्याधि और मृत्यु ने उनके अंतर्मन को विचलित कर दिया. 29 वर्ष की आयु में उन्होंने राजवैभव का त्याग कर सत्य की खोज का मार्ग अपनाया. कठोर तप और साधना के पश्चात उन्होंने पाया कि न तो भोग का मार्ग उचित है और न ही अत्यधिक तप का. उन्होंने ‘मध्यम मार्ग’ का सिद्धांत दिया- संतुलन, सजगता और समत्व का मार्ग.
गौतम बुद्ध ने सारनाथ में अपना प्रथम उपदेश दिया, जिसे ‘धम्मचक्र प्रवर्तन’ कहा जाता है. उनके चार आर्य सत्य- दुःख, दुःख का कारण, दुःख का निरोध और दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदा- मानव जीवन के गहन विश्लेषण और समाधान प्रस्तुत करते हैं.
आज का विश्व युद्ध, आतंकवाद, हिंसा, असहिष्णुता और मानसिक तनाव से जूझ रहा है. ऐसे समय में बुद्ध का करुणा एवं शांति का संदेश अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है. उन्होंने स्पष्ट कहा- ‘द्वेष से द्वेष कभी समाप्त नहीं होता, प्रेम से ही द्वेष समाप्त होता है.’ यह केवल एक नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि सामाजिक और वैश्विक शांति का सूत्र है. यदि आज के राष्ट्र, समाज और व्यक्ति इस एक सिद्धांत को आत्मसात कर लें, तो अनेक संघर्षों का समाधान संभव हो सकता है.
बुद्ध ने केवल बाह्य हिंसा का विरोध नहीं किया, बल्कि मन की हिंसा- ईर्ष्या, क्रोध, लोभ और अहंकार को सबसे बड़ा शत्रु बताया. उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही सच्चा विजेता है. हजारों युद्ध जीतने वाला भी उस व्यक्ति के सामने छोटा है, जिसने अपने मन को जीत लिया. गौतम बुद्ध ने उस समय के समाज में व्याप्त जातिवाद, छुआछूत और लैंगिक भेदभाव का विरोध किया.
उन्होंने सभी मनुष्यों को समान बताया और कहा कि व्यक्ति की श्रेष्ठता जन्म से नहीं, कर्म से निर्धारित होती है. बुद्ध का संघ एक समतामूलक समाज का आदर्श उदाहरण था, जहां सभी वर्गों के लोग समान रूप से स्वीकार किए जाते थे. इसीलिए उनका आंदोलन केवल धार्मिक नहीं, सामाजिक क्रांति का भी आधार बना.